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किस्से नेता जी के (अभिमन्यु) (8)

जब नन्दू महाराज को समझा किडनेपर

बात तब की है जब नंदलाल व्यास उर्फ नंदू महाराज बीकानेर से विधायक थे और जयपुर से अपने दोस्तों व स्टाफ के साथ प्रदेश में घूमने के लिए निकले। ये लोग रणकपुर, नाथद्वारा, नाकौड़ा आदि स्थान होते हुए जसोल जा रहे थे तब गाडी में डिजल भरवाने के लिए बाडमेर के कल्याणपुर से करीब 30 किमी पहले पेट्रोल पम्प पर रूके। रात के एक बजे और सर्दी होने के कारण महाराज व उनके साथी पिछली सीट पर कंबल ओढे हुए थे और आगे गाडी से उनका गनमैन राजाराम विश्नोई ए के 47 हाथ में लिए उतरा। ड्राइवर राजू ने जोर से आवाज लगाई, कोई हो तो डीजल भर दे। काफी समय बाद बार बार आवाज लगाने पर एक आदमी आया और गाडी मेंडीजल भरकर चला गया। महाराज अपने साथियों के साथ जसोल की तरफ रवाना हो गए। आधे घण्टे बाद कल्याणपुर पुलिस स्टेशन के सामने थानाधिकारी मदनदान रतनू ने दूर से देखा की स्कोर्पियो गाडी जिसका नंबर 1244 था आ रही है तो उसने गाडी को रोक लिया और आरएसी व पुलिस के दर्जनों जवानों ने गाडी को घेर लिया और बंदूके गाडी की ओर तान दी। मदनदान रतनू ने कडक आवाज में कहा बाहर निकलो और अपने आप को पुलिस के हवाले कर दो। इतना सुनते ही नंदू महाराज व उनके बाकी साथी बाहर आए और समझ नहीं पाए माजरा क्या है। मदनदान रतनू नंदू महाराज को पहले से जानता था और नंदू महाराज को दखते ही उसके होश उड गए किय ये क्या हुआ। नंदू महाराज कुछ कहते उससे पहले ही थानेदार ने कहा कि अभी राजस्थान की नामचीन हस्ती राजेन्द्र मिर्धा का अपहरण हो रखा है और पिछले पेट्रोल पंप के कर्मचारियों ने पुलिस को सूचना दी थी कि गाडी संख्या 1244 में कुछ लोग ए के 47 लेकर चल रहे हैं जिनके पीछे तीन लोग कंबल में लपेटे हुए हैं और लगता है कि राजेन्द्र मिर्धा के अपहरणकर्ता हैं। इतनी सूचना मिलने पर बाडमेर के कलक्टर और एसपी तुरंत सक्रिय हो गए और गाडी संख्या 1244 का इंतजार होने लगा। इतना सुनते ही नंदू महाराज सारा माजरा समझ गए और कलक्टर साहब से फोन पर बात की और अपना परिचय दिया। प्रशासन ने महाराज से माफी मांगी और असुविधा के लिए खेद जताया और आदर सत्कार करके महाराज को विदा किया। आज भी जब महाराज ने गनमैन राजाराम ने यह वाकया सुनाया तो हंसे बिना नहीं रहा।

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उस वक्त भी हुआ था मृत्यु भोज परम्परा का विरोध

बात उस समय की है जब पूर्व महाराजा सार्दुल सिंह की दादी व बीकानेर रियासत के पूर्व महाराज डूंगरहसिंह जी की पड़ी का निधन हुआ था और रिवाजानुसार उनके निधन पर मृत्युभोज 'तीन धडे का जीमण' रखा गया। राजा महाराजाओं सहित सेठ साहूकारों में अपने घरों में किसी बुजुर्ग का निधन होने पर उनकी तेंहरवीं में तीन धडे का भोज करने की परम्परा थी। तीन धड़ों में ब्राह्मण समाज के तीन बडे वर्गों के लोगों को मृत्युभोज खिलाया जाता और इस तरह हजारों लोग इस भोज में शामिल होते। इस अवसर पर एक बडी धनराशि खर्च हो जाती। तत्कालीन समाजवाद समर्थक युवक कांग्रेस के नेता मक्खन जोशी, भैंरूरतन रंगा व उनके साथियों ने समाज में फैली इस कुरीति का विरोध करने का निर्णय लिया और कहा कि ये धनवान लोगों का धन का प्रदर्शन है जो रूकना चाहिए। इनका मानना था कि यह धन जरूरतमंदों में बांटा जाय। इसके लिए उन्होंने एक अपील भी जारी की लेकिन वो बेअसर रही। सार्दुलसिंह ने तीन धडे का भोज करने का निर्णय ले लिया। इस देखकर मक्खन जोशी के नेतृत्व में इन नेताओं ने इस भोज का विरोध करने का निर्णय लिया। लेकिन मक्खन जोशी के पिता झमण सा जोशी भी अपने बेटे के इस विचार से सहमत नहीं थे। यह सब जानकार शहर में चर्चा हो गई कि अब देखते हैं कि बेटे के विरोध के कारण पिता क्या कदम उठाते हैं। इस तरह भोज का दिन आ गया और अपनी धुन के पक्के समाजवादी सोच के युवा नेता मक्खन जोशी अपने साथियों सहित इस भोज का विरोध करने के लिए भोज स्थल जूनागढ के बाहर पंडाल लगाकर बैठ गए और अनशन किया। उधर मक्खन जोशी के पिता इस भोज में भोजन लेने पहुंचे। इस तरह बेटा तो बाहर विरोध कर रहा है लेकिन पिता अंदर भोज ले रहा है। यह देखकर पूरे शहर में यह चर्चा हो गई कि बेटा तो भूखा रह गया लेकिन पिता खाना खाकर आ गया। शहर के लोग आज भी इस घटना को याद कर चर्चा करते हैं लेकिन इस विरोध का समाज पर गहरा प्रभाव पडा और वह तीन धडे का भोज इतिहास का अंतिम भोज ही रहा।

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जब एक कांस्टेबल ने कलक्टर को कहा: बाहर ही रहो भीड मत करो

बात दो फरवरी 1982 की है जब बीकानेर में अखिल भारतीय पंचायत राज सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा था। सम्मेलन में कांग्रेस के तत्कालीन राष्ट्रीय महासचिव राजीव गांधी, राजस्थान के मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी, केन्द्रीय मंत्री बूटासिंह, बलराम जाखड़ सहित कई राष्ट्रीय स्तर के नेता मौजूद थे। राजकीय स्टेडियम में आयोजित हो रहे इस सम्मेलन की पंचायत राज से संबंधित प्रदर्शनी साईकिल वेलोड्रम के मैदान पर रखी गई थी। सभी लोग इस प्रदर्शनी का अवलोकन कर रहे थे कि अचानक एक हलचल हुई और सबने देखा कि राजस्थान के कद्दावर कांग्रेसी नेता मोहनलाल सुखाडिया बेहोश होकर गिर पडे। सुखाडिया 17 साल तक राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे थे और उसके बाद कर्नाटक, आंध्रप्रदेश व तमिलनाडू के राज्यपाल भी रहे। सब हक्के-बक्के व हतप्रद रह गए। सुखाडिया को बेहोशी की हालत में पीबीएम अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। सभी लोगों में शोक की लहर दौड़ गई। सुखाडिया का शव पीबीएम था। बीकानेर के तत्कालीन जिला कलक्टर एमकेश खन्ना को जैसे ही सूचना मिली वे जहां थे जैसे थे पीबीएम की तरफ रवाना हुए। अस्पताल के बाहर भारी भीड थी। लोग अपने नेता के अंतिम दर्शन करना चाहते थे। पीबीएम के मुख्य दरवाजे के बाहर एक पुलिस कांस्टेबल को नियुक्त कर दिया गया कि किसी को भी अंदर न आने दिया जाए। उधर अपनी गाडी से उतर कर जिला कलक्टर एमकेश खन्ना अस्पताल के दरवाजे की और दौडे पर जैसे ही उन्होंने अंदर प्रवेश की कोशिश की कांस्टेबल ने हाथ पकड कर रोक लिया और बांह पकड कर किनारे कर दिया कि भीड मत करो बाहर ही रहो। जिला कलक्टर अपने साथ हुए इस व्यवहार से भौचक्के रह गए पर तुरंत संभले और दुबारा उसी तरफ बढ़े इस बार फिर कांस्टेबल ने कलक्टर साहब को रोक दिया कि समझ नहीं आता एक बार कह दिया बाहर ही रहो। इतना सुनते ही कलक्टर के साथ आए उनके स्टाफ के एक सदस्य ने कहा कि तुम नहीं जानते क्या ये खन्ना साहब है जिले के कलक्टर। इतना सुनते की कांस्टेबल के होश उए गए और उसने सेल्यूट किया और माफी मांगी परंतु खन्ना साहब ने हालात की मजबूरी समझी और उस कांस्टेबल को सराहा कि आपने कोई गलत काम नहीं किया बल्कि अपनी ड्यूटी निभाई है। इसके लिए आप बधाई के पात्र है और यहीं खडे रहकर ऐसे ही अपनी ड्यूटी मुस्तैदी से करते रहिए। वहां खडे लोगों ने इस पूरे घटनाक्रम को देखा तो देखकर आश्चर्य किया कि कैसे जिले के सुप्रीम अधिकारी ने बजाय बुरा मानने के एक छोटे कर्मचारी को उसकी कत्र्तव्यनिष्ठा के लिए सराहा।

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सभापति होने के नाते मैं नगर का प्रथम नागरिक हूं कलक्टर साहब

बात तब की है जब बीकानेर के सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज का उद्घाटन करने के लिए भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू बीकानेर आने वाले थे। इस हेतु कार्यक्रम की रूपरेखा बन रही थी और उसमें कांग्रेस के नेताओं सहित नगर परिषद बीकानेर के तत्कालीन अध्यक्ष द्वारका प्रसाद पुरोहित भी सक्रिय रूप से लगे हुए थे। जब पंडित नेहरू के स्वागत भाषण की बात आई तो तत्कालीन जिला कलक्टर ने कहा कि जिले का सर्वोच्च अधिकारी कलक्टर होने के नाते भारत के प्रधानमंत्री का स्वागत मैं करूंगा और स्वागत भाषण मैं ही दूंगा। उनकी इस बात का समर्थन वहां बैठे नेताओं ने भी किया। परंतु जिला कलक्टर की यह बात सुनते ही वहां बैठे नगर परिषद के अध्यक्ष द्वारका प्रसाद पुरोहित ने बड़े सख्त लहजे में कहा कि कलक्टर साहब आप जनता के सेवक है और अधिकारी भले सर्वोच्च हैं लेकिन आपको प्रधानमंत्री का सर्वप्रथम स्वागत करने का अधिकार नहीं है। प्रधानमंत्री का स्वागत करने का अधिकार नगर परिषद का सभापति होने के नाते मेरा है क्योंकि मैं ही इस नगर का प्रथम नागरिक हूं और पूरे बीकानेर की जनता का प्रतिनिधित्व करता हूं। इस नाते बीकानेर में प्रधानमंत्री का स्वागत मैं ही करूंगा, स्वागत भाषण मैं ही दूंगा और इस हेतु मुझे आपसे कोई आपत्ति नहीं है। सभापति होने के नाते मैं नगर का प्रथम नागरिक हूं कलक्टर साहब या पूछताछ नहीं करनी है और जनप्रतिनिधि होने के नाते आपको ये मेरा आदेश है। इतना सुनते ही वहां बैठे सब लोग हतप्रद रह गए और जिलाधीश भी सर झुकाकर बैठ गए। इस तरह पंडित नेहरू का स्वागत जनप्रतिनिधि द्वारका प्रसाद पुरोहित ने किया। अपने होने की स्थिति को लेकर इतने सजग लोकतांत्रिक जनप्रतिनिधि का यह किस्सा आज भी बीकानेर के लोगों की जुबान पर है।

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शिक्षा मंत्री को हरा देता तो सरकार की बेइज्जती हो जाती

बात तब की है जब बीडी कल्ला शिक्षा मंत्री थे। उनके बाल सखा शिक्षक खुशालचंद व्यास अपने काम से उनके पास जयपुर पहुंचे। बचपन के मित्र से मिलकर डॉ. कल्ला खुश हुए और बचपन की याद ताजा करते हुए पूछा, कैसे आना हुआ। व्यास जी ने अपना काम कल्ला जी को बताया और सहयोग का आग्रह किया। डॉ. कल्ला व्यास जी को बोले कि काम तो हो जाएगा मगर एक बार दोस्ती की याद ताजा करो और कुश्ती लड़ो। व्यासजी दंग रह गए कि आज ये मित्र शिक्षामंत्री है और कुश्ती लडऩे का उनका मानस भी नहीं था। परंतु दोस्ती के आग्रह को अस्वीकार भी नहीं कर सकते थे। इसलिए उपस्थित लोगों के समक्ष अखाड़ा लगा और दंगल शुरू हुआ। सभी लोग शिक्षामंत्री और उनके दोस्त को एक दूसरे पर जोर आजमाईश करते देखकर दंग रह गए। थोड़ी ही देर में मंत्री जी ने व्यास जी को हरा दिया। हराने पर मंत्री बोले, आज भी पटक दिया न। खुशालचंद व्यास ने हाजिर जवाब दिया, हारा हूं हराया नहीं क्योंकि मेरा ध्यान आपके गनमैन की तरफ था। अगर मैं आपको चोट पहुंचाता तो गनमैन अपनी ड्यूटी निभा लेता। व्यास जी के इस जवाब से सभी खिल खिलाकर हंस पड़े। कल्ला जी ने कहा कोई नहीं दंगल दुबारा होगा और इस बार स्टाफ और गनमैन दोनों नहीं होंगे। कुश्ती पुन: हुई और इस बार फिर कल्ला जी ने अपने मित्र को चित कर दिया। कल्ला अपने मित्र से बोले क्यों अब तो हार मानते हो न। हाजिर जवाब व्यास जी बोले नहीं मंत्री महोदय इस बार भी मैं हारा हूं क्योंकि अगर लोगों को पता चलता कि प्रदेश का शिक्षामंत्री एक शिक्षक से हार गया तो आपकी बेइज्जती हो जाती और दोस्त की इज्जत रखना मेरा कत्र्तव्य है। इतना सुनकर वहां खड़े सब लोग ठहाका लगाए बिना नहीं रहे। जब ये किस्सा डॉ. कल्ला ने बताया तो अपने दिवंगत मित्र को याद कर उनकी आंखें भर आई।

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नोट के साथ वोट

भारत में पहले आम चुनाव 1952 में हुए। इसी क्रम में बीकानेर में पहले सांसद का चुनाव बीकानेर रियासत के तत्कालीन महाराजा करणीसिंह ने लड़ा था। करणीसिंह महाराजा गंगासिंह के पौत्र और महाराजा सार्दुलसिंह के पुत्र थे। आजादी के बाद पहले आम चुनाव तक राजा-महाराजाओं के प्रति विशेष सम्मान व प्रेम नजर आता था। तब राजा-महाराजाओं से जब भी कोई व्यक्ति मिलता था तो अपनी हैसियत के अनुसार कुछ न कुछ लेकर जरूर जाता था, जिसको नजराना या भेंट कहा करते थे। राजा महाराजा से खाली हाथ मिलने का रिवाज उस समय नहीं था। इसी सोच व भावना के साथ बीकानेर की जनता ने महाराजा करणीसिंह को वोट दिए तो वोट के साथ एक नोट भी डाला। सोच यह थी कि महाराजा को खाली वोट कैसे दें! आखिर तो राजा है और राजा को पहली बार बिना मिले ही मिलना था तो खाली हाथ नहीं मिला जा सकता था।

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मक्खन अली महबूब जोशी

बात 1977 के चुनावों की है। इंदिरा गांधी के इमरजेंसी के निर्णय के बाद जयप्रकाश नारायण के उम्मीदवारों का देश में जीतना तय था और इंदिरा विरोध की लहर अपने परवान पर थी। इस समय बीकानेर में मक्खन जोशी बड़ा समाजवादी चेहरा माना जाता था और एक लोकप्रिय नेता के रूप में पहचान बना चुके थे। 1977 के राजस्थान विधानसभा चुनावों में मक्खन जोशी को टिकट मिलना तय था और तत्कालीन नेता चंद्रशेखर से मक्खन जोशी की नजदीकी और आश्वासन के बाद मक्खन जोशी के टिकट को लेकर संशय नहीं था। मक्खन जोशी दिल्ली से आश्वस्त होकर जयपुर रवाना हुए और बीच में रामगढ बांध पर दोस्तों के साथ पिकनिक के लिए रूक गए।

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जब राधाकृष्णनन के भाषण का अनुवाद छगन मोहता ने किया

बात 1959 की है जब श्री बीकानेर महिला मण्डल स्कूल के शिलान्यास का समारोह तत्कालीन उपराष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णनन के मुख्य आतिथ्य में हुआ था। राधाकृष्णनन को तमिल और अंग्रेजी ही बोलनी आती थी। इसलिए समस्या यह थी कि राधाकृष्णनन के भाषण को कौन अनुवादित कर उनकी बात जनता तक पहुॅंचाएं। तत्कालीन जिला कलक्टर और अन्य अधिकारियों ने डूंगर कॉनेज और एमएस कॉलेज सहित कईं कॉलेज व्याख्याताओं व शहर के अंग्रेजी विद्वानों से संपर्क किया लेकिन किसी ने भी राधाकृष्णनन के अंग्रेजी भाषण का अनुवाद करने की हां नहीं भरी।

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