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नेता गिरी (अनुराग हर्ष) (20)

मनमुटाव को करना होगा दूर

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मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे एक बार फिर 11 जून से प्रदेश का दौरा कर गुटों में विभाजित हुई भाजपा को एक करने की कोशिश करेंगी। विधानसभा चुनाव को लेकर राजे के दौरे में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी कई जिलों में शामिल होंगे। भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष के नाम पर रविवार को भी सहमति नहीं नहीं बन पाई, किंतु इतना स्पष्ट हो गया है कि भाजपा राजे के नेतृत्व में ही प्रदेश में अगला विधानसभा चुनाव लड़ेगी। किंतु बिना सेनाध्यक्ष (प्रदेशाध्यक्ष) के कैसे चुनाव लड़ेगी। इसको लेकर अभी भी सवाल बना हुआ है। वसुंधरा राजे व केन्द्र सरकार के बीच टकराव समाप्त होने के साथ ही दोनों के बीच प्रदेशाध्यक्ष को लेकर सहमति भी बन गई है। जिसमें साफ हो गया है कि जाट या फिर राजपूत प्रदेशाध्यक्ष नहीं बनेगा, किंतु केन्द्रीय संगठन की ओर से सुझाए गए नाम पर स्थानीय भाजपा को सहमति देनी होगी। दूसरी ओर कांग्रेस ने भी इस बार भाजपा को प्रदेश से उखाडऩे का पूरा मानस बना लिया है और कांग्रेस के राष्ट्रीय व प्रदेश स्तरीय पदाधिकारी इन दिनों प्रदेश के जिलों का दौरा कर कार्यकर्ताओं में जोश का मंत्र फूंकने का काम कर रहे है। भाजपा हो या फिर कांग्रेस दोनों ही पार्टियों में आपसी फूट प्रदेश के साथ-साथ बीकानेर जिले में भी देखने को मिल रही है। जब तक दोनों ही संगठन इस फूट का सही व पुख्ता इलाज नहीं कर लेते, तब तक चाहे भले ही बूथ को कितना भी मजबूत बना लें, लेकिन जीत सुनिश्चित होना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन सी है। यह तो फिलहाल विधानसभा चुनाव के वक्त ही पता लगेगा। फिलहाल कांग्रेस व भाजपा दोनों ही पार्टियां जोरशोर से बूथ को मजबूत बनाने के लिए गांव-गांव में पहुंचकर कार्यकर्ताओं से रुबरु हो रही है।

देखना जोर किसमें कितना है

बीकानेर जिले में कांग्रेस व भाजपा देानों ही पार्टियों में चल रही गुटबंदी के चलते विधानसभा चुनाव में जिले की सभी सातों सीटें जीतने के लिए दोनों को ही एडी चोटी का जोर लगाना पड़ सकता है। आचार संहिता लागू होने तथा टिकट वितरिण के वक्त ही हालांकि नाराजगी व गुटबाजी खुलकर सामने आ जाएगी। कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इसके चलते इस बार विधानसभा चुनाव रोचक होने की पूरी संभावना है। जीत सुनिश्चित करने के लिए किसमें कितना दम है यह कहने की जरुरत नहीं है यह तो तो मैदान-ए-चुनाव में सामने अपने आप ही आ जाएगा।

खाजूवाला में फिर दिखी गुटबाजी

विधानसभा को चुनाव को लेकर जिले में आरक्षण के तहत एकमात्र खाजूवाला विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस कार्यकर्ताओं में गुटबाजी एक बार फिर सामने आई। मेरा बूथ मेरा गौरव कार्यक्रम में पहुंचे अखिल भारतीय कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव तथा राजस्थान प्रदेश के सहप्रभारी काजी निजामुद्दीन को भी फूट का सामना करना पड़ा। जहां जाट धर्मशाला में नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी गुट के कार्यकर्ताओं की ओर से आयोजन किया गया। वहीं स्थानीय ग्राम पंचायत में पूर्व संसदीय सचिव गोविन्दराम मेघवाल की ओर से कार्यक्रम रखा गया। काजी निजामुदीन ने दोनों ही स्थानों पर शिरकत की। इससे पूर्व भी यहां सर्किट हाउस पहुंचने पर प्रदेश के सहप्रभारी के सामने दोनों ही पक्षों के कार्यकर्ताओं ने अपने-अपने नेताओं के समर्थन में नारेबाजी की। जिसके कारण कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही है।

मुकाबलों में रहेगी रोचकता

प्रदेश की भाजपा सरकार के कार्यकाल में बीकानेर को कितना क्या कुछ मिला है। यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। उस पर ऐलिवेटेड सहित अनेक मुद्दों पर बात बिगड़ती हुई नजर आती है। ऐसे में आने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा को कितना लाभ मिल पाएगा। यह तो फिलहाल आने वाला वक्त ही बताएगा। दूसरी ओर जिले के कई महत्वपूर्ण मुद्दों को विपक्ष भी जोरदार तरीके से नहीं उठा पाया है। ऐसे में बीकानेर की सभी सातों नोखा, श्रीडूंगरगढ़, लूणकरनसर, श्रीकोलायत, खाजूवाला, बीकानेर पूर्व तथा बीकानेर पश्चिम विधानसभा क्षेत्र में मुकाबले रोचक होने की पूरी संभावना है। हाल फिलहाल जिले की सात सीटों में से चार पर भाजपा, दो पर कांग्रेस तथा एक सीट पर निर्दलीय विधायक है। जहां भाजपा की कोशिश जिले में बेहत्तर प्रदर्शन कर अधिकाधिक सीटें हथियाने का लक्ष्य है। वहीं कांग्रेस पिछले विधानसभा चुनाव के रिपोर्ट कार्ड को सुधारने का प्रयास करेगी। जहां एक ओर देश व प्रदेशों में भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता को लेकर भाजपा के पदाधिकारी व कार्यकर्ता पहले से ही जोश में है। वहीं इस बार एक बार मैं, एक बार तुम की तर्ज पर की जा रही घोषणाओं के चलते कांग्रेस के कार्यकर्ता भाजपा को पटखनी देने की पूरी तैयारी में है। हाल फिलहाल दोनों ही पार्टियों के विधायक, पदाधिकारी व कार्यकर्ता लोगों के बीच पहुंचकर अपनी-अपनी तारीफ तथा विपक्षी पार्टी की विफलताओं को बताने में जुटे हुए है। जनता भी जागरूक हो चुकी है। देखना ये है कि दोनों ही पार्टियों के बहकावें में आती है या नहीं या फिर विकास को लेकर मतदान करेंगी। यह तो फिलहाल आने वाला समय ही बताएगा।

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बीकानेर - फोटो की राजनीति कब तक? (अनुराग हर्ष)

फोटो खिंचवाने का सबसे ज्यादा शौक अगर किसी को है तो वो नेता है। राजनीति चलती ही फोटो के दम पर है। ऐसे में कई नेता अपनी शुरूआत अखबारों में फोटो के साथ करते हैं, यह बात अलग है कि जो जनता के बीच काम नहीं करते, वो फोटो तक ही सीमित होकर रह जाते हैं। जनता उसी के साथ नजर आती है, जो खुद आगे बढ़कर काम करते हैं। खैर हम बात कर रहे हैं, फोटो के शौकीन नेताओं की। इन दिनों कांग्रेस और भाजपा दोनों बीकानेर पश्चिम विधानसभा क्षेत्र में सक्रिय नजर आ रही है और इस बीच फोटो के दीवाने नेताओं की चांदी हुई पड़ी है। टिकट के दावेदार नेता तो इन कार्यक्रमों में बस कुछ देर के लिए आते हैं, फोटो खिंचवाते हैं और चलते बनते हैं। कई बार तो नेताजी अपने कुछ साथियों को साथ लेकर पहुंचते हैं, उनको अपना मोबाइल थमाते हैं और फोटो खिंचवाते हैं। पीछे भीड़, पार्टी के झंडे, बैनर सभी फोटो में दिखने चाहिए। महज दस-पंद्रह मिनट की यह एंट्री लेने वाले एक-दो नहीं बल्कि कई नेता है। ऐसा भी नहीं है कि ऐसे सिर्फ कांग्रेस में है, बल्कि भाजपा में भी ऐसे शौकीन नेताओं की कमी नहीं है। दरअसल, इसके पीछे भी कहानी है। टिकट की दौड़ में लगने के लिए इन नेताओं को फाइल तैयार करनी होती है। इसी फाइल में यह फोटो चिपकाए जाते हैं। किसी अखबार में अगर फोटो आ गई है तो सोने पर सुहागा। उसकी कटिंग भी फाइल का हिस्सा बन जाती है। अब बड़े नेता इन लोगों से परेशान है, पार्टी लाइन के कारण कुछ बोल भी नहीं पाते। करे तो आखिर क्या करें। हमारी सलाह तो सिर्फ इतनी है कि टिकट के लिए काम करने के बजाय जनता के लिए काम करेंगे तो कल जनता भी बोलेगी कि इन्हें टिकट दो। अगर काम नहीं करेंगे तो जीते हुए हैं, उन्हें हराने में भी कसर नहीं छोड़ते। अच्छा होगा कि फोटो राजनीति के बजाय काम की राजनीति करें।

महिला नेता भी सक्रिय

हालांकि बीकानेर में पूर्व की सीट पर सिद्धिकुमारी के अलावा कोई भी महिला नेता गंभीरता से टिकट की दावेदार नहीं है, फिर भी कांग्रेस और भाजपा दोनों में महिला नेता इन दिनों सक्रिय नजर आ रही है। खासकर भाजपा में महिला नेताओं के बीच प्रतिस्पद्र्धा ज्यादा नजर आ रही है। कार्यक्रमों में जिसकी चलती है, वो दूसरे पक्ष को आगे नहीं आने देती। यहां तक कि एक दूसरे के नंबर कम करवाने में भी पीछे नहीं रहती। अब चुनाव की बेला में अगर पुरुष नेता यह काम कर रहे हैं तो महिलाओं को क्या दोष दें?

सोशल मीडिया पर युद्ध

देशभर की राजनीति तो सोशल मीडिया पर होती ही है लेकिन अब स्थानीय राजनीति भी फेसबुक पर नजर आने लगी है। अधिकांश नेताओं ने अपने अपने ग्रुप बना लिए हैं, वो हर रोज कुछ न कुछ सोशल मीडिया पर डालते हैं, कभी तीखी मिर्च की तरह तो कभी अपने नेताओं की लड्डू जैसी मीठी बातों की टोकरी परोस देते हैं। विचारधारा से कम और व्यक्ति विशेष से ज्यादा जुड़े समर्थक अपने नेता के पक्ष में जमकर तर्क दे रहे हैं, हालांकि कई बार यह तर्क कुतर्क में बदल जाते हैं। कांग्रेस और भाजपा नेताओं ने तो जैसे अपने 'सोशल मीडिया वार रूमÓ तैयार कर लिए हैं, जहां से हर रोज सुबह सवेरे गोला दाग दिया जाता है। इसके बाद छिटपुट गोरीबारी दिनभर चलती रहती है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है लेकिन भाषा की अभद्रता कई बार रिश्तों को खराब भी कर देती है।

आखिर कब तक...

चुनाव नजदीक आने के साथ ही नेता तैयार बयानबाजी तो शुरू कर चुके हैं, लेकिन हकीकत में कोई काम नहीं हो रहा है। जिन नेताओं को टिकट चाहिए, वो अपने विधानसभा क्षेत्र तो दूर पार्षद क्षेत्र में भी भ्रमण नहीं कर पाए हैं। उन्हें नहीं पता कि उनके पार्षद क्षेत्र में कितनी सड़कें टूटी हुई है और कितनी नालियों से पानी बाहर निकल रहा है, किस स्कूल में शिक्षक नहीं है और किस अस्पताल में गॉज और पट्टी का टोटा चल रहा है। इसके बाद भी वो नेतागिरी करने से नहीं चूक रहे। जिस तरह हर बड़े पद पर पहुंचने से पहले मेहनत करनी होती है, ठीक वैसे ही जनता के वोट से विधायक बनने से पहले नेताओं को अपने क्षेत्र को पहचानना ही होगा। खासकर युवा नेताओं को इस दिशा में मेहनत करने की जरूरत है।

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ये बहस बड़ी है मस्त

इन दिनों शहर में चुनावी चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। चर्चा जल्दी ही बहस में तब्दील हो जाती है और फिर व्यक्तिगत आरोपों का लंबा सिलसिला चलता है। अंत आते आते मामला बिगड़ जाता है। चर्चा का सबसे बड़ा विषय है कि टिकट किसे मिलेगा। हर व्यक्ति के पास किसी भी नेता के टिकट काटने के दस तर्क मौजूद है। टीवी चैनल पर बैठे लोग जैसी बहस नहीं सकते, उससे ज्यादा जिम्मेदार और प्रभावी बहस यह लोग अपने तर्कों से कर जाते हैं। बात बीकानेर पूर्व और पश्चिम की हो या फिर खाजूवाला, नोखा, डूंगरगढ़ या फिर श्रीकोलायत की। सभी बड़े नेताओं के टिकट पाटे पर आसानी से काट लिए जाते हैं। किस नेता का किससे सीधा संपर्क है, यह नेताजी को पता है या नहीं? पाटे पर बहस कर रहे संभागी को सब पता होता है। किस नेता का बेटा चुनाव लड़ सकता है और किसका पोता तैयारी कर रहा है, इसकी खबर भी पाटे पर सबसे पहले आती है। मजे की बात तो यह है कि कई बार खबरों का पैमाना इतना बड़ा होता है कि वो खुद नेता को अपने तथ्यों के बारे में बताए तो हैरानी में पड़ जाए कि वो इतना बड़ा कब बन गया। दरअसल, जो लोग चुनाव लडऩा चाहते हैं, वो हर हाल में इन चर्चाओं को जारी रखना चाहते हैं। पाटों पर बैठे लोगों में कुछ तो इन्हीं में से हैं। वो कोशिश करते हैं कि सामान हो या ना हो, चर्चा में बने रहना जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्र में भी कई लोग अपने टिकट को लेकर आश्वस्त नहीं है लेकिन दूसरी पार्टी की पंचायती कर रहे हैं। पाटों की राजनीतिक चर्चा से ज्यादा मजबूत चर्चा तो गांवों में हो रही है। छुटभैये नेता भी इन दिनों दोनों पार्टियों के नेताओं को एक दूसरे के खिलाफ बोलकर पूरी तरह से लुत्फ उठा 

रहे हैं।

विपक्षी पार्टी का टिकट बता रहे विधायक

आमतौर पर विधायक अपनी ही पार्टी की पंचायती पूरी तरह से कर ले तो गनीमत समझी जाती है लेकिन बीकानेर के एक विधायकजी तो दूसरी पार्टी की पंचायती करने में भी नंबर वन है। दरअसल, भाजपा के एक विधायक जी को कांग्रेस के दिग्गज नेता पिछले दिनों नई दिल्ली में मिल गए तो उन्हें ज्ञान दे आए कि टिकट तो '***Ó को ही देना। वो ही एक मात्र विकल्प है आपकी पार्टी का। कांंग्रेस के दिग्गज नेता भी चकित थे कि अपने ही प्रतिद्वंद्वि की तारीफ कर रहा है यह विधायक। हकीकत तो यह है कि विधायकजी को लगता है कि जिसकी तारीफ कर रहे हैं, वो खड़ा होगा तभी मैं आराम से जीत पाऊंगा। इसीलिए...।


ये बेचारा काम का मारा

न सिर्फ वर्तमान सत्तारुढ़ पार्टी भाजपा बल्कि अपने समय में कांग्रेस ने भी कुछ ऐसे लोगों को जोड़कर रखा, जो छोटे बड़े खर्चों के वक्त अपना पर्स आगे बढ़ा देते हैं। चूंकि सत्ता भाजपा की है, इसलिए अधिकांश कामों के लिए भाजपा ने सूची तैयार कर रखी है। कोई भी छोटा-बड़ा नेता आए, खर्च संबंधित व्यक्ति को ही करना होता है। इन दिनों बड़े नेताओं के बीकानेर आगमन का सिलसिला चल पड़ा है तो व्यवस्था संभालने वाले 'प्रमुख कार्यकर्ताओंÓ को ही जिम्मा मिलता है। अब जो 'सेवाÓ दे रहे हैं, वो भी चाहते हैं कि किसी नए को पकड़ लो, ताकि खर्च आधा आधा हो जाए। यह बात अलग है कि नया आ नहीं रहा और पिछले चार साल से एक ही 'बेचाराÓ काम आ रहा है। अब संगठन में भले ही कोई बैठा हो खर्च के नाम पर इन चंद लोगों पर ही तलवार लटकती रहती है।


जाति बड़ी चीज है

आने वाले वक्त में आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक पार्टियों से भी ऊपर चला जाएगा। इन दिनों सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के खिलाफ आंदोलन कर रहे अनुसूचित जाति व जन जाति का जमकर विरोध और समर्थन हो रहा है। समर्थन और विरोध करने वालों में अधिकांश नेता अपनी पार्टी लाइन से हटकर आरक्षण की बात कर रहे हैं। मजे की बात है कि दोनों ही प्रमुख पार्टियों के कार्यकर्ता अपनी विचारधारा औरा अब तक के राजनीतिक पार्टी के विचारों को किनारे रखकर आरक्षण का समर्थन और विरोध कर रहा है। इक्का दुक्का नेताओं ने विपरीत धारा में जाकर समर्थन भी किया। सोशल मीडिया पर कांग्रेस और भाजपा के अंतिम पंक्ति के नेता पार्टी के बजाय आरक्षण का विरोध करते नजर आ रहे हैं। इतने ही लोग समर्थन में लामबंद हो रहे हैं।

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ये बहस बड़ी है मस्त

इन दिनों शहर में चुनावी चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। चर्चा जल्दी ही बहस में तब्दील हो जाती है और फिर व्यक्तिगत आरोपों का लंबा सिलसिला चलता है। अंत आते आते मामला बिगड़ जाता है। चर्चा का सबसे बड़ा विषय है कि टिकट किसे मिलेगा। हर व्यक्ति के पास किसी भी नेता के टिकट काटने के दस तर्क मौजूद है। टीवी चैनल पर बैठे लोग जैसी बहस नहीं सकते, उससे ज्यादा जिम्मेदार और प्रभावी बहस यह लोग अपने तर्कों से कर जाते हैं। बात बीकानेर पूर्व और पश्चिम की हो या फिर खाजूवाला, नोखा, डूंगरगढ़ या फिर श्रीकोलायत की। सभी बड़े नेताओं के टिकट पाटे पर आसानी से काट लिए जाते हैं। किस नेता का किससे सीधा संपर्क है, यह नेताजी को पता है या नहीं? पाटे पर बहस कर रहे संभागी को सब पता होता है। किस नेता का बेटा चुनाव लड़ सकता है और किसका पोता तैयारी कर रहा है, इसकी खबर भी पाटे पर सबसे पहले आती है। मजे की बात तो यह है कि कई बार खबरों का पैमाना इतना बड़ा होता है कि वो खुद नेता को अपने तथ्यों के बारे में बताए तो हैरानी में पड़ जाए कि वो इतना बड़ा कब बन गया। दरअसल, जो लोग चुनाव लडऩा चाहते हैं, वो हर हाल में इन चर्चाओं को जारी रखना चाहते हैं। पाटों पर बैठे लोगों में कुछ तो इन्हीं में से हैं। वो कोशिश करते हैं कि सामान हो या ना हो, चर्चा में बने रहना जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्र में भी कई लोग अपने टिकट को लेकर आश्वस्त नहीं है लेकिन दूसरी पार्टी की पंचायती कर रहे हैं। पाटों की राजनीतिक चर्चा से ज्यादा मजबूत चर्चा तो गांवों में हो रही है। छुटभैये नेता भी इन दिनों दोनों पार्टियों के नेताओं को एक दूसरे के खिलाफ बोलकर पूरी तरह से लुत्फ उठा 

रहे हैं।

विपक्षी पार्टी का टिकट बता रहे विधायक

आमतौर पर विधायक अपनी ही पार्टी की पंचायती पूरी तरह से कर ले तो गनीमत समझी जाती है लेकिन बीकानेर के एक विधायकजी तो दूसरी पार्टी की पंचायती करने में भी नंबर वन है। दरअसल, भाजपा के एक विधायक जी को कांग्रेस के दिग्गज नेता पिछले दिनों नई दिल्ली में मिल गए तो उन्हें ज्ञान दे आए कि टिकट तो '***' को ही देना। वो ही एक मात्र विकल्प है आपकी पार्टी का। कांंग्रेस के दिग्गज नेता भी चकित थे कि अपने ही प्रतिद्वंद्वि की तारीफ कर रहा है यह विधायक। हकीकत तो यह है कि विधायकजी को लगता है कि जिसकी तारीफ कर रहे हैं, वो खड़ा होगा तभी मैं आराम से जीत पाऊंगा। इसीलिए...।


ये बेचारा काम का मारा

न सिर्फ वर्तमान सत्तारुढ़ पार्टी भाजपा बल्कि अपने समय में कांग्रेस ने भी कुछ ऐसे लोगों को जोड़कर रखा, जो छोटे बड़े खर्चों के वक्त अपना पर्स आगे बढ़ा देते हैं। चूंकि सत्ता भाजपा की है, इसलिए अधिकांश कामों के लिए भाजपा ने सूची तैयार कर रखी है। कोई भी छोटा-बड़ा नेता आए, खर्च संबंधित व्यक्ति को ही करना होता है। इन दिनों बड़े नेताओं के बीकानेर आगमन का सिलसिला चल पड़ा है तो व्यवस्था संभालने वाले 'प्रमुख कार्यकर्ताओंÓ को ही जिम्मा मिलता है। अब जो 'सेवा' दे रहे हैं, वो भी चाहते हैं कि किसी नए को पकड़ लो, ताकि खर्च आधा आधा हो जाए। यह बात अलग है कि नया आ नहीं रहा और पिछले चार साल से एक ही 'बेचारा' काम आ रहा है। अब संगठन में भले ही कोई बैठा हो खर्च के नाम पर इन चंद लोगों पर ही तलवार लटकती रहती है।


जाति बड़ी चीज है

आने वाले वक्त में आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक पार्टियों से भी ऊपर चला जाएगा। इन दिनों सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के खिलाफ आंदोलन कर रहे अनुसूचित जाति व जन जाति का जमकर विरोध और समर्थन हो रहा है। समर्थन और विरोध करने वालों में अधिकांश नेता अपनी पार्टी लाइन से हटकर आरक्षण की बात कर रहे हैं। मजे की बात है कि दोनों ही प्रमुख पार्टियों के कार्यकर्ता अपनी विचारधारा औरा अब तक के राजनीतिक पार्टी के विचारों को किनारे रखकर आरक्षण का समर्थन और विरोध कर रहा है। इक्का दुक्का नेताओं ने विपरीत धारा में जाकर समर्थन भी किया। सोशल मीडिया पर कांग्रेस और भाजपा के अंतिम पंक्ति के नेता पार्टी के बजाय आरक्षण का विरोध करते नजर आ रहे हैं। इतने ही लोग समर्थन में लामबंद हो रहे हैं।

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उम्मीद से ज्यादा खरी सुन गए

भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी रणभेरी कांग्रेस के मुकाबले जल्दी भर दी है। कांग्रेस अभी रणनीति तय कर रही है लेकिन भाजपा ने टूटते जनाधार को संभालने के लिए अपनी फौज को मैदान में उतार दिया है। इसी फौज के कप्तान अशोक परनामी तीन दिन की यात्रा पर बीकानेर आए। श्रीगणेश ही ऐसा हुआ कि पहले ही दिन उन्हें यात्रा बीच में छोड़कर वापस जाना पड़ा। कयास लगाए गए कि उन्हें अब अध्यक्ष के रूप में वापस देखने का अवसर नहीं मिलेगा लेकिन ऊपर ऐसा कुछ नहीं था, जैसा नीचे सोचा गया था। परनामी अगले दिन ही वापस लौट आए। एक-एक विधानसभा की क्लास ली। मास्टरजी की तरह एक नहीं बल्कि दो दो विधायकों को अच्छी खासी डांट लगा दी। पहले बीकानेर पश्चिम के विधायक गोपाल जोशी को और दूसरी खाजूवाला के विधायक डॉ. विश्वनाथ को। जोशी ने अपने ही कार्यकर्ताओं को विरोधी बताया था तो डॉ. विश्वनाथ ने अपने क्षेत्र में अतिक्रमण के नाम पर तोड़े गए मकानों के बारे में कोई जानकारी नहीं होने की बात कह दी। अध्यक्षजी ने कहा आपको अपने विधानसभा क्षेत्र की जानकारी नहीं है तो फिर क्या कर रहे हैं आप? एक विधायक ने बैठक में नहीं आने का साहस भी दिखा दिया। बीकानेर पूर्व की बैठक हुई, चर्चा हुई, बहस हुई लेकिन विधायक सिद्धि कुमारी नहीं थी। अध्यक्ष की बैठक में नहीं आने को हिम्मत ही कहा जाएगा। शिकायतों का सबसे बड़ा अंबार लेकर जो नेताजी हाजिर हुए वो हमारे महापौर नारायण चौपड़ा थे। चौपड़ा जी के बारे में पार्षदों ने इतनी शिकायतें की, जितने दिन उन्होंने महापौरी नहीं की। रही सही कसर पूर्व मंत्री देवीसिंह भाटी ने पूरी कर दी। देशनोक के मंच पर उन्होंने जितनी खरी कही, उतनी तो उम्मीद भी नहीं की होगी।

परिवर्तन यात्रा की चर्चा तेज

कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा अब चर्चा में आ रही है। पूर्व प्रदेशाध्यक्ष डॉ. बी.डी. कल्ला ने प्रत्येक वार्ड में पहुंचकर जन समस्याओं को सुनना शुरू किया तो क्षेत्र के लोगों का दर्द उभर कर सामने आ गया। अब भाजपा नेता इसे चुनावी तैयारी बता रहे हैं तो कांग्रेस इसे सधी हुई शुरूआत बता रहे हैं। इतना तय है कि प्रदेश में भले ही कांग्रेस की तैयारी मंद गति से चल रही है लेकिन बीकानेर में पार्टी एकजुट होकर लडऩे की कोशिश में है। जिस वार्ड में परिवर्तन यात्रा पहुंच रही है, वहां उसी वार्ड के लोगों को साथ लिया जा रहा है। भाजपा नेता अभी तक तो इस यात्रा का जवाब दे नहीं पा रहे हैं।

एक अच्छा काम ये भी

वैसे तो सोशल मीडिया महज चर्चा का केंद्र है, अपनी भड़ास निकालने का माध्यम है या फिर स्वयं की तारीफ करवाने का जरिया है लेकिन इस बीच कुछ काम अच्छे भी हो जाते हैं। टीम बीकानेर से जुड़े लक्ष्मण मोदी ऐसे ही मुद्दे फेसबुक पर डालते रहते हैं। पिछले दिनों पीबीएम अस्पताल के आगे टूटी हुई जालियों को उन्होंने खुद ठीक किया तो इस बार अम्बेडकर सर्किल पर हो रहे बेतरतीब निर्माण कार्य की तरफ ध्यान आकर्षित करवाया। उन्होंने बताया कि ऊंची दीवार सर्किल पर बनी तो दुर्घटनाएं बढ़ेगी। न्यास अध्यक्ष महावीर रांका ने जब इस पोस्ट को देखा तो तुरंत काम रुकवाया और इंजीनियर भेजकर इसे दुरुस्त करवाया। वैसे शिकायत सांसद अर्जुन मेघवाल से भी की गई थी। खैर काम किसी ने भी करवाया तो लक्ष्मण मोदी के प्रयास से दुर्घटना की आशंका कम जरूर हो गई।

नतीजा क्या होगा

अब अध्यक्षजी की यात्रा के बाद कार्यकर्ताओं का सवाल है कि इतनी सुनी है, उसका नतीजा क्या होगा? जवाब भी एक कार्यकर्ता ने ही दिया कि अध्यक्षजी को पता है कि इनकी एक बार सुन लो। न तो हमारे पास नए कार्यकर्ता आने वाले हैं और न हमारे कार्यकर्ताओं को कोई दूसरी पार्टी पकडऩे वाली है। ऐसे में दोनों को यही रहकर काम करना है। भाजपा कार्यकर्ताओं की यह विशेषता है कि वो लड़ाई कितनी भी कर लें लेकिन जब राष्ट्रवाद, भ्रष्टाचार और कांग्रेस का नाम लिया जाता है तो तुरंत प्रभाव से एक भी हो जाते हैं। अच्छी बात है। पार्टी इसी भावना का फायदा उठाकर अपने लोगों को आगे ले आती है और कार्यकर्ता हमेशा पीछे रह जाता है। भाजपा की यात्रा का नतीजा क्या होगा? जवाब तो आप समझ ही गए होंगे।

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आओ 'सुराना जी' से सीखें

विधानसभा में जब मानिकचंद सुराना को श्रेष्ठ विधायक का सम्मान दिया जा रहा था, तब उनके प्रशसंक खुश हो रहे थे लेकिन भाजपा में कई लोगों के चेहरे उदास थे। दरसअल, इस वयोवृद्ध नेता ने कई युवा चेहरों को हराकर विधानसभा में फिर अपना स्थान बनाया था। ऐसे में उनके प्रतिद्वंद्वियों का नाराज होना तो जायज था। कुछ नेता इस बार भाजपा से टिकट लेना चाहते हैं, वो भी सुराना की इस उपलब्धि से ज्यादा खुश नहीं हो रहे थे, उन्हें लगा कि सुराना वापस पार्टी में आए तो उन्हें नुकसान हो सकता है। किसी का खुश होना और नाराज होना अपनी जगह है लेकिन मानिक चंद सुराना के व्यक्तित्व, राजनीतिक जीवन और उनकी दृढ़ता से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। उनका सम्मान वर्ष २०१४ के लिए हुआ है लेकिन उनकी लड़ाई और हर लड़ाई में जीत उनके लंबे राजनीतिक जीवन का हिस्सा है। ऐसे में सिर्फ वर्ष २०१४ तक उन्हें सीमित करना भी उचित नहीं है। कई बार शिकायतों के चलते कार्यकर्ता और वोटर उनसे नाराज भी होते हैं लेकिन हर बार वो किसी न किसी जन मुद्दे पर ही अपनी शिकायत को अंजाम देते हैं। सुराना की लड़ाईयों से भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है, जिसमें उन्होंने किसान, गरीब और मध्यम वर्ग के लिए आवाज उठाई है। पिछले दिनों उन्हें सम्मान मिलने के बाद सोशल मीडिया में यह मुद्दा भी उठाया गया कि लूणकरनसर में विकास नहीं हो रहा। वो शायद यह भूल रहे हैं कि उसी लूणकरनसर से दूसरे विधायक भी निकले हैं, मंत्री भी बने हैं लेकिन जो दर्जा इस क्षेत्र को मिलना चाहिए था, वो नहीं मिला। सुराना के कार्यकाल पर सवाल तो उठाए जा सकते हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक इच्छा शक्ति पर सवाल उठाना बेमानी है।

बधाईयों में भी राजनीति है

अब बधाई तो बधाई है, लेकिन सोशल मीडिया पर बधाई में भी राजनीति नजर आती है। कई बड़े नेताओं के बड़े सिपहसालार फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर सक्रिय है। वो हर रोज कुछ न कुछ पोस्ट करते हैं लेकिन करते वो ही है, जो उनके नेताजी को पसंद हो। न सिर्फ वो पोस्ट करते हैं बल्कि पार्टी को किनारे रखकर अपने नेताजी के विचारों का ही समर्थन करते हैं। अब राज्यसभा की सीटों की घोषणा होने के बाद कई नेताओं ने बधाई बांटी लेकिन इसमें राजनीति साफ नजर आई। जिस तरह के शब्दों का उपयोग हुआ, उसका उनकी ही पोस्ट पर जमकर विरोध भी हुआ।

अब धर्मयात्रा की चर्चा

बीकानेर में एक बार फिर धर्मयात्रा को लेकर चर्चा जोरों पर हैं। १८ मार्च को होने वाली इस धर्म यात्रा को लेकर उन नेताओं के लिए हर बार उहापोह की स्थिति बन जाती है, जो हिन्दू धर्म यात्रा में शामिल तो होना चाहते हैं लेकिन भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सहित अन्य संगठनों के झंडे के नीचे नहीं आना चाहते। आयोजक बार बार इसे गैर राजनीतिक बता रहे हैं लेकिन राजनीति है कि आड़े आ ही जाती है। पिछली बार भी इस इस यात्रा में सभी पार्टियों के लोग शामिल हुए थे और इस बार भी सभी को जोडऩे का प्रयास है। अच्छी बात देखने को मिली कि विचारधारा को किनारे रखकर इस यात्रा का वैभव बढ़ाने के लिए कई दिग्गज नेताओं के परिजन सार्वजनिक मंच पर भी आए हैं। यात्रा अच्छा संदेश दे, सद्भाव को बढ़ावा दें यह सभी चाहते हैं। प्रशासन भी ऐसा ही कुछ चाहता है।

रैली में कितने गए?

पिछले दिनों झुंझुनूं में प्रधानमंत्री की रैली के लिए बड़ा जबर्दस्त अभियान चलाया गया। हर कोई बसों के दावे करता रहा, कोई चार बस तो कोई पांच बस के लिए दावे कर रहा था। हकीकत यह थी कि जितनी बसें बीकानेर से जयपुर लिखवाई गई थी, उतनी बसें तो जिला परिवहन अधिकारी के रिकार्ड में ही नहीं थी। वैसे भी दबाव इसी महकमें पर था कि वो बसों की व्यवस्था करे। आला अधिकारियों ने कुछ बड़े नेताओं के दबाव में बसों का जुगाड़ भी करवाया लेकिन इसके बाद भी सुबह सवेरे तैयार हुए कार्यकर्ताओं को बसों के अभाव में वापस लौटना पड़ा। अब सवाल यह है कि अगर बस परिवहन विभाग ने नहीं भेजी तो अपनी ही कर लेते। कुछ नेता अपनी 'पर्सनलÓ कार से गए भी और फेस बुक पर लाइव भी चलाया कि हम जा रहे हैं।

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कसमसाहट, इधर भी-उधर भी

जिले के एक बड़े नेता भाजपा में वापस आ रहे हैं। इस आशय की खबर चर्चा में आई तो इधर और उधर दोनों तरफ कसमसाहट चालू हो गई। नेताजी की अभी वाली पार्टी के नेता तो यह सोचकर खुश थे कि अगले चुनाव में एक दावेदार कम हो जाएगा, उधर वाले इसलिए खुश थे कि उनके बिना कुछ युवा नेताओं का मन है कि लगता नहीं। हालांकि कुछ बड़े नेताओं के पेट में दर्द भी होने लगा कि यह फिर आ गए तो हमारा क्या होगा? राजनीति में दोस्त कभी दोस्त नहीं होता और दुश्मन हमेशा के लिए दुश्मन नहीं होता। अब यह खबर आई तो पुष्टि के लिए हमने इधर-उधर झांकने के बजाय सीधे नेताजी को ही फोन लगा दिया। उनका जवाब इतना जबर्दस्त था कि 'मेरी किस्मत में विपक्ष ही थोड़े लिखा है?Ó बात भी सही है जिस जहाज में सवार हो, वो किनारे पहुंच रहा है तो डूबने वाले जहाज में सवार क्यों हो? हालांकि यह भविष्य के गर्त में है कि जहाज डूबेगा या नहीं? पिछले दिनों जहाज में पानी आने की बात पता चली। १७ छेद तो पूरी तरह से सामने आ गए, बाकी का पता लगाया जा रहा है। ऐसे में नेताजी के इस कथन को समझदारी भरा निर्णय कहना ही पड़ेगा। यह भी कह सकते हैं कि बार बार गलती नहीं होती।

अब उधर, बैठे एक नेताजी घर वापस आने के लिए मशक्कत कर रहे हैं। वो मान गए कि उनका मन इधर लगता ही नहीं। वो डेढ़ सौ से ज्यादा छेद वाला जहाज छोड़कर दौड़ते जहाज में चढ़े थे लेकिन उन्हें मनपसंद जगह नहीं मिल पाई। जो जहाज डूबा था, उसमें वो आगे की सीट पर थे लेकिन अब बहुत पीछे की सीट नसीब हो पा रही है। यह भी चाहते हैं कि एक बार सत्तासीन जहाज पर ही सवारी की जाए। पुराने रसूख काम आने ही चाहिए।

युवाओं पर रहेगी नजर

अब हर काम चुनावी है। बड़े नेता तो अपने स्तर पर चुनावी तैयारियों में जुट भी गए हैं। बूथ स्तर पर कामकाज शुरू हो गया है। मतदाताओं की संख्या में भारी वृद्धि इसी का परिणाम है। लगभग सभी विधानसभा क्षेत्रों में तीस से चालीस हजार के बीच नए मतदाता है। यह सभी मतदाता १८ वर्ष से २२ वर्ष की आयु के हैं, जिन्हें संभवत: पहली बार मतदान करने का अधिकार मिलेगा। ऐसे में इन युवाओं को ध्यान में रखकर ही बड़े नेता अपनी योजनाएं बना रहे हैं। कार्यक्रमों में उपस्थिति की बात हो या फिर अपने व्यक्तिगत आयोजन हो, हर कहीं युवा शक्ति पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। चुनाव में जरूरी भी है।

एक गैर राजनीतिक अच्छा प्रयास

चुनावी दौर में हर काम चुनावी होता है लेकिन शहर की एक कॉलोनी ने राजनीति को किनारे रखकर अपना मंच बना लिया है। मुरलीधर व्यास कॉलोनी के युवाओं के प्रयास से यहां व्हाट्सएप ग्रुप के माध्यम से सभी लोगों को जोडऩे का प्रयास किया गया। व्हाट्सएप से बाहर निकलकर ग्रुप के सदस्यों ने पिछले दिनों 'फेस टू फेसÓ मुलाकात की। इसके बाद ही एक 'गेट टू गेदरÓ रखा गया है। कुछ ही दिनों में सभी सदस्य मिलेंगे। अच्छी बात है कि गैर राजनीतिक रूप से एक समूह अपने क्षेत्र के विकास की बात कर रहा है। पूरी तरह से उपेक्षित इस कॉलोनी के लोगों को इस एकजुटता का परिणाम भी मिलेगा। जिन लोगों को यहां राजनीति करने का शौक है, उन्हें भी संयम बरतना होगा। कई बार अच्छे काम कुछ लोगों के कारण बिगड़ जाते हैं, सब मिलकर सकारात्मक सोच रखेंगे तो विकास भी होगा।

बीकानेर पूर्व से कौन?

बीकानेर पूर्व विधानसभा सीट से इस बार कौन कौन दावेदार होगा? यह सवाल इन दिनों चर्चा में है। हालांकि सोशल मीडिया पर पूर्व के बजाय पश्चिम पर ज्यादा चर्चा होती है लेकिन पूर्व से कांग्रेस उम्मीदवार को लेकर कयास का दौर तेज हो गया है। जो भी राजनीति में थोड़ा बहुत सक्रिय होने की कोशिश करता है, वो ही पूर्व का दावेदार घोषित हो जाता है। दरअसल, बीकानेर पूर्व एक ऐसी सीट है, जहां जातीय और धार्मिक राजनीति संभव नहीं है। वहां सभी जातियों के लोग हैं, सभी आर्थिक तबके के लोग हैं। ऐसे में कांग्रेस को भी ऐसे नेता की जरूरत है जो पूर्व राजपरिवार की सदस्या और दो बार की विधायक सिद्धि कुमारी को टक्कर दे सके। मामला इतना आसान नहीं है, जितना कांग्रेस के नेता समझ रहे हैं।

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लोकतांत्रिक संस्थाएं कब स्वीकार करेगी संविधान को

गणतंत्र दिवस पर सभी को शुभकामनाएं। उनको विशेष रूप से बधाई है, जो न तो गण को मानते हैं और न तंत्र को स्वीकार करते हैं। वर्ष 1950 में हम जिस संविधान को लेकर भारत को गरीब से विकासशील देश बनाने की जुगत में जुटे थे और आज जिस विकासशील भारत को विकसित बनाने का सपना संजो रहे हैं, उस संविधान को धार्मिक ग्रंथ की तरह लेते तो भारत आज अमेरिका, चीन और दूसरे विकसित राष्ट्रों से कमजोर नहीं होता। नि:संदेह वर्ष 1947 के भारत को बहुत पीछे छोड़कर हमने नए भारत को बनाया है, लेकिन दुख की बात है कि जिन लोगों पर संविधान को लागू करने का जिम्मा था, उन्होंने पूरी शिद्दत के साथ अपना कर्म नहीं किया। हमारी तरक्की के मुख्य कारक देशवासी ही है। जिन संस्थाओं (लोकसभा, राÓयसभा और विधानसभाओं) को यह जिम्मा सौंप रखा है वो देशवासियों की मानवशक्ति का सही उपयोग करने के बजाय दुरुपयोग करती है। सवा सौ करोड़ भारतीयों का यह देश ऐसे विवादों में उलझा रहता है, जिसका न सिर है न पैर। यह चर्चाएं किसी बाहरी देश से नहीं आती, बल्कि हमारे नेता ही उठाते हैं। एक नेताजी कुछ ऊटपटांग बोलेंगे और पूरा देश और मीडिया उसकी बकवास पर चर्चा करना शुरू कर देती है। आखिर क्यों, राष्ट्र की मानवशक्ति सकारात्मक के बजाय नकारात्मक दिशा में बढ़ती जा रही है। ताजा उदाहरण 'पद्मावत' की ही ले सकते हैं। जब देशवासी और जाति विशेष के लोग नहीं चाहते कि उनकी भावनाओं को आहत किया जाए तो क्या जरूरी है, ऐसे विषय पर फिल्म बनाई जाए? क्या हम पद्मावत फिल्म को नहीं देखेंगे तो कुछ उम्र कम हो जाएगी। आखिर क्यों ऐसे विषयों को ढूंढा जाता है, जिस पर आपत्ति हो, झगड़ा हो, फसाद हो। पूरी तरह से मार्केटिंग और प्रोफेशनल हो चुके फिल्म निर्माता और न्यूज चैनल इस देश की भोली भाली जनता को बातों में उलझा देते हैं और हर कोई बस उसी मामले में शामिल होने में जुट जाता है। विरोध है, विरोध है, समर्थन है, समर्थन है, समर्थन है। क्यों विरोध है और क्यों समर्थन है, अधिकांश लोग नहीं जानते। 

हमारे संविधान के प्रथम पृष्ठ बताया गया है कि भारत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। क्या सच में यह हालात है? शायद नहीं है। टीवी चैनल की बहस (अमूमन बकवास भी) में लड़ते हिन्दू और मुसलमान साफ बयां करते हैं कि देश में सभी के मन में सभी भावनाओं का सम्मान नहीं है। आखिर कोई व्यक्ति इस मुद्दे पर उ"ातम न्यायालय में क्यों नहीं जाता कि धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में धार्मिक मुद्दों पर सार्वजनिक बहस क्यों होती है? क्यों हम किसी भी व्यक्ति को दूसरे धर्म के खिलाफ बोलने की आजादी दे देते हैं और वो भी एक ऐसे राष्ट्रीय चैनल पर, जिसे लाइव हजारों-लाखों लोग देख रहे हैं।
युवाओं की समस्याओं को निपटाने के लिए देश की संसद क्या कर रही है। जिस देश की सरकारें युवाओं को नौकरी देने के नाम पर हर साल अरबों रुपए की कमाई करती है, उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है? आश्चर्य की बात है कि हम किसान का कर्ज माफ कर रहे हैं, बैंक में समय पर ऋण की किश्त जमा नहीं कर रहे लोगों को ब्याज माफ कर रहे हैं, अमीर गरीब देखे बगैर दवाएं मुफ्त बांट रहे हैं और स्कूलों में फ्री पढ़वा रहे हैं, वहां युवा को नौकरी के लिए निशुल्क आवेदन करने की छूट नहीं है। बेहतर होगा कि सरकार यह तय कर दें कि एक तय प्राप्तांक तक पहुंचने वाले युवा को तो कम से कम शुल्क वापस कर देंगे। वो एक पद के लिए एक बार पंजीयन कर लें और बाद में उस पद के लिए आवेदन निशुल्क कर दें। दुख की बात है कि इस मुद्दे पर देश का कोई नेता नहीं बोलता। किसी भी पार्टी के घोषणा पत्र में ऐसा साहस नहीं है। वैसे भी घोषणा पत्र तो महज मुर्ख बनाने का जरिया रह गया है। कांग्रेस हो या फिर भाजपा, सभी हजारों, लाखों युवाओं को रोजगार देने की घोषणा करती है लेकिन चार साल बाद जब हिसाब देने का वक्त आता है तो निजी स्कूलों में दो-तीन हजार रुपए की नौकरी करने वालों की संख्या भी सरकार अपने आंकड़ों में जोड़कर दिखा देती है।
संविधान में कहां बताया गया है कि नेता को सिर्फ अपनी पार्टी के पक्ष में बोलना है? वो सांसद, विधायक यहां तक कि पार्षद बनने के बाद भी गलत को गलत कहने की हिम्मत खो देता है। जो पार्टी के हित में है, वो ही सही है। पार्टी लाइन पर चलने वाले हमारे जनप्रतिनिधि देश की लाइन पर कब चलेंगे? आज हमें ही तय करना होगा कि हम गण और तंत्र दोनों का सम्मान करेंगे। नेताओं के लिए पार्टी पहले हो सकती है, लेकिन हम देशवासियों के लिए देश ही सबसे पहले हैं। आज शपथ लें कि धार्मिक ग्रंथ की तरह हम संविधान का भी सम्मान करेंगे।

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कांग्रेस का यह कैसा डीएनए

न सिर्फ गाय बल्कि गौ के पूरे वंश यानी गौ वंश की रक्षा के लिए अचानक से कांग्रेसी चिंतित हो गए हैं। राहुल गांधी एक बात बार बार बताते हैं कि कांग्रेस के डीएनए में क्या-क्या है। इतना निश्चित है कि यह गाय कभी कांग्रेस के डीएनए में नहीं थी। इसके बाद भी उनकी पार्टी के बैनर तले इस तरह हिन्दूवादी नीति रीति की न सिर्फ बातें बल्कि उनकी आस्था से जुड़े मुद्दों की बात भी हो रही है, तथाकथित चिंता हो रही है और इसी चिंता का जमकर जिक्र हो रहा है। कांग्रेस के डीएनए में नहीं होते हुए भी ऐसा क्यों हो रहा है, इसका जवाब 'कींकरिया क्लबÓ के एक साथी ने दे दिया। उन्होंने कहा कि गोपाल गहलोत के डीएनए में गाय और हिन्दूवादी राजनीति थी। वो कांग्रेस में आकर भी वैसा ही कर रहे हैं। एक दूसरे नेता जो कांग्रेस से भाजपा में चले गए हैं, वो आज भी कांग्रेसी स्टाइल में ही राजनीति कर रहे हैं। बताते हैं कि पिछले दिनों वो खुद यह स्वीकार कर चुके हैं कि वो कांग्रेसी स्टाइल में ही राजनीति कर सकते हैं। 

दरअसल, कांग्रेस और भाजपा के जिन नेताओं ने पिछले चुनाव में पार्टी बदली थी, उनमें अधिकांश का अपनी मूल पार्टी में ही मन लगता है। एक नेताजी अब कांग्रेस में आ गए हैं लेकिन साथी और 'चेलेÓ अब भी भाजपा में ही है। ऐसे में वो स्वयं कांग्रेस में रहकर भाजपा के अपने मित्रों को अब तक संभाले हुए हैं। भाजपा के युवा नेताओं का समर्पण इन नेताजी के प्रति इतना जबर्दस्त है कि वो चाहकर भी उन्हें छोड़ नहीं पाते। अच्छी बात है। राजनीति किसी पार्टी की सीमाओं में बंधकर नहीं की जा सकती। प्रतिबद्धता एक पार्टी के प्रति हो सकती है लेकिन मित्रता सभी के साथ होनी चाहिए। बीकानेर में दो पार्टियों के बीच ऐसी मित्रता देखकर मन को सुकून मिलता है।


फिर से कर्मचारी नेता सक्रिय है


विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही कर्मचारी नेता फिर सक्रिय हो गए हैं। विभिन्न विभागों की राजनीति कर रहे कर्मचारी नेता जैसे ही चुनाव आते हैं अपनी राग तेज कर देते हैं। उनके साथ वाले भी समझ जाते हैं कि इन्हें चुनाव लडऩा है, वो ही उन्हें पीछे धकेलना शुरू कर देते हैं। दो कर्मचारी नेता इस बार भी टिकट की कोशिश में है। एक नेताजी बीकानेर में राजनीति करते हैं और दूसरे जयपुर में। दूसरे वाले नेताजी कभी कभार ही जयपुर से बीकानेर आते हैं। वो सत्ता के नजदीक है लेकिन सत्ता का हिस्सा अब तक नहीं बन पाए। पिछले दो विधानसभा चुनाव में उनका नाम आता है, टिकट नहीं आता।


बेनीवाल बिगाड़ रहे हैं फिल्डिंग

हनुमान बेनीवाल ने प्रदेश की राजनीति में अड़ंगा डाला है तो बीकानेर में भी उनसे कई बड़े नेता अब परेशान हो रहे हैं। लाखों युवाओं की मीटिंग करने वाले राजस्थान के इक्का दुक्का नेताओं में से एक हनुमान बेनीवाल ने जैसे ही बीकानेर में हुकार रैली करने की घोषणा की, वैसे ही कई नेताओं के चेहरे पर चिंता की लकीरे नजर आने लगी है। दरअसल, बेनीवाल अगर यहां मजबूत होते हैं तो कई विधानसभा सीटों पर असर डाल सकते हैं। उनसे सर्वाधिक कांग्रेस प्रभावित होगी। नोखा, श्रीडूंगरगढ़ और लूणकरनसर सीटों पर बेनीवाल की प्रभावी उपस्थिति रहती है तो इसका सीधा लाभ भारतीय जनता पार्टी को जाने वाला है। दरअसल, कांग्रेस विचारधारा के किसान मतों का बंटवारा ही बेनीवाल करेंगे। पिछले दिनों पत्रकार सम्मेलन में उनसे यह सीधा सवाल पूछा तो वो हंसी मजाक में टाल गए।

जिसा छोड़ग्या, बिसा ही हां

पद के साथ व्यक्ति की विचारधारा बदल जाती है। व्यस्तता भी बढ़ जाती है। इसी विचारधारा और व्यस्तता के बीच कई बार अपने पराए होने लगते हैं। अब तक जो लोग हमारे आगे पीछे दौड़ रहे थे, वो ही लोग बोझ लगने लगते हैं। उन्हें जरा से टेढ़ा बोला नहीं कि वो किनारे हो जाते हैं। न सिर्फ किनारा करते हैं बल्कि विरोधी उसे तुरंत अपने साथ जोड़ भी लेते हैं। पिछले दिनों कांग्रेस के एक कद्दावर नेता को कुछ ऐसा ही अहसास हुआ। इनके पास सत्ता नहीं होने के बावजूद दबदबा होने के कारण स्वभाव में अंतर देखा गया। एक युवा नेता उनसे नाराज हो गए। जब पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की उपस्थिति में इस बड़े नेता ने अपने युवा नेता से कुशलक्षेम पूछी तो युवा नेता ने यह कहकर किन्नी काट ली..'जिसा थे छोड़ग्या हा, बिसा ही हांÓ

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कांग्रेस का मुकाबला कांग्रेस से

पिछले दिनों राजनीतिक दृष्टि से कई बड़े घटनाक्रम सामने आए। संयोग है कि दोनों ही घटनाक्रम कांग्रेस के थे और आपसी फूट से जुड़े थे। यह साबित हो गया कि जनता ने कांग्रेस को सत्ता देने का मानस बनाया है या नहीं बनाया है, यह भविष्य के गर्त में है लेकिन स्वयं कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया है कि उनकी सरकार आ रही है। पार्टी में जीत का कोई सवाल नहीं है, मुद्दा तो सिर्फ मुख्यमंत्री कौन बनेगा? इसका है। यही कारण है कि हाल ही में जब पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बीकानेर आए तो कांग्रेस के मुख्यमंत्री का मुद्दा खड़ा हो गया। पहले उन्होंने सीकर में जो कुछ कहा, वो खबर का हिस्सा बना और बाद में उनकी उपस्थिति में रामेश्वर डूडी जिंदाबाद के  नारे चर्चा का केंद्र बने। दरअसल, कांग्रेस में इन दिनों तीन नेता मुख्यमंत्री पद के दावेदार है। पहले स्वयं अशोक गहलोत, दूसरे प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट और तीसरे नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी। ऐसे में डूडी समर्थक पूरे जोश के साथ जिंदाबाद के नारे लगाने से नहीं चूक रहे थे। लोकतंत्र में इस तरह की स्वतंत्रता हर किसी को है लेकिन चुनाव से दस महीने पहले इसे जल्दबाजी कहा जाएगा। पार्टी को अभी अपनी जीत सुनिश्चित करनी है, जिसके लिए माहौल बनता फिलहाल नजर नहीं आ रहा है। दूसरा मामला था खाजूवाला का। यहां भी कांग्रेस खुद से उलझती नजर आई। एक तरफ तो कांग्रेस के देहात अध्यक्ष महेंद्र गहलोत प्रदर्शन में जुटे थे तो दूसरी तरफ कांग्रेस के नेता गोविन्द मेघवाल। इस विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस ने अपनी फूट चुनाव से पहले ही स्पष्ट कर दी। देहात अध्यक्ष महेंद्र गहलोत ने जिस तरह का प्रदर्शन यहां किया है, उससे साफ है कि वो व्यक्तिगत राजनीति में विश्वास रखते हैं।

पत्रबाजी का सिलसिला शुरू हुआ

कांग्रेस के अंदरुनी कलह का ही नमूना है कि पार्टी के नेता अपने ही पदाधिकारियों के खिलाफ जमकर पत्रबाजी कर रहे हैं। खासकर खाजूवाला मामले के बाद देहात अध्यक्ष महेंद्र गहलोत को घेरने की तैयारी पूरी हो रही है। एक ही दिन में दो आयोजन से पहले भी गहलोत के खिलाफ प्रदेशाध्यक्ष को पत्र लिखा गया था और नए सिरे से फिर गहलोत की शिकायत की जा रही है। इस बार प्रदेश अध्यक्ष के साथ नवनिर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी तक बात पहुंचाने का प्रयास हो रहा है कि यहां पार्टी को अपने ही पदाधिकारियों से नुकसान हो रहा है। यह बात अलग है कि गहलोत भी पूरी तैयारी करके मैदान में है।

क्रिकेट के बहाने राजनीति

क्रिकेट के बहाने राजनीति उ"ा स्तर पर तो होती रही है लेकिन जिला स्तर पर ऐसा मामला पहली बार ही सामने आया है। पिछले दिनों पुष्करणा स्टेडियम पर आयोजित एक क्रिकेट प्रतियोगिता के शानदार आयोजन के बाद एक नेताजी ने मंच पर खड़े होकर जमकर भाषण दिए। अपनी जाति के लिए काफी जोश और खरोश के साथ बात रखी। अ'छी बात है। इसके साथ ही उन्हें यह भी बताना था कि वो इस मैदान के लिए क्या कर रहे हैं। दुखद बात है कि बीकानेर पश्चिम विधानसभा में एक भी ऐसा खेल मैदान नहीं है जहां खिलाड़ी पूरे विश्वास के साथ अपना समय दे सकें। पुष्करणा स्टेडियम में ुसुविधा नहीं है, एमएम ग्राऊंड में जगह नहीं है। धरणीधर मैदान में कुछ कोशिश हो रही है लेकिन इंडोर गेम वाले खिलाड़ी को मन मसोसना ही पड़ेगा।

गहलोत की राजनीति

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत एक बार साबित कर गए कि बीकानेर के बड़े राजनेताओं के बावजूद उनकी फेन फॉलोविंग यहां कम नहीं है। उन्होंने 'अपनों' से जुडऩे का कोई मौका नहीं छोड़ा। वो यहां अपने मित्र भवानीशंकर शर्मा के निधन पर शोक व्यक्त करने आए थे लेकिन आ ही गए तो कई अन्य काम भी निपटा गए। रिश्तेदार रवि गहलोत के निधन पर शोक जताया तो पुराने समय के मित्र प्रोफेसर अशोक आचार्य के घर पहुंचकर उनके पुत्र संजय आचार्य से भी मिले। इतना ही नहीं गहलोत बाद में कांग्रेस नेता और माली समाज के प्रदेशाध्यक्ष गुलाब गहलोत के घर भी पहुंचे। गुलाब अशोक गहलोत के नजदीकी रहे हैं। दरअसल, गहलोत ने जिले के बड़े कांग्रेसी नेताओं को बता दिया कि उनके क्षेत्र में भी वो वजूद रखते हैं। 

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