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नेता गिरी (अनुराग हर्ष) (23)

बीकानेर - यह जानबूझकर की गई 'गलती' तो नहीं?

नेता गिरी - अनुराग हर्ष। पिछले दिनों अंत्योदय रेल शुरू करने के मौके पर रेलवे की ओर से वितरित किए गए आमंत्रण पत्र इन दिनों चर्चा का विषय बने हुए हैं। दरअसल, रेलवे के कार्ड में बीकानेर पूर्व की विधायक सिद्धि कुमारी का नाम था लेकिन बीकानेर पश्चिम के विधायक गोपालकृष्ण जोशी का नाम नहीं था। इतना ही नहीं संसदीय सचिव डॉ. विश्वनाथ मेघवाल का नाम भी गायब था। हालांकि स्वयं विधायक गोपाल जोशी ने अब तक इस मामले में कोई नाराजगी जाहिर नहीं की है लेकिन बीकानेर पश्चिम के मतदाता जरूर रेलवे की इस गलती से नाराज है। माना जा रहा है कि रेलवे का यह कार्ड भाजपा की राजनीति को दर्शा रहा है। कार्ड में सिर्फ बीकानेर पूर्व की विधायक सिद्धि कुमारी का नाम दिया गया, जो स्वयं इस कार्यक्रम में पहुंची ही नहीं। शायद यह पहले से तय था कि सिद्धि कुमारी कार्यक्रम में नहीं होगी। जो आ सकते थे, उनका नाम नहीं दिया। न सिर्फ गोपाल जोशी बल्कि नगर विकास न्यास के चैयरमेन महावीर रांका को भी कार्यक्रम से किनारे रखा गया। दोनों के नाम अगर कार्ड में होते तो दोनों निश्चित रूप से पहुंच जाते। 

वैसे भाजपा को इस कार्यक्रम से अलग नहीं रखा गया। मंच पर जनता के प्रतिनिधि यानी विधायक भले ही नहीं थे लेकिन पार्टी के प्रतिनिधि यानी जिलाध्यक्ष दोनों मौजूद थे। कार्यक्रम भले ही सरकारी था लेकिन पार्टी के पदाधिकारियों को मंच मिल गया।
दरअसल, राजनीति में ऐसा चलता है। अपनो को खुश रखने का सिलसिला और दूसरों को नीचे दिखाने की कोशिश। इसके बाद भी यह ध्यान रखना ही चाहिए कि जनता के प्रतिनिधि का ही अगर अपमान होगा तो उस राज में जनता का मान और सम्मान कैसे हो सकता है? जिनका अपमान हुआ है, उन्हें भी इस बारे में 'संज्ञान' लेना चाहिए था क्योंकि मामला सिर्फ उन तक सीमित नहीं था।

यह कैसी हो रही है राजनीति

यह पहला अवसर नहीं है जब पार्टी के विधायकों की अनदेखी हुई है। इससे पूर्व में भी अपनो की अनदेखी का चलता आ रहा सिलसिला राजनीति में कोई नया नहीं है। बात करें शिलान्या की या फिर विकास कार्यों के लोकार्पण की। उसमें भूल से रह गया हो या फिर जानबूझ कर गलती माने। क्षेत्र के विधायक को बुलाना तक मुनासबि नहीं समझ रहे है। जबकि विधानसभा में अपने हो या पराए दोनों ही एक-दूसरे के आमने-सामने होते है। बरहाल पार्टी की बात करें या पार्टी पदाधिकारियों की। वे चाहे भले ही जानबूझकर की गई इन छोटी-छोटी गल्तियों को चाहे भले ही नजर अंदाज कर दें, किंतु जनप्रतिनिधियों से जुड़े कार्यकर्ता तथा जनता छोटी से छोटी बात को भी गंभीरता से लेती है।

रिपोर्ट कार्ड में कौन आगे

चार वर्षों तक चाहे भले ही पार्टियां अपने विधायकों तथा उनके द्वारा किए गए कार्यों का संज्ञान न लें, लेकिन जब बात अंतिम व चुनावी वर्ष की आती है तो पार्टियां अपने विधायकों के रिपोर्ट कार्ड के आधार पर उनके कार्यों का मूल्यांकन व आंकलन करने लग जाती है। यहीं नहीं चुनाव में उनकी भूमिका तथा टिकट भी रिपोर्ट कार्ड के आधार पर तय होता है। यदि सरकार में हो या फिर विपक्ष में। पार्टियां यदि वर्ष में कम से कम एक बार अपने-अपने क्षेत्र के विधायकों की क्लास लें तथा उनकी ओर से पार्टी तथा जनहित में किए जा रहे कार्यों के बारे में सुध लें तो उसका ही फायदा पार्टियों, जनप्रतिनिधियों को मिलेगा, बल्कि जनता को भी होने वाले विकास कार्यों का समुचित लाभ मिल सकेगा। किंतु बात करें पहले वर्ष की तो पूरा साल जीत के जश्न में ही समाप्त हो जाता है। दूसरा वर्ष क्षेत्र में घूम-फिरकर उसके समझने तथा वोटरों की नब्ज टटोलने में बीत रहा है। तीसरे वर्ष में जब थोड़ा बहुत काम शुरू होता है। तब तक एक-दूसरे की टांग खिंचाई शुरू हो जाती है। इतने में चौथा साल भी निकल जाता है। ऐसे में पांचवा एवं कार्यकाल का अंतिम वर्ष चुनाव से होता है। जिसमें पार्टियों को ही नहीं जनप्रतिनिधियों को भी अपना कदम फंूक-फूंक कर रखना होता है। ऐसे में जनता की सुध लेने की फुर्सत तक नहीं मिलती। फिर भला रिपोर्ट कार्ड कैसा? पार्टियां तथा जनप्रतिनिधि कैसे और कौनसे रिपोर्ट कार्ड की बात कर रहे है। यह तो समझ से परे है, किंतु इतना जरूर है कि जनता से तीन-चार साल तक दूर रहने वाले जनप्रतिनिधियों को इन दिनों फुर्सत ही फुर्सत है। वे जनता के बीच पहुंचने तथा अपनी पार्टियों की रीति-नीति, कार्यों तथा उपलब्धियां गिनवाने से नहीं थक रहे है।

कौन कितना नजदीक?

स्थानीय राजनीति को यदि एक बारगी दरकिनार कर दिया जाएं तो चार साल नदारद रहने वाले कार्यकर्ता तथा नए-नए चेहरे नजर आने लगे है। वे हर तरह से चर्चा में रहना चाह रहे है। वे चाहते है कि उनकी चर्चा हो। ताकि चुनाव की राह उनकी आसान हो जाएं। चुनाव की बात करें तो इन दिनों हर कोई टिकट की दौड़ में शामिल हो रहा है। इनमें से कई चेहरे तो न पहले दिखे है और न ही दिखाए गए है। वे भी बढ़-चढ़कर सक्रिय राजनीति का हिस्सा बनने से पीछे नहीं रह रहे है। जुगाड़ बिठाने की राजनीति भी गर्माने लगी है। कौन शीर्ष नेताओं या टिकट वितरण करने वाले आकाओं के नजदीक है। इसकी जानकारी जुटाने तथा जुगाड़ बिठाने में मशगूल नजर आ रहे है। आने वाले विधानसभा चुनाव में किसकी टिकट पक्की होगी, किसकी कटेगी ऐसे कयास भी लगाए जा रहे है।

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बीकानेरी राजनीति - 'चप्पल' खोलने की तैयारी

अनुराग हर्ष. बीकानेर। जब कोई व्यक्ति चप्पल पहनकर आपके आगे चल रहा है और आप पीछे हैं तो उसकी चप्पल के पिछले हिस्से पर बस एक बार पैर रख दें। उसकी चप्पल खुल जाएगी, वो उसे फिर से पहनने में उलझ जाएगा और आप तब तक चंद कदम आगे बढ़ सकते हैं। राजनीति में भी कुछ ऐसा ही होता है। खुद से आगे चल रहे नेताजी की चप्पल खोलने के लिए जैसे पूरी ताकत झौंक दी जाती है। ऐसा कुछ करने का प्रयास किया जाता है कि बड़े नेताजी वहां उलझ जाएं और पीछे वाले आगे आ जाएं। बीकानेर में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है, बड़े नेताओं की सीट पर कब्जा करने के लिए कई लोग तैयार हो गए हैं। यह बात अलग है कि वरिष्ठ नेताओं ने खूंटा इतना पक्का बांध रखा है कि जोर लगाने से भी हिल नहीं रहा है। न सिर्फ पीछे वाले नेताओं से हिल पा रहा है और न उनका साथ देने वालों की कोशिशें सफल हो पा रही है। लूणकरनसर में अर्से से राजनीति में जमे मानिकचंद सुराना की जगह लेने की कोशिश तो कई युवा नेता कर रहे हैं लेकिन उनकी दृढ़ता और समझ के आसपास भी नए नेता नहीं है। सुराना भले ही इस बार निर्दलीय उम्मीदवार है लेकिन भाजपा में टिकट पाने वाले भी उन्हें अपना मूल प्रतिद्वंद्वी मानकर चल रहे हैं। इसी तरह से श्रीडूंगरगढ़ में किशनाराम नाई का कोई विकल्प भाजपा को नहीं मिल पा रहा। यहां भी कुछ नए नेता जोर लगा रहे हैं लेकिन टिकट रास्ता एक बार फिर किसनाराम नाई की ओर से होकर ही जाएगा। ठीक इसी तरह बीकानेर पश्चिम में गोपाल जोशी भाजपा के विधायक है। उम्र के हिसाब से उन्हें टिकट मिलने की संभावनाओं पर सवाल उठ रहे हैं लेकिन युवा दावेदार आज भी मानते हैं कि अंतिम समय में कुछ भी हो सकता है। कमोबेश ऐसे ही हालात कांग्रेस में भी है। जहां पुराने नेताओं की जगह नए दावेदार तो आ रहे हैं लेकिन पुराने नेताओं की धाक अभी कायम है।

भीड़ जुटाने का काम पहली बार

अब तक प्रशासन के पास भीड़ को तीतर बितर करने का काम रहा है लेकिन पहली बार इनके पास भीड़ जुटाने का काम आ गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जयपुर में हुई सभा के लिए बीकानेर से भीड़ भेजने का काम इस बार पार्टी कार्यकर्ताओं पर नहीं था। पूरी सरकारी मशीनरी जुटी हुई थी, लाभार्थियों की तलाश करने में। जैसे-जैसे लोग मिलते गए, वैसे-वैसे उनके लिए बसों की व्यवस्था होती रही। आमतौर पर चुनावी सभाओं में पार्टी कार्यकर्ताओं की जेब से ही धन लगता है लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। सरकारी कार्यक्रम की ओट में बसों की सुविधा आसानी से मिल गई। पहली बार ऐसा हुआ कि बड़े नेता तो रात को जयपुर पहुंच गए और प्रशासनिक अधिकारी देर रात तक लोगों को भेजने में जुटे रहे।

बिना विचार की राजनीति

यह राजनीति का नियम है कि यहां करता कोई है और भरता कोई ओर है। किसी भी राजनीतिक घटना का सभी अपने हिसाब से विश्लेषण करते हैं। फिर इन घटनाओं पर मिर्च मसाला लगाकर अपने अपने हिसाब से सोशल मीडिया पर चलाते हैं, सामाजिक मंच पर मामले को रखते हैं ताकि उसका लाभ उठाया जा सके या फिर किसी को हानि पहुंचाई जा सके। पिछले दिनों बीकानेर में हुए एक राजनीतिक घटनाक्रम को लेकर भी ऐसा ही हो रहा है। जो वरिष्ठ नेता इस पूरे घटनाक्रम के आसपास भी नहीं थे, उसी नेता पर आरोप लगाए जा रहे हैं। दरअसल, राजनीति का यह उसूल बन गया है कि यहां सच बोलना ही नहीं होता, अगर कोई सच सामने आता भी है तो उसे नजरअंदाज करके अपने स्तर पर अपने हिसाब से पेश करना होता है। यह बात अलग है कि नेताओं को यह समझ ही नहीं आता कि सच को छिपाकर वो न सिर्फ पार्टी का बल्कि स्वयं का भी नुकसान करते हैं। राजनीतिक विचारधारा की लड़ाई ही राजनीति होती है लेकिन इन दिनों व्यक्तिगत राग और द्वेष का हिसाब किताब करना राजनीति हो गया है। एक विचारधारा लोग अब शायद पार्टियों में भी नहीं रह गए हैं, सभी को अपने हित साधने होते हैं। इन्हीं हितों को साधने के लिए वोर राजनीति में आते हैं और उनकी पूर्ति करने के लिए ही सच को झूठ और झूठ को सच बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते हैं। यह समझ आना चाहिए कि वो जिस विचारधारा के लिए लड़ रहे हैं, वो महत्वपूर्ण है न कि व्यक्तिगत लाभ और हानि। जब विचारधारा सत्ता में आती है तो छोटे-बड़े कई हित साध लिए जाते हैं। बात कांग्रेस की हो या फिर भाजपा की, विचारधारा को जीवित रखना जरूरी है।

युवाओं की बड़ी भूमिका

इस बार चुनाव में न सिर्फ प्रत्याशी के रूप में युवा सामने आ रहे हैं बल्कि वोटर्स के रूप में भी युवाओं की संख्या में जबर्दस्त बढ़ोतरी हुई है। यह वृद्धि बीकानेर की सातों विधानसभा सीटों पर देखने को मिल रही है। एक अनुमान के मुताबिक प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में करीब दस से पंद्रह हजार नए मतदाता तो जुड़ चुके हैं, वहीं नए मतदाताओं की संख्या में अभी नवंबर तक वृद्धि हो सकती है। पहली बार मतदान करने वाले युवाओं को अगले डेढ़ साल में न सिर्फ प्रदेश की सरकार चुननी है बल्कि इसके बाद देश की सरकार भी उन्हें चुननी होगी। इसके बाद स्थानीय निकाय के चुनाव भी होने हैं। युवाओं को राजनीति के प्रति सचेत करने के लिए भी सामाजिक संगठनों को विचार मंच तैयार करना चाहिए, ताकि हम व्यक्ति को नहीं बल्कि व्यवस्था में युवाओं को हिस्सा बना सकें।

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पश्चिम में बदलेगा समीकरण

क्या बीकानेर पश्चिम में भारतीय जनता पार्टी समीकरण बदलने के मूड में है? क्या किसी ऐसे समीकरण पर पार्टी विचार कर सकती है, जिस पर अब तक कोई बड़ा काम नहीं हुआ है। दरअसल, बीकानेर पश्चिम में भाजपा के दावेदारों में एक नाम आता है महावीर रांका का। महावीर रांका नगर विकास न्यास के चैयरमेन है। वर्तमान में बीकानेर पश्चिम विधानसभा सीट पर दोनों ही बड़ी पार्टियां किसी न किसी ब्राह्मण वो भी पुष्करणा को टिकट देती रही है। शहर के भीतरी क्षेत्र में पुष्करणा बाहुल्य होने के कारण माना जाता रहा है कि इस सीट पर पुष्करणा नेता ही जीत सकता है, क्योंकि तीन दशक पहले मानिक चंद सुराना को जीती हुई बाजी में हार देखनी पड़ी थी। हालांकि इसके बाद समीकरण बदल गए, परिसीमन ने इस सीट को सर्वाधिक प्रभावित किया। जो क्षेत्र पहले श्रीकोलायत विधानसभा में आते थे, वो अब बीकानेर पश्चिम का हिस्सा हो गए। जिसमें श्रीगंगाशहर और भीनासर शामिल है। इन दोनों क्षेत्रों में वैश्य और माली समाज का बोलबाला है। वहीं बीकानेर पश्चिम के कुछ हिस्से में पहले से वैश्य समाज के वोट है। माना जा रहा है कि महावीर रांका और उनकी टीम इसी आधार पर बीकानेर पश्चिम से अपनी दावेदारी जता सकती है। भाजपा के एक गुट ने स्वयं टिकट की दावेदारी को प्रमुखता से आगे रखा है और इस गुट को अगर टिकट नहीं मिलता है तो वो रांका का नाम आगे कर सकते हैं। रांका भी इन दिनों शहर के भीतरी क्षेत्र में सक्रियता बढ़ाए हुए हैं। रात-रात भर पाटों पर बैठकर हथाई करने के साथ ही भोजन भी पाटों पर हो रहा है। शहर भाजपा के पूर्व अध्यक्ष रामकिसन आचार्य भी पार्टी से दावेदार है, फिर भी उनका पूरा स्नेह रांका को मिल रहा है। हालांकि 'नेशनल राजस्थानÓ से बातचीत में कहा कि वो टिकट के लिए कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं लेकिन साथ ही यह भी कहा कि पार्टी आदेश करेगी, वो स्वीकार है। टिकट देगी तो लड़ेंगे, नहीं तो दूसरे प्रत्याशी के साथ जुटेंगे।

कांग्रेस के बढ़ गए टिकट दावेदार

हालांकि कांग्रेस के बजाय भाजपा में टिकट दावेदारों की संख्या अधिक है लेकिन कांग्रेस में भी धीरे धीरे टिकट दावेदारों की संख्या बढ़ती जा रही है। बीकानेर की सातों विधानसभा क्षेत्रों में बीकानेर पश्चिम और नोखा को छोड़ दें तो शेष पांचों सीटों पर दावेदारों की संख्या एक दर्जन तक पहुंच रही है। सबसे बड़ी भिडंत खाजूवाला में होने जा रही है, जहां गोविन्दराम मेघवाल के सामने टिकट मांगने वालों की संख्या में वृद्धि हो रही है। नोखा में रामेश्वर डूडी और बीकानेर पश्चिम में बी.डी. कल्ला के सामने में टिकटार्थियों की संख्या कम है। लूणकरनसर में पूर्व गृह राज्य मंत्री वीरेंद्र बेनीवाल और नोखा में मंगलाराम के सामने भी कई लोग टिकट के लिए अंदरखाने कोशिश कर रहे हैं।

युवा चेहरे अभी भी कम

कांग्रेस में युवा चेहरों की कमी अभी भी खल रही है, वहीं भाजपा में टिकट पाने के इच्छुक लोगों में युवाओं की कतार ज्यादा लंबी है। कांगे्रेस में युवाओं का एक बड़ा गुट नोखा विधायक रामेश्वर डूडी के साथ है। स्वयं डूडी नोखा से दावेदार है, ऐसे में उनके सामने कोई भी टिकट पाने की इच्छा नहीं रखता। वहीं दूसरी तरफ भाजपा में युवा चेहरे सर्वाधिक सामने आए हैं। इनमें बीकानेर पश्चिम से अविनाश जोशी सबसे युवा चेहरा है। इसके अलावा लूणकरनसर से डॉ. भागीरथ मूंड भाग्य आजमा रहे हैं। वहीं हनुमान बेनीवाल के साथ राजनीतिक मैदान में उतरे विजयपाल बेनीवाल भी किसी विधानसभा क्षेत्र से भाग्य आजमा सकते हैं। यह दोनों कॉलेज स्तर की राजनीति से निकल आए जनप्रतिनिधि है, जिन्होंने पार्टियां तो अलग अलग चुनी है लेकिन फेन फॉलोविंग दोनों की बेहतर है।

दो युवा नेताओं का अनोखा ब्याह

एक तरफ जहां राजनीति में दिखावा बढ़ गया है। बात बात पर लाखों रुपए खर्च करने वाले युवाओं के बीच बीकानेर में दो नेताओं ने बहुत ही प्रेरणास्पद काम किया है। कुछ महीने पहले भाजपा के युवा चेहरे डॉ. भागीरथ मूंड ने अपने विवाह में दहेज तो दूर सामान्य खर्चों पर भी पूरी तरह लगाम लगा दी। बहुत ही साधारण परिवेश में शादी करके डॉ. भागीरथ ने जहां युवाओं को प्रेरित करने वाला काम किया, वहीं हनुमान बेनीवाल के साथ जुड़े विजयपाल बेनीवाल ने कुछ दिन पूर्व ही अपने विवाह में ऐसी ही सादगी दिखाई। विवाह में आने वाले लोगों को पेड़ पौधे लगाने के लिए प्रेरित किया गया। इतना ही नहीं कुछ रीति रिवाज में तो पौधे लगाने का ही संकल्प लिया गया। उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर विवाह के उपलक्ष्य में न सिर्फ पौधारोपण करवाया बल्कि इन पौधों को पेड़ के रूप में बड़ा करने के लिए तमाम व्यवस्थाओं को भी पुख्ता किया है। बीकानेर के इन दो चेहरों को देखकर लगता है कि राजनीति में सुधार का दौर जारी है। अब इन दो चेहरों को देखकर ही अन्य को सीख लेनी चाहिए। न सिर्फ राजनीति में बल्कि सामाजिक रूप से भी स्वयं को इतना सुदृढ़ बनाया जाना चाहिए कि आने वाली पीढिय़ां उनका उदाहरण दे सके। राजनीति को जो लोग आय का माध्यम समझते हैं, उन्हें सामाजिक उदाहरण भी पेश करने चाहिए। यहां तक कि राजनीतिक दलों को भी ऐसे लोगों को प्रोत्साहित करना चाहिए। दागी नेताओं को टिकट देने के बजाय ऐसे सामाजिक काम करने वाले नेताओं को किसी ने किसी तरह लाभान्वित करना चाहिए ताकि आने वाली पीढिय़ां भी सामाजिक सरोकारों के साथ आगे बढ़ती हुई नजर आए, न कि गुंडागर्दी और अवसरवादिता के कारण पहचानी जाए।

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मनमुटाव को करना होगा दूर

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मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे एक बार फिर 11 जून से प्रदेश का दौरा कर गुटों में विभाजित हुई भाजपा को एक करने की कोशिश करेंगी। विधानसभा चुनाव को लेकर राजे के दौरे में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी कई जिलों में शामिल होंगे। भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष के नाम पर रविवार को भी सहमति नहीं नहीं बन पाई, किंतु इतना स्पष्ट हो गया है कि भाजपा राजे के नेतृत्व में ही प्रदेश में अगला विधानसभा चुनाव लड़ेगी। किंतु बिना सेनाध्यक्ष (प्रदेशाध्यक्ष) के कैसे चुनाव लड़ेगी। इसको लेकर अभी भी सवाल बना हुआ है। वसुंधरा राजे व केन्द्र सरकार के बीच टकराव समाप्त होने के साथ ही दोनों के बीच प्रदेशाध्यक्ष को लेकर सहमति भी बन गई है। जिसमें साफ हो गया है कि जाट या फिर राजपूत प्रदेशाध्यक्ष नहीं बनेगा, किंतु केन्द्रीय संगठन की ओर से सुझाए गए नाम पर स्थानीय भाजपा को सहमति देनी होगी। दूसरी ओर कांग्रेस ने भी इस बार भाजपा को प्रदेश से उखाडऩे का पूरा मानस बना लिया है और कांग्रेस के राष्ट्रीय व प्रदेश स्तरीय पदाधिकारी इन दिनों प्रदेश के जिलों का दौरा कर कार्यकर्ताओं में जोश का मंत्र फूंकने का काम कर रहे है। भाजपा हो या फिर कांग्रेस दोनों ही पार्टियों में आपसी फूट प्रदेश के साथ-साथ बीकानेर जिले में भी देखने को मिल रही है। जब तक दोनों ही संगठन इस फूट का सही व पुख्ता इलाज नहीं कर लेते, तब तक चाहे भले ही बूथ को कितना भी मजबूत बना लें, लेकिन जीत सुनिश्चित होना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन सी है। यह तो फिलहाल विधानसभा चुनाव के वक्त ही पता लगेगा। फिलहाल कांग्रेस व भाजपा दोनों ही पार्टियां जोरशोर से बूथ को मजबूत बनाने के लिए गांव-गांव में पहुंचकर कार्यकर्ताओं से रुबरु हो रही है।

देखना जोर किसमें कितना है

बीकानेर जिले में कांग्रेस व भाजपा देानों ही पार्टियों में चल रही गुटबंदी के चलते विधानसभा चुनाव में जिले की सभी सातों सीटें जीतने के लिए दोनों को ही एडी चोटी का जोर लगाना पड़ सकता है। आचार संहिता लागू होने तथा टिकट वितरिण के वक्त ही हालांकि नाराजगी व गुटबाजी खुलकर सामने आ जाएगी। कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इसके चलते इस बार विधानसभा चुनाव रोचक होने की पूरी संभावना है। जीत सुनिश्चित करने के लिए किसमें कितना दम है यह कहने की जरुरत नहीं है यह तो तो मैदान-ए-चुनाव में सामने अपने आप ही आ जाएगा।

खाजूवाला में फिर दिखी गुटबाजी

विधानसभा को चुनाव को लेकर जिले में आरक्षण के तहत एकमात्र खाजूवाला विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस कार्यकर्ताओं में गुटबाजी एक बार फिर सामने आई। मेरा बूथ मेरा गौरव कार्यक्रम में पहुंचे अखिल भारतीय कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव तथा राजस्थान प्रदेश के सहप्रभारी काजी निजामुद्दीन को भी फूट का सामना करना पड़ा। जहां जाट धर्मशाला में नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी गुट के कार्यकर्ताओं की ओर से आयोजन किया गया। वहीं स्थानीय ग्राम पंचायत में पूर्व संसदीय सचिव गोविन्दराम मेघवाल की ओर से कार्यक्रम रखा गया। काजी निजामुदीन ने दोनों ही स्थानों पर शिरकत की। इससे पूर्व भी यहां सर्किट हाउस पहुंचने पर प्रदेश के सहप्रभारी के सामने दोनों ही पक्षों के कार्यकर्ताओं ने अपने-अपने नेताओं के समर्थन में नारेबाजी की। जिसके कारण कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही है।

मुकाबलों में रहेगी रोचकता

प्रदेश की भाजपा सरकार के कार्यकाल में बीकानेर को कितना क्या कुछ मिला है। यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। उस पर ऐलिवेटेड सहित अनेक मुद्दों पर बात बिगड़ती हुई नजर आती है। ऐसे में आने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा को कितना लाभ मिल पाएगा। यह तो फिलहाल आने वाला वक्त ही बताएगा। दूसरी ओर जिले के कई महत्वपूर्ण मुद्दों को विपक्ष भी जोरदार तरीके से नहीं उठा पाया है। ऐसे में बीकानेर की सभी सातों नोखा, श्रीडूंगरगढ़, लूणकरनसर, श्रीकोलायत, खाजूवाला, बीकानेर पूर्व तथा बीकानेर पश्चिम विधानसभा क्षेत्र में मुकाबले रोचक होने की पूरी संभावना है। हाल फिलहाल जिले की सात सीटों में से चार पर भाजपा, दो पर कांग्रेस तथा एक सीट पर निर्दलीय विधायक है। जहां भाजपा की कोशिश जिले में बेहत्तर प्रदर्शन कर अधिकाधिक सीटें हथियाने का लक्ष्य है। वहीं कांग्रेस पिछले विधानसभा चुनाव के रिपोर्ट कार्ड को सुधारने का प्रयास करेगी। जहां एक ओर देश व प्रदेशों में भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता को लेकर भाजपा के पदाधिकारी व कार्यकर्ता पहले से ही जोश में है। वहीं इस बार एक बार मैं, एक बार तुम की तर्ज पर की जा रही घोषणाओं के चलते कांग्रेस के कार्यकर्ता भाजपा को पटखनी देने की पूरी तैयारी में है। हाल फिलहाल दोनों ही पार्टियों के विधायक, पदाधिकारी व कार्यकर्ता लोगों के बीच पहुंचकर अपनी-अपनी तारीफ तथा विपक्षी पार्टी की विफलताओं को बताने में जुटे हुए है। जनता भी जागरूक हो चुकी है। देखना ये है कि दोनों ही पार्टियों के बहकावें में आती है या नहीं या फिर विकास को लेकर मतदान करेंगी। यह तो फिलहाल आने वाला समय ही बताएगा।

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बीकानेर - फोटो की राजनीति कब तक? (अनुराग हर्ष)

फोटो खिंचवाने का सबसे ज्यादा शौक अगर किसी को है तो वो नेता है। राजनीति चलती ही फोटो के दम पर है। ऐसे में कई नेता अपनी शुरूआत अखबारों में फोटो के साथ करते हैं, यह बात अलग है कि जो जनता के बीच काम नहीं करते, वो फोटो तक ही सीमित होकर रह जाते हैं। जनता उसी के साथ नजर आती है, जो खुद आगे बढ़कर काम करते हैं। खैर हम बात कर रहे हैं, फोटो के शौकीन नेताओं की। इन दिनों कांग्रेस और भाजपा दोनों बीकानेर पश्चिम विधानसभा क्षेत्र में सक्रिय नजर आ रही है और इस बीच फोटो के दीवाने नेताओं की चांदी हुई पड़ी है। टिकट के दावेदार नेता तो इन कार्यक्रमों में बस कुछ देर के लिए आते हैं, फोटो खिंचवाते हैं और चलते बनते हैं। कई बार तो नेताजी अपने कुछ साथियों को साथ लेकर पहुंचते हैं, उनको अपना मोबाइल थमाते हैं और फोटो खिंचवाते हैं। पीछे भीड़, पार्टी के झंडे, बैनर सभी फोटो में दिखने चाहिए। महज दस-पंद्रह मिनट की यह एंट्री लेने वाले एक-दो नहीं बल्कि कई नेता है। ऐसा भी नहीं है कि ऐसे सिर्फ कांग्रेस में है, बल्कि भाजपा में भी ऐसे शौकीन नेताओं की कमी नहीं है। दरअसल, इसके पीछे भी कहानी है। टिकट की दौड़ में लगने के लिए इन नेताओं को फाइल तैयार करनी होती है। इसी फाइल में यह फोटो चिपकाए जाते हैं। किसी अखबार में अगर फोटो आ गई है तो सोने पर सुहागा। उसकी कटिंग भी फाइल का हिस्सा बन जाती है। अब बड़े नेता इन लोगों से परेशान है, पार्टी लाइन के कारण कुछ बोल भी नहीं पाते। करे तो आखिर क्या करें। हमारी सलाह तो सिर्फ इतनी है कि टिकट के लिए काम करने के बजाय जनता के लिए काम करेंगे तो कल जनता भी बोलेगी कि इन्हें टिकट दो। अगर काम नहीं करेंगे तो जीते हुए हैं, उन्हें हराने में भी कसर नहीं छोड़ते। अच्छा होगा कि फोटो राजनीति के बजाय काम की राजनीति करें।

महिला नेता भी सक्रिय

हालांकि बीकानेर में पूर्व की सीट पर सिद्धिकुमारी के अलावा कोई भी महिला नेता गंभीरता से टिकट की दावेदार नहीं है, फिर भी कांग्रेस और भाजपा दोनों में महिला नेता इन दिनों सक्रिय नजर आ रही है। खासकर भाजपा में महिला नेताओं के बीच प्रतिस्पद्र्धा ज्यादा नजर आ रही है। कार्यक्रमों में जिसकी चलती है, वो दूसरे पक्ष को आगे नहीं आने देती। यहां तक कि एक दूसरे के नंबर कम करवाने में भी पीछे नहीं रहती। अब चुनाव की बेला में अगर पुरुष नेता यह काम कर रहे हैं तो महिलाओं को क्या दोष दें?

सोशल मीडिया पर युद्ध

देशभर की राजनीति तो सोशल मीडिया पर होती ही है लेकिन अब स्थानीय राजनीति भी फेसबुक पर नजर आने लगी है। अधिकांश नेताओं ने अपने अपने ग्रुप बना लिए हैं, वो हर रोज कुछ न कुछ सोशल मीडिया पर डालते हैं, कभी तीखी मिर्च की तरह तो कभी अपने नेताओं की लड्डू जैसी मीठी बातों की टोकरी परोस देते हैं। विचारधारा से कम और व्यक्ति विशेष से ज्यादा जुड़े समर्थक अपने नेता के पक्ष में जमकर तर्क दे रहे हैं, हालांकि कई बार यह तर्क कुतर्क में बदल जाते हैं। कांग्रेस और भाजपा नेताओं ने तो जैसे अपने 'सोशल मीडिया वार रूमÓ तैयार कर लिए हैं, जहां से हर रोज सुबह सवेरे गोला दाग दिया जाता है। इसके बाद छिटपुट गोरीबारी दिनभर चलती रहती है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है लेकिन भाषा की अभद्रता कई बार रिश्तों को खराब भी कर देती है।

आखिर कब तक...

चुनाव नजदीक आने के साथ ही नेता तैयार बयानबाजी तो शुरू कर चुके हैं, लेकिन हकीकत में कोई काम नहीं हो रहा है। जिन नेताओं को टिकट चाहिए, वो अपने विधानसभा क्षेत्र तो दूर पार्षद क्षेत्र में भी भ्रमण नहीं कर पाए हैं। उन्हें नहीं पता कि उनके पार्षद क्षेत्र में कितनी सड़कें टूटी हुई है और कितनी नालियों से पानी बाहर निकल रहा है, किस स्कूल में शिक्षक नहीं है और किस अस्पताल में गॉज और पट्टी का टोटा चल रहा है। इसके बाद भी वो नेतागिरी करने से नहीं चूक रहे। जिस तरह हर बड़े पद पर पहुंचने से पहले मेहनत करनी होती है, ठीक वैसे ही जनता के वोट से विधायक बनने से पहले नेताओं को अपने क्षेत्र को पहचानना ही होगा। खासकर युवा नेताओं को इस दिशा में मेहनत करने की जरूरत है।

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ये बहस बड़ी है मस्त

इन दिनों शहर में चुनावी चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। चर्चा जल्दी ही बहस में तब्दील हो जाती है और फिर व्यक्तिगत आरोपों का लंबा सिलसिला चलता है। अंत आते आते मामला बिगड़ जाता है। चर्चा का सबसे बड़ा विषय है कि टिकट किसे मिलेगा। हर व्यक्ति के पास किसी भी नेता के टिकट काटने के दस तर्क मौजूद है। टीवी चैनल पर बैठे लोग जैसी बहस नहीं सकते, उससे ज्यादा जिम्मेदार और प्रभावी बहस यह लोग अपने तर्कों से कर जाते हैं। बात बीकानेर पूर्व और पश्चिम की हो या फिर खाजूवाला, नोखा, डूंगरगढ़ या फिर श्रीकोलायत की। सभी बड़े नेताओं के टिकट पाटे पर आसानी से काट लिए जाते हैं। किस नेता का किससे सीधा संपर्क है, यह नेताजी को पता है या नहीं? पाटे पर बहस कर रहे संभागी को सब पता होता है। किस नेता का बेटा चुनाव लड़ सकता है और किसका पोता तैयारी कर रहा है, इसकी खबर भी पाटे पर सबसे पहले आती है। मजे की बात तो यह है कि कई बार खबरों का पैमाना इतना बड़ा होता है कि वो खुद नेता को अपने तथ्यों के बारे में बताए तो हैरानी में पड़ जाए कि वो इतना बड़ा कब बन गया। दरअसल, जो लोग चुनाव लडऩा चाहते हैं, वो हर हाल में इन चर्चाओं को जारी रखना चाहते हैं। पाटों पर बैठे लोगों में कुछ तो इन्हीं में से हैं। वो कोशिश करते हैं कि सामान हो या ना हो, चर्चा में बने रहना जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्र में भी कई लोग अपने टिकट को लेकर आश्वस्त नहीं है लेकिन दूसरी पार्टी की पंचायती कर रहे हैं। पाटों की राजनीतिक चर्चा से ज्यादा मजबूत चर्चा तो गांवों में हो रही है। छुटभैये नेता भी इन दिनों दोनों पार्टियों के नेताओं को एक दूसरे के खिलाफ बोलकर पूरी तरह से लुत्फ उठा 

रहे हैं।

विपक्षी पार्टी का टिकट बता रहे विधायक

आमतौर पर विधायक अपनी ही पार्टी की पंचायती पूरी तरह से कर ले तो गनीमत समझी जाती है लेकिन बीकानेर के एक विधायकजी तो दूसरी पार्टी की पंचायती करने में भी नंबर वन है। दरअसल, भाजपा के एक विधायक जी को कांग्रेस के दिग्गज नेता पिछले दिनों नई दिल्ली में मिल गए तो उन्हें ज्ञान दे आए कि टिकट तो '***Ó को ही देना। वो ही एक मात्र विकल्प है आपकी पार्टी का। कांंग्रेस के दिग्गज नेता भी चकित थे कि अपने ही प्रतिद्वंद्वि की तारीफ कर रहा है यह विधायक। हकीकत तो यह है कि विधायकजी को लगता है कि जिसकी तारीफ कर रहे हैं, वो खड़ा होगा तभी मैं आराम से जीत पाऊंगा। इसीलिए...।


ये बेचारा काम का मारा

न सिर्फ वर्तमान सत्तारुढ़ पार्टी भाजपा बल्कि अपने समय में कांग्रेस ने भी कुछ ऐसे लोगों को जोड़कर रखा, जो छोटे बड़े खर्चों के वक्त अपना पर्स आगे बढ़ा देते हैं। चूंकि सत्ता भाजपा की है, इसलिए अधिकांश कामों के लिए भाजपा ने सूची तैयार कर रखी है। कोई भी छोटा-बड़ा नेता आए, खर्च संबंधित व्यक्ति को ही करना होता है। इन दिनों बड़े नेताओं के बीकानेर आगमन का सिलसिला चल पड़ा है तो व्यवस्था संभालने वाले 'प्रमुख कार्यकर्ताओंÓ को ही जिम्मा मिलता है। अब जो 'सेवाÓ दे रहे हैं, वो भी चाहते हैं कि किसी नए को पकड़ लो, ताकि खर्च आधा आधा हो जाए। यह बात अलग है कि नया आ नहीं रहा और पिछले चार साल से एक ही 'बेचाराÓ काम आ रहा है। अब संगठन में भले ही कोई बैठा हो खर्च के नाम पर इन चंद लोगों पर ही तलवार लटकती रहती है।


जाति बड़ी चीज है

आने वाले वक्त में आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक पार्टियों से भी ऊपर चला जाएगा। इन दिनों सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के खिलाफ आंदोलन कर रहे अनुसूचित जाति व जन जाति का जमकर विरोध और समर्थन हो रहा है। समर्थन और विरोध करने वालों में अधिकांश नेता अपनी पार्टी लाइन से हटकर आरक्षण की बात कर रहे हैं। मजे की बात है कि दोनों ही प्रमुख पार्टियों के कार्यकर्ता अपनी विचारधारा औरा अब तक के राजनीतिक पार्टी के विचारों को किनारे रखकर आरक्षण का समर्थन और विरोध कर रहा है। इक्का दुक्का नेताओं ने विपरीत धारा में जाकर समर्थन भी किया। सोशल मीडिया पर कांग्रेस और भाजपा के अंतिम पंक्ति के नेता पार्टी के बजाय आरक्षण का विरोध करते नजर आ रहे हैं। इतने ही लोग समर्थन में लामबंद हो रहे हैं।

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ये बहस बड़ी है मस्त

इन दिनों शहर में चुनावी चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। चर्चा जल्दी ही बहस में तब्दील हो जाती है और फिर व्यक्तिगत आरोपों का लंबा सिलसिला चलता है। अंत आते आते मामला बिगड़ जाता है। चर्चा का सबसे बड़ा विषय है कि टिकट किसे मिलेगा। हर व्यक्ति के पास किसी भी नेता के टिकट काटने के दस तर्क मौजूद है। टीवी चैनल पर बैठे लोग जैसी बहस नहीं सकते, उससे ज्यादा जिम्मेदार और प्रभावी बहस यह लोग अपने तर्कों से कर जाते हैं। बात बीकानेर पूर्व और पश्चिम की हो या फिर खाजूवाला, नोखा, डूंगरगढ़ या फिर श्रीकोलायत की। सभी बड़े नेताओं के टिकट पाटे पर आसानी से काट लिए जाते हैं। किस नेता का किससे सीधा संपर्क है, यह नेताजी को पता है या नहीं? पाटे पर बहस कर रहे संभागी को सब पता होता है। किस नेता का बेटा चुनाव लड़ सकता है और किसका पोता तैयारी कर रहा है, इसकी खबर भी पाटे पर सबसे पहले आती है। मजे की बात तो यह है कि कई बार खबरों का पैमाना इतना बड़ा होता है कि वो खुद नेता को अपने तथ्यों के बारे में बताए तो हैरानी में पड़ जाए कि वो इतना बड़ा कब बन गया। दरअसल, जो लोग चुनाव लडऩा चाहते हैं, वो हर हाल में इन चर्चाओं को जारी रखना चाहते हैं। पाटों पर बैठे लोगों में कुछ तो इन्हीं में से हैं। वो कोशिश करते हैं कि सामान हो या ना हो, चर्चा में बने रहना जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्र में भी कई लोग अपने टिकट को लेकर आश्वस्त नहीं है लेकिन दूसरी पार्टी की पंचायती कर रहे हैं। पाटों की राजनीतिक चर्चा से ज्यादा मजबूत चर्चा तो गांवों में हो रही है। छुटभैये नेता भी इन दिनों दोनों पार्टियों के नेताओं को एक दूसरे के खिलाफ बोलकर पूरी तरह से लुत्फ उठा 

रहे हैं।

विपक्षी पार्टी का टिकट बता रहे विधायक

आमतौर पर विधायक अपनी ही पार्टी की पंचायती पूरी तरह से कर ले तो गनीमत समझी जाती है लेकिन बीकानेर के एक विधायकजी तो दूसरी पार्टी की पंचायती करने में भी नंबर वन है। दरअसल, भाजपा के एक विधायक जी को कांग्रेस के दिग्गज नेता पिछले दिनों नई दिल्ली में मिल गए तो उन्हें ज्ञान दे आए कि टिकट तो '***' को ही देना। वो ही एक मात्र विकल्प है आपकी पार्टी का। कांंग्रेस के दिग्गज नेता भी चकित थे कि अपने ही प्रतिद्वंद्वि की तारीफ कर रहा है यह विधायक। हकीकत तो यह है कि विधायकजी को लगता है कि जिसकी तारीफ कर रहे हैं, वो खड़ा होगा तभी मैं आराम से जीत पाऊंगा। इसीलिए...।


ये बेचारा काम का मारा

न सिर्फ वर्तमान सत्तारुढ़ पार्टी भाजपा बल्कि अपने समय में कांग्रेस ने भी कुछ ऐसे लोगों को जोड़कर रखा, जो छोटे बड़े खर्चों के वक्त अपना पर्स आगे बढ़ा देते हैं। चूंकि सत्ता भाजपा की है, इसलिए अधिकांश कामों के लिए भाजपा ने सूची तैयार कर रखी है। कोई भी छोटा-बड़ा नेता आए, खर्च संबंधित व्यक्ति को ही करना होता है। इन दिनों बड़े नेताओं के बीकानेर आगमन का सिलसिला चल पड़ा है तो व्यवस्था संभालने वाले 'प्रमुख कार्यकर्ताओंÓ को ही जिम्मा मिलता है। अब जो 'सेवा' दे रहे हैं, वो भी चाहते हैं कि किसी नए को पकड़ लो, ताकि खर्च आधा आधा हो जाए। यह बात अलग है कि नया आ नहीं रहा और पिछले चार साल से एक ही 'बेचारा' काम आ रहा है। अब संगठन में भले ही कोई बैठा हो खर्च के नाम पर इन चंद लोगों पर ही तलवार लटकती रहती है।


जाति बड़ी चीज है

आने वाले वक्त में आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक पार्टियों से भी ऊपर चला जाएगा। इन दिनों सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के खिलाफ आंदोलन कर रहे अनुसूचित जाति व जन जाति का जमकर विरोध और समर्थन हो रहा है। समर्थन और विरोध करने वालों में अधिकांश नेता अपनी पार्टी लाइन से हटकर आरक्षण की बात कर रहे हैं। मजे की बात है कि दोनों ही प्रमुख पार्टियों के कार्यकर्ता अपनी विचारधारा औरा अब तक के राजनीतिक पार्टी के विचारों को किनारे रखकर आरक्षण का समर्थन और विरोध कर रहा है। इक्का दुक्का नेताओं ने विपरीत धारा में जाकर समर्थन भी किया। सोशल मीडिया पर कांग्रेस और भाजपा के अंतिम पंक्ति के नेता पार्टी के बजाय आरक्षण का विरोध करते नजर आ रहे हैं। इतने ही लोग समर्थन में लामबंद हो रहे हैं।

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उम्मीद से ज्यादा खरी सुन गए

भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी रणभेरी कांग्रेस के मुकाबले जल्दी भर दी है। कांग्रेस अभी रणनीति तय कर रही है लेकिन भाजपा ने टूटते जनाधार को संभालने के लिए अपनी फौज को मैदान में उतार दिया है। इसी फौज के कप्तान अशोक परनामी तीन दिन की यात्रा पर बीकानेर आए। श्रीगणेश ही ऐसा हुआ कि पहले ही दिन उन्हें यात्रा बीच में छोड़कर वापस जाना पड़ा। कयास लगाए गए कि उन्हें अब अध्यक्ष के रूप में वापस देखने का अवसर नहीं मिलेगा लेकिन ऊपर ऐसा कुछ नहीं था, जैसा नीचे सोचा गया था। परनामी अगले दिन ही वापस लौट आए। एक-एक विधानसभा की क्लास ली। मास्टरजी की तरह एक नहीं बल्कि दो दो विधायकों को अच्छी खासी डांट लगा दी। पहले बीकानेर पश्चिम के विधायक गोपाल जोशी को और दूसरी खाजूवाला के विधायक डॉ. विश्वनाथ को। जोशी ने अपने ही कार्यकर्ताओं को विरोधी बताया था तो डॉ. विश्वनाथ ने अपने क्षेत्र में अतिक्रमण के नाम पर तोड़े गए मकानों के बारे में कोई जानकारी नहीं होने की बात कह दी। अध्यक्षजी ने कहा आपको अपने विधानसभा क्षेत्र की जानकारी नहीं है तो फिर क्या कर रहे हैं आप? एक विधायक ने बैठक में नहीं आने का साहस भी दिखा दिया। बीकानेर पूर्व की बैठक हुई, चर्चा हुई, बहस हुई लेकिन विधायक सिद्धि कुमारी नहीं थी। अध्यक्ष की बैठक में नहीं आने को हिम्मत ही कहा जाएगा। शिकायतों का सबसे बड़ा अंबार लेकर जो नेताजी हाजिर हुए वो हमारे महापौर नारायण चौपड़ा थे। चौपड़ा जी के बारे में पार्षदों ने इतनी शिकायतें की, जितने दिन उन्होंने महापौरी नहीं की। रही सही कसर पूर्व मंत्री देवीसिंह भाटी ने पूरी कर दी। देशनोक के मंच पर उन्होंने जितनी खरी कही, उतनी तो उम्मीद भी नहीं की होगी।

परिवर्तन यात्रा की चर्चा तेज

कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा अब चर्चा में आ रही है। पूर्व प्रदेशाध्यक्ष डॉ. बी.डी. कल्ला ने प्रत्येक वार्ड में पहुंचकर जन समस्याओं को सुनना शुरू किया तो क्षेत्र के लोगों का दर्द उभर कर सामने आ गया। अब भाजपा नेता इसे चुनावी तैयारी बता रहे हैं तो कांग्रेस इसे सधी हुई शुरूआत बता रहे हैं। इतना तय है कि प्रदेश में भले ही कांग्रेस की तैयारी मंद गति से चल रही है लेकिन बीकानेर में पार्टी एकजुट होकर लडऩे की कोशिश में है। जिस वार्ड में परिवर्तन यात्रा पहुंच रही है, वहां उसी वार्ड के लोगों को साथ लिया जा रहा है। भाजपा नेता अभी तक तो इस यात्रा का जवाब दे नहीं पा रहे हैं।

एक अच्छा काम ये भी

वैसे तो सोशल मीडिया महज चर्चा का केंद्र है, अपनी भड़ास निकालने का माध्यम है या फिर स्वयं की तारीफ करवाने का जरिया है लेकिन इस बीच कुछ काम अच्छे भी हो जाते हैं। टीम बीकानेर से जुड़े लक्ष्मण मोदी ऐसे ही मुद्दे फेसबुक पर डालते रहते हैं। पिछले दिनों पीबीएम अस्पताल के आगे टूटी हुई जालियों को उन्होंने खुद ठीक किया तो इस बार अम्बेडकर सर्किल पर हो रहे बेतरतीब निर्माण कार्य की तरफ ध्यान आकर्षित करवाया। उन्होंने बताया कि ऊंची दीवार सर्किल पर बनी तो दुर्घटनाएं बढ़ेगी। न्यास अध्यक्ष महावीर रांका ने जब इस पोस्ट को देखा तो तुरंत काम रुकवाया और इंजीनियर भेजकर इसे दुरुस्त करवाया। वैसे शिकायत सांसद अर्जुन मेघवाल से भी की गई थी। खैर काम किसी ने भी करवाया तो लक्ष्मण मोदी के प्रयास से दुर्घटना की आशंका कम जरूर हो गई।

नतीजा क्या होगा

अब अध्यक्षजी की यात्रा के बाद कार्यकर्ताओं का सवाल है कि इतनी सुनी है, उसका नतीजा क्या होगा? जवाब भी एक कार्यकर्ता ने ही दिया कि अध्यक्षजी को पता है कि इनकी एक बार सुन लो। न तो हमारे पास नए कार्यकर्ता आने वाले हैं और न हमारे कार्यकर्ताओं को कोई दूसरी पार्टी पकडऩे वाली है। ऐसे में दोनों को यही रहकर काम करना है। भाजपा कार्यकर्ताओं की यह विशेषता है कि वो लड़ाई कितनी भी कर लें लेकिन जब राष्ट्रवाद, भ्रष्टाचार और कांग्रेस का नाम लिया जाता है तो तुरंत प्रभाव से एक भी हो जाते हैं। अच्छी बात है। पार्टी इसी भावना का फायदा उठाकर अपने लोगों को आगे ले आती है और कार्यकर्ता हमेशा पीछे रह जाता है। भाजपा की यात्रा का नतीजा क्या होगा? जवाब तो आप समझ ही गए होंगे।

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आओ 'सुराना जी' से सीखें

विधानसभा में जब मानिकचंद सुराना को श्रेष्ठ विधायक का सम्मान दिया जा रहा था, तब उनके प्रशसंक खुश हो रहे थे लेकिन भाजपा में कई लोगों के चेहरे उदास थे। दरसअल, इस वयोवृद्ध नेता ने कई युवा चेहरों को हराकर विधानसभा में फिर अपना स्थान बनाया था। ऐसे में उनके प्रतिद्वंद्वियों का नाराज होना तो जायज था। कुछ नेता इस बार भाजपा से टिकट लेना चाहते हैं, वो भी सुराना की इस उपलब्धि से ज्यादा खुश नहीं हो रहे थे, उन्हें लगा कि सुराना वापस पार्टी में आए तो उन्हें नुकसान हो सकता है। किसी का खुश होना और नाराज होना अपनी जगह है लेकिन मानिक चंद सुराना के व्यक्तित्व, राजनीतिक जीवन और उनकी दृढ़ता से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। उनका सम्मान वर्ष २०१४ के लिए हुआ है लेकिन उनकी लड़ाई और हर लड़ाई में जीत उनके लंबे राजनीतिक जीवन का हिस्सा है। ऐसे में सिर्फ वर्ष २०१४ तक उन्हें सीमित करना भी उचित नहीं है। कई बार शिकायतों के चलते कार्यकर्ता और वोटर उनसे नाराज भी होते हैं लेकिन हर बार वो किसी न किसी जन मुद्दे पर ही अपनी शिकायत को अंजाम देते हैं। सुराना की लड़ाईयों से भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है, जिसमें उन्होंने किसान, गरीब और मध्यम वर्ग के लिए आवाज उठाई है। पिछले दिनों उन्हें सम्मान मिलने के बाद सोशल मीडिया में यह मुद्दा भी उठाया गया कि लूणकरनसर में विकास नहीं हो रहा। वो शायद यह भूल रहे हैं कि उसी लूणकरनसर से दूसरे विधायक भी निकले हैं, मंत्री भी बने हैं लेकिन जो दर्जा इस क्षेत्र को मिलना चाहिए था, वो नहीं मिला। सुराना के कार्यकाल पर सवाल तो उठाए जा सकते हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक इच्छा शक्ति पर सवाल उठाना बेमानी है।

बधाईयों में भी राजनीति है

अब बधाई तो बधाई है, लेकिन सोशल मीडिया पर बधाई में भी राजनीति नजर आती है। कई बड़े नेताओं के बड़े सिपहसालार फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर सक्रिय है। वो हर रोज कुछ न कुछ पोस्ट करते हैं लेकिन करते वो ही है, जो उनके नेताजी को पसंद हो। न सिर्फ वो पोस्ट करते हैं बल्कि पार्टी को किनारे रखकर अपने नेताजी के विचारों का ही समर्थन करते हैं। अब राज्यसभा की सीटों की घोषणा होने के बाद कई नेताओं ने बधाई बांटी लेकिन इसमें राजनीति साफ नजर आई। जिस तरह के शब्दों का उपयोग हुआ, उसका उनकी ही पोस्ट पर जमकर विरोध भी हुआ।

अब धर्मयात्रा की चर्चा

बीकानेर में एक बार फिर धर्मयात्रा को लेकर चर्चा जोरों पर हैं। १८ मार्च को होने वाली इस धर्म यात्रा को लेकर उन नेताओं के लिए हर बार उहापोह की स्थिति बन जाती है, जो हिन्दू धर्म यात्रा में शामिल तो होना चाहते हैं लेकिन भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सहित अन्य संगठनों के झंडे के नीचे नहीं आना चाहते। आयोजक बार बार इसे गैर राजनीतिक बता रहे हैं लेकिन राजनीति है कि आड़े आ ही जाती है। पिछली बार भी इस इस यात्रा में सभी पार्टियों के लोग शामिल हुए थे और इस बार भी सभी को जोडऩे का प्रयास है। अच्छी बात देखने को मिली कि विचारधारा को किनारे रखकर इस यात्रा का वैभव बढ़ाने के लिए कई दिग्गज नेताओं के परिजन सार्वजनिक मंच पर भी आए हैं। यात्रा अच्छा संदेश दे, सद्भाव को बढ़ावा दें यह सभी चाहते हैं। प्रशासन भी ऐसा ही कुछ चाहता है।

रैली में कितने गए?

पिछले दिनों झुंझुनूं में प्रधानमंत्री की रैली के लिए बड़ा जबर्दस्त अभियान चलाया गया। हर कोई बसों के दावे करता रहा, कोई चार बस तो कोई पांच बस के लिए दावे कर रहा था। हकीकत यह थी कि जितनी बसें बीकानेर से जयपुर लिखवाई गई थी, उतनी बसें तो जिला परिवहन अधिकारी के रिकार्ड में ही नहीं थी। वैसे भी दबाव इसी महकमें पर था कि वो बसों की व्यवस्था करे। आला अधिकारियों ने कुछ बड़े नेताओं के दबाव में बसों का जुगाड़ भी करवाया लेकिन इसके बाद भी सुबह सवेरे तैयार हुए कार्यकर्ताओं को बसों के अभाव में वापस लौटना पड़ा। अब सवाल यह है कि अगर बस परिवहन विभाग ने नहीं भेजी तो अपनी ही कर लेते। कुछ नेता अपनी 'पर्सनलÓ कार से गए भी और फेस बुक पर लाइव भी चलाया कि हम जा रहे हैं।

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कसमसाहट, इधर भी-उधर भी

जिले के एक बड़े नेता भाजपा में वापस आ रहे हैं। इस आशय की खबर चर्चा में आई तो इधर और उधर दोनों तरफ कसमसाहट चालू हो गई। नेताजी की अभी वाली पार्टी के नेता तो यह सोचकर खुश थे कि अगले चुनाव में एक दावेदार कम हो जाएगा, उधर वाले इसलिए खुश थे कि उनके बिना कुछ युवा नेताओं का मन है कि लगता नहीं। हालांकि कुछ बड़े नेताओं के पेट में दर्द भी होने लगा कि यह फिर आ गए तो हमारा क्या होगा? राजनीति में दोस्त कभी दोस्त नहीं होता और दुश्मन हमेशा के लिए दुश्मन नहीं होता। अब यह खबर आई तो पुष्टि के लिए हमने इधर-उधर झांकने के बजाय सीधे नेताजी को ही फोन लगा दिया। उनका जवाब इतना जबर्दस्त था कि 'मेरी किस्मत में विपक्ष ही थोड़े लिखा है?Ó बात भी सही है जिस जहाज में सवार हो, वो किनारे पहुंच रहा है तो डूबने वाले जहाज में सवार क्यों हो? हालांकि यह भविष्य के गर्त में है कि जहाज डूबेगा या नहीं? पिछले दिनों जहाज में पानी आने की बात पता चली। १७ छेद तो पूरी तरह से सामने आ गए, बाकी का पता लगाया जा रहा है। ऐसे में नेताजी के इस कथन को समझदारी भरा निर्णय कहना ही पड़ेगा। यह भी कह सकते हैं कि बार बार गलती नहीं होती।

अब उधर, बैठे एक नेताजी घर वापस आने के लिए मशक्कत कर रहे हैं। वो मान गए कि उनका मन इधर लगता ही नहीं। वो डेढ़ सौ से ज्यादा छेद वाला जहाज छोड़कर दौड़ते जहाज में चढ़े थे लेकिन उन्हें मनपसंद जगह नहीं मिल पाई। जो जहाज डूबा था, उसमें वो आगे की सीट पर थे लेकिन अब बहुत पीछे की सीट नसीब हो पा रही है। यह भी चाहते हैं कि एक बार सत्तासीन जहाज पर ही सवारी की जाए। पुराने रसूख काम आने ही चाहिए।

युवाओं पर रहेगी नजर

अब हर काम चुनावी है। बड़े नेता तो अपने स्तर पर चुनावी तैयारियों में जुट भी गए हैं। बूथ स्तर पर कामकाज शुरू हो गया है। मतदाताओं की संख्या में भारी वृद्धि इसी का परिणाम है। लगभग सभी विधानसभा क्षेत्रों में तीस से चालीस हजार के बीच नए मतदाता है। यह सभी मतदाता १८ वर्ष से २२ वर्ष की आयु के हैं, जिन्हें संभवत: पहली बार मतदान करने का अधिकार मिलेगा। ऐसे में इन युवाओं को ध्यान में रखकर ही बड़े नेता अपनी योजनाएं बना रहे हैं। कार्यक्रमों में उपस्थिति की बात हो या फिर अपने व्यक्तिगत आयोजन हो, हर कहीं युवा शक्ति पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। चुनाव में जरूरी भी है।

एक गैर राजनीतिक अच्छा प्रयास

चुनावी दौर में हर काम चुनावी होता है लेकिन शहर की एक कॉलोनी ने राजनीति को किनारे रखकर अपना मंच बना लिया है। मुरलीधर व्यास कॉलोनी के युवाओं के प्रयास से यहां व्हाट्सएप ग्रुप के माध्यम से सभी लोगों को जोडऩे का प्रयास किया गया। व्हाट्सएप से बाहर निकलकर ग्रुप के सदस्यों ने पिछले दिनों 'फेस टू फेसÓ मुलाकात की। इसके बाद ही एक 'गेट टू गेदरÓ रखा गया है। कुछ ही दिनों में सभी सदस्य मिलेंगे। अच्छी बात है कि गैर राजनीतिक रूप से एक समूह अपने क्षेत्र के विकास की बात कर रहा है। पूरी तरह से उपेक्षित इस कॉलोनी के लोगों को इस एकजुटता का परिणाम भी मिलेगा। जिन लोगों को यहां राजनीति करने का शौक है, उन्हें भी संयम बरतना होगा। कई बार अच्छे काम कुछ लोगों के कारण बिगड़ जाते हैं, सब मिलकर सकारात्मक सोच रखेंगे तो विकास भी होगा।

बीकानेर पूर्व से कौन?

बीकानेर पूर्व विधानसभा सीट से इस बार कौन कौन दावेदार होगा? यह सवाल इन दिनों चर्चा में है। हालांकि सोशल मीडिया पर पूर्व के बजाय पश्चिम पर ज्यादा चर्चा होती है लेकिन पूर्व से कांग्रेस उम्मीदवार को लेकर कयास का दौर तेज हो गया है। जो भी राजनीति में थोड़ा बहुत सक्रिय होने की कोशिश करता है, वो ही पूर्व का दावेदार घोषित हो जाता है। दरअसल, बीकानेर पूर्व एक ऐसी सीट है, जहां जातीय और धार्मिक राजनीति संभव नहीं है। वहां सभी जातियों के लोग हैं, सभी आर्थिक तबके के लोग हैं। ऐसे में कांग्रेस को भी ऐसे नेता की जरूरत है जो पूर्व राजपरिवार की सदस्या और दो बार की विधायक सिद्धि कुमारी को टक्कर दे सके। मामला इतना आसान नहीं है, जितना कांग्रेस के नेता समझ रहे हैं।

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