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नेता गिरी (अनुराग हर्ष) (14)

कसमसाहट, इधर भी-उधर भी

जिले के एक बड़े नेता भाजपा में वापस आ रहे हैं। इस आशय की खबर चर्चा में आई तो इधर और उधर दोनों तरफ कसमसाहट चालू हो गई। नेताजी की अभी वाली पार्टी के नेता तो यह सोचकर खुश थे कि अगले चुनाव में एक दावेदार कम हो जाएगा, उधर वाले इसलिए खुश थे कि उनके बिना कुछ युवा नेताओं का मन है कि लगता नहीं। हालांकि कुछ बड़े नेताओं के पेट में दर्द भी होने लगा कि यह फिर आ गए तो हमारा क्या होगा? राजनीति में दोस्त कभी दोस्त नहीं होता और दुश्मन हमेशा के लिए दुश्मन नहीं होता। अब यह खबर आई तो पुष्टि के लिए हमने इधर-उधर झांकने के बजाय सीधे नेताजी को ही फोन लगा दिया। उनका जवाब इतना जबर्दस्त था कि 'मेरी किस्मत में विपक्ष ही थोड़े लिखा है?Ó बात भी सही है जिस जहाज में सवार हो, वो किनारे पहुंच रहा है तो डूबने वाले जहाज में सवार क्यों हो? हालांकि यह भविष्य के गर्त में है कि जहाज डूबेगा या नहीं? पिछले दिनों जहाज में पानी आने की बात पता चली। १७ छेद तो पूरी तरह से सामने आ गए, बाकी का पता लगाया जा रहा है। ऐसे में नेताजी के इस कथन को समझदारी भरा निर्णय कहना ही पड़ेगा। यह भी कह सकते हैं कि बार बार गलती नहीं होती।

अब उधर, बैठे एक नेताजी घर वापस आने के लिए मशक्कत कर रहे हैं। वो मान गए कि उनका मन इधर लगता ही नहीं। वो डेढ़ सौ से ज्यादा छेद वाला जहाज छोड़कर दौड़ते जहाज में चढ़े थे लेकिन उन्हें मनपसंद जगह नहीं मिल पाई। जो जहाज डूबा था, उसमें वो आगे की सीट पर थे लेकिन अब बहुत पीछे की सीट नसीब हो पा रही है। यह भी चाहते हैं कि एक बार सत्तासीन जहाज पर ही सवारी की जाए। पुराने रसूख काम आने ही चाहिए।

युवाओं पर रहेगी नजर

अब हर काम चुनावी है। बड़े नेता तो अपने स्तर पर चुनावी तैयारियों में जुट भी गए हैं। बूथ स्तर पर कामकाज शुरू हो गया है। मतदाताओं की संख्या में भारी वृद्धि इसी का परिणाम है। लगभग सभी विधानसभा क्षेत्रों में तीस से चालीस हजार के बीच नए मतदाता है। यह सभी मतदाता १८ वर्ष से २२ वर्ष की आयु के हैं, जिन्हें संभवत: पहली बार मतदान करने का अधिकार मिलेगा। ऐसे में इन युवाओं को ध्यान में रखकर ही बड़े नेता अपनी योजनाएं बना रहे हैं। कार्यक्रमों में उपस्थिति की बात हो या फिर अपने व्यक्तिगत आयोजन हो, हर कहीं युवा शक्ति पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। चुनाव में जरूरी भी है।

एक गैर राजनीतिक अच्छा प्रयास

चुनावी दौर में हर काम चुनावी होता है लेकिन शहर की एक कॉलोनी ने राजनीति को किनारे रखकर अपना मंच बना लिया है। मुरलीधर व्यास कॉलोनी के युवाओं के प्रयास से यहां व्हाट्सएप ग्रुप के माध्यम से सभी लोगों को जोडऩे का प्रयास किया गया। व्हाट्सएप से बाहर निकलकर ग्रुप के सदस्यों ने पिछले दिनों 'फेस टू फेसÓ मुलाकात की। इसके बाद ही एक 'गेट टू गेदरÓ रखा गया है। कुछ ही दिनों में सभी सदस्य मिलेंगे। अच्छी बात है कि गैर राजनीतिक रूप से एक समूह अपने क्षेत्र के विकास की बात कर रहा है। पूरी तरह से उपेक्षित इस कॉलोनी के लोगों को इस एकजुटता का परिणाम भी मिलेगा। जिन लोगों को यहां राजनीति करने का शौक है, उन्हें भी संयम बरतना होगा। कई बार अच्छे काम कुछ लोगों के कारण बिगड़ जाते हैं, सब मिलकर सकारात्मक सोच रखेंगे तो विकास भी होगा।

बीकानेर पूर्व से कौन?

बीकानेर पूर्व विधानसभा सीट से इस बार कौन कौन दावेदार होगा? यह सवाल इन दिनों चर्चा में है। हालांकि सोशल मीडिया पर पूर्व के बजाय पश्चिम पर ज्यादा चर्चा होती है लेकिन पूर्व से कांग्रेस उम्मीदवार को लेकर कयास का दौर तेज हो गया है। जो भी राजनीति में थोड़ा बहुत सक्रिय होने की कोशिश करता है, वो ही पूर्व का दावेदार घोषित हो जाता है। दरअसल, बीकानेर पूर्व एक ऐसी सीट है, जहां जातीय और धार्मिक राजनीति संभव नहीं है। वहां सभी जातियों के लोग हैं, सभी आर्थिक तबके के लोग हैं। ऐसे में कांग्रेस को भी ऐसे नेता की जरूरत है जो पूर्व राजपरिवार की सदस्या और दो बार की विधायक सिद्धि कुमारी को टक्कर दे सके। मामला इतना आसान नहीं है, जितना कांग्रेस के नेता समझ रहे हैं।

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लोकतांत्रिक संस्थाएं कब स्वीकार करेगी संविधान को

गणतंत्र दिवस पर सभी को शुभकामनाएं। उनको विशेष रूप से बधाई है, जो न तो गण को मानते हैं और न तंत्र को स्वीकार करते हैं। वर्ष 1950 में हम जिस संविधान को लेकर भारत को गरीब से विकासशील देश बनाने की जुगत में जुटे थे और आज जिस विकासशील भारत को विकसित बनाने का सपना संजो रहे हैं, उस संविधान को धार्मिक ग्रंथ की तरह लेते तो भारत आज अमेरिका, चीन और दूसरे विकसित राष्ट्रों से कमजोर नहीं होता। नि:संदेह वर्ष 1947 के भारत को बहुत पीछे छोड़कर हमने नए भारत को बनाया है, लेकिन दुख की बात है कि जिन लोगों पर संविधान को लागू करने का जिम्मा था, उन्होंने पूरी शिद्दत के साथ अपना कर्म नहीं किया। हमारी तरक्की के मुख्य कारक देशवासी ही है। जिन संस्थाओं (लोकसभा, राÓयसभा और विधानसभाओं) को यह जिम्मा सौंप रखा है वो देशवासियों की मानवशक्ति का सही उपयोग करने के बजाय दुरुपयोग करती है। सवा सौ करोड़ भारतीयों का यह देश ऐसे विवादों में उलझा रहता है, जिसका न सिर है न पैर। यह चर्चाएं किसी बाहरी देश से नहीं आती, बल्कि हमारे नेता ही उठाते हैं। एक नेताजी कुछ ऊटपटांग बोलेंगे और पूरा देश और मीडिया उसकी बकवास पर चर्चा करना शुरू कर देती है। आखिर क्यों, राष्ट्र की मानवशक्ति सकारात्मक के बजाय नकारात्मक दिशा में बढ़ती जा रही है। ताजा उदाहरण 'पद्मावत' की ही ले सकते हैं। जब देशवासी और जाति विशेष के लोग नहीं चाहते कि उनकी भावनाओं को आहत किया जाए तो क्या जरूरी है, ऐसे विषय पर फिल्म बनाई जाए? क्या हम पद्मावत फिल्म को नहीं देखेंगे तो कुछ उम्र कम हो जाएगी। आखिर क्यों ऐसे विषयों को ढूंढा जाता है, जिस पर आपत्ति हो, झगड़ा हो, फसाद हो। पूरी तरह से मार्केटिंग और प्रोफेशनल हो चुके फिल्म निर्माता और न्यूज चैनल इस देश की भोली भाली जनता को बातों में उलझा देते हैं और हर कोई बस उसी मामले में शामिल होने में जुट जाता है। विरोध है, विरोध है, समर्थन है, समर्थन है, समर्थन है। क्यों विरोध है और क्यों समर्थन है, अधिकांश लोग नहीं जानते। 

हमारे संविधान के प्रथम पृष्ठ बताया गया है कि भारत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। क्या सच में यह हालात है? शायद नहीं है। टीवी चैनल की बहस (अमूमन बकवास भी) में लड़ते हिन्दू और मुसलमान साफ बयां करते हैं कि देश में सभी के मन में सभी भावनाओं का सम्मान नहीं है। आखिर कोई व्यक्ति इस मुद्दे पर उ"ातम न्यायालय में क्यों नहीं जाता कि धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में धार्मिक मुद्दों पर सार्वजनिक बहस क्यों होती है? क्यों हम किसी भी व्यक्ति को दूसरे धर्म के खिलाफ बोलने की आजादी दे देते हैं और वो भी एक ऐसे राष्ट्रीय चैनल पर, जिसे लाइव हजारों-लाखों लोग देख रहे हैं।
युवाओं की समस्याओं को निपटाने के लिए देश की संसद क्या कर रही है। जिस देश की सरकारें युवाओं को नौकरी देने के नाम पर हर साल अरबों रुपए की कमाई करती है, उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है? आश्चर्य की बात है कि हम किसान का कर्ज माफ कर रहे हैं, बैंक में समय पर ऋण की किश्त जमा नहीं कर रहे लोगों को ब्याज माफ कर रहे हैं, अमीर गरीब देखे बगैर दवाएं मुफ्त बांट रहे हैं और स्कूलों में फ्री पढ़वा रहे हैं, वहां युवा को नौकरी के लिए निशुल्क आवेदन करने की छूट नहीं है। बेहतर होगा कि सरकार यह तय कर दें कि एक तय प्राप्तांक तक पहुंचने वाले युवा को तो कम से कम शुल्क वापस कर देंगे। वो एक पद के लिए एक बार पंजीयन कर लें और बाद में उस पद के लिए आवेदन निशुल्क कर दें। दुख की बात है कि इस मुद्दे पर देश का कोई नेता नहीं बोलता। किसी भी पार्टी के घोषणा पत्र में ऐसा साहस नहीं है। वैसे भी घोषणा पत्र तो महज मुर्ख बनाने का जरिया रह गया है। कांग्रेस हो या फिर भाजपा, सभी हजारों, लाखों युवाओं को रोजगार देने की घोषणा करती है लेकिन चार साल बाद जब हिसाब देने का वक्त आता है तो निजी स्कूलों में दो-तीन हजार रुपए की नौकरी करने वालों की संख्या भी सरकार अपने आंकड़ों में जोड़कर दिखा देती है।
संविधान में कहां बताया गया है कि नेता को सिर्फ अपनी पार्टी के पक्ष में बोलना है? वो सांसद, विधायक यहां तक कि पार्षद बनने के बाद भी गलत को गलत कहने की हिम्मत खो देता है। जो पार्टी के हित में है, वो ही सही है। पार्टी लाइन पर चलने वाले हमारे जनप्रतिनिधि देश की लाइन पर कब चलेंगे? आज हमें ही तय करना होगा कि हम गण और तंत्र दोनों का सम्मान करेंगे। नेताओं के लिए पार्टी पहले हो सकती है, लेकिन हम देशवासियों के लिए देश ही सबसे पहले हैं। आज शपथ लें कि धार्मिक ग्रंथ की तरह हम संविधान का भी सम्मान करेंगे।

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कांग्रेस का यह कैसा डीएनए

न सिर्फ गाय बल्कि गौ के पूरे वंश यानी गौ वंश की रक्षा के लिए अचानक से कांग्रेसी चिंतित हो गए हैं। राहुल गांधी एक बात बार बार बताते हैं कि कांग्रेस के डीएनए में क्या-क्या है। इतना निश्चित है कि यह गाय कभी कांग्रेस के डीएनए में नहीं थी। इसके बाद भी उनकी पार्टी के बैनर तले इस तरह हिन्दूवादी नीति रीति की न सिर्फ बातें बल्कि उनकी आस्था से जुड़े मुद्दों की बात भी हो रही है, तथाकथित चिंता हो रही है और इसी चिंता का जमकर जिक्र हो रहा है। कांग्रेस के डीएनए में नहीं होते हुए भी ऐसा क्यों हो रहा है, इसका जवाब 'कींकरिया क्लबÓ के एक साथी ने दे दिया। उन्होंने कहा कि गोपाल गहलोत के डीएनए में गाय और हिन्दूवादी राजनीति थी। वो कांग्रेस में आकर भी वैसा ही कर रहे हैं। एक दूसरे नेता जो कांग्रेस से भाजपा में चले गए हैं, वो आज भी कांग्रेसी स्टाइल में ही राजनीति कर रहे हैं। बताते हैं कि पिछले दिनों वो खुद यह स्वीकार कर चुके हैं कि वो कांग्रेसी स्टाइल में ही राजनीति कर सकते हैं। 

दरअसल, कांग्रेस और भाजपा के जिन नेताओं ने पिछले चुनाव में पार्टी बदली थी, उनमें अधिकांश का अपनी मूल पार्टी में ही मन लगता है। एक नेताजी अब कांग्रेस में आ गए हैं लेकिन साथी और 'चेलेÓ अब भी भाजपा में ही है। ऐसे में वो स्वयं कांग्रेस में रहकर भाजपा के अपने मित्रों को अब तक संभाले हुए हैं। भाजपा के युवा नेताओं का समर्पण इन नेताजी के प्रति इतना जबर्दस्त है कि वो चाहकर भी उन्हें छोड़ नहीं पाते। अच्छी बात है। राजनीति किसी पार्टी की सीमाओं में बंधकर नहीं की जा सकती। प्रतिबद्धता एक पार्टी के प्रति हो सकती है लेकिन मित्रता सभी के साथ होनी चाहिए। बीकानेर में दो पार्टियों के बीच ऐसी मित्रता देखकर मन को सुकून मिलता है।


फिर से कर्मचारी नेता सक्रिय है


विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही कर्मचारी नेता फिर सक्रिय हो गए हैं। विभिन्न विभागों की राजनीति कर रहे कर्मचारी नेता जैसे ही चुनाव आते हैं अपनी राग तेज कर देते हैं। उनके साथ वाले भी समझ जाते हैं कि इन्हें चुनाव लडऩा है, वो ही उन्हें पीछे धकेलना शुरू कर देते हैं। दो कर्मचारी नेता इस बार भी टिकट की कोशिश में है। एक नेताजी बीकानेर में राजनीति करते हैं और दूसरे जयपुर में। दूसरे वाले नेताजी कभी कभार ही जयपुर से बीकानेर आते हैं। वो सत्ता के नजदीक है लेकिन सत्ता का हिस्सा अब तक नहीं बन पाए। पिछले दो विधानसभा चुनाव में उनका नाम आता है, टिकट नहीं आता।


बेनीवाल बिगाड़ रहे हैं फिल्डिंग

हनुमान बेनीवाल ने प्रदेश की राजनीति में अड़ंगा डाला है तो बीकानेर में भी उनसे कई बड़े नेता अब परेशान हो रहे हैं। लाखों युवाओं की मीटिंग करने वाले राजस्थान के इक्का दुक्का नेताओं में से एक हनुमान बेनीवाल ने जैसे ही बीकानेर में हुकार रैली करने की घोषणा की, वैसे ही कई नेताओं के चेहरे पर चिंता की लकीरे नजर आने लगी है। दरअसल, बेनीवाल अगर यहां मजबूत होते हैं तो कई विधानसभा सीटों पर असर डाल सकते हैं। उनसे सर्वाधिक कांग्रेस प्रभावित होगी। नोखा, श्रीडूंगरगढ़ और लूणकरनसर सीटों पर बेनीवाल की प्रभावी उपस्थिति रहती है तो इसका सीधा लाभ भारतीय जनता पार्टी को जाने वाला है। दरअसल, कांग्रेस विचारधारा के किसान मतों का बंटवारा ही बेनीवाल करेंगे। पिछले दिनों पत्रकार सम्मेलन में उनसे यह सीधा सवाल पूछा तो वो हंसी मजाक में टाल गए।

जिसा छोड़ग्या, बिसा ही हां

पद के साथ व्यक्ति की विचारधारा बदल जाती है। व्यस्तता भी बढ़ जाती है। इसी विचारधारा और व्यस्तता के बीच कई बार अपने पराए होने लगते हैं। अब तक जो लोग हमारे आगे पीछे दौड़ रहे थे, वो ही लोग बोझ लगने लगते हैं। उन्हें जरा से टेढ़ा बोला नहीं कि वो किनारे हो जाते हैं। न सिर्फ किनारा करते हैं बल्कि विरोधी उसे तुरंत अपने साथ जोड़ भी लेते हैं। पिछले दिनों कांग्रेस के एक कद्दावर नेता को कुछ ऐसा ही अहसास हुआ। इनके पास सत्ता नहीं होने के बावजूद दबदबा होने के कारण स्वभाव में अंतर देखा गया। एक युवा नेता उनसे नाराज हो गए। जब पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की उपस्थिति में इस बड़े नेता ने अपने युवा नेता से कुशलक्षेम पूछी तो युवा नेता ने यह कहकर किन्नी काट ली..'जिसा थे छोड़ग्या हा, बिसा ही हांÓ

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कांग्रेस का मुकाबला कांग्रेस से

पिछले दिनों राजनीतिक दृष्टि से कई बड़े घटनाक्रम सामने आए। संयोग है कि दोनों ही घटनाक्रम कांग्रेस के थे और आपसी फूट से जुड़े थे। यह साबित हो गया कि जनता ने कांग्रेस को सत्ता देने का मानस बनाया है या नहीं बनाया है, यह भविष्य के गर्त में है लेकिन स्वयं कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया है कि उनकी सरकार आ रही है। पार्टी में जीत का कोई सवाल नहीं है, मुद्दा तो सिर्फ मुख्यमंत्री कौन बनेगा? इसका है। यही कारण है कि हाल ही में जब पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बीकानेर आए तो कांग्रेस के मुख्यमंत्री का मुद्दा खड़ा हो गया। पहले उन्होंने सीकर में जो कुछ कहा, वो खबर का हिस्सा बना और बाद में उनकी उपस्थिति में रामेश्वर डूडी जिंदाबाद के  नारे चर्चा का केंद्र बने। दरअसल, कांग्रेस में इन दिनों तीन नेता मुख्यमंत्री पद के दावेदार है। पहले स्वयं अशोक गहलोत, दूसरे प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट और तीसरे नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी। ऐसे में डूडी समर्थक पूरे जोश के साथ जिंदाबाद के नारे लगाने से नहीं चूक रहे थे। लोकतंत्र में इस तरह की स्वतंत्रता हर किसी को है लेकिन चुनाव से दस महीने पहले इसे जल्दबाजी कहा जाएगा। पार्टी को अभी अपनी जीत सुनिश्चित करनी है, जिसके लिए माहौल बनता फिलहाल नजर नहीं आ रहा है। दूसरा मामला था खाजूवाला का। यहां भी कांग्रेस खुद से उलझती नजर आई। एक तरफ तो कांग्रेस के देहात अध्यक्ष महेंद्र गहलोत प्रदर्शन में जुटे थे तो दूसरी तरफ कांग्रेस के नेता गोविन्द मेघवाल। इस विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस ने अपनी फूट चुनाव से पहले ही स्पष्ट कर दी। देहात अध्यक्ष महेंद्र गहलोत ने जिस तरह का प्रदर्शन यहां किया है, उससे साफ है कि वो व्यक्तिगत राजनीति में विश्वास रखते हैं।

पत्रबाजी का सिलसिला शुरू हुआ

कांग्रेस के अंदरुनी कलह का ही नमूना है कि पार्टी के नेता अपने ही पदाधिकारियों के खिलाफ जमकर पत्रबाजी कर रहे हैं। खासकर खाजूवाला मामले के बाद देहात अध्यक्ष महेंद्र गहलोत को घेरने की तैयारी पूरी हो रही है। एक ही दिन में दो आयोजन से पहले भी गहलोत के खिलाफ प्रदेशाध्यक्ष को पत्र लिखा गया था और नए सिरे से फिर गहलोत की शिकायत की जा रही है। इस बार प्रदेश अध्यक्ष के साथ नवनिर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी तक बात पहुंचाने का प्रयास हो रहा है कि यहां पार्टी को अपने ही पदाधिकारियों से नुकसान हो रहा है। यह बात अलग है कि गहलोत भी पूरी तैयारी करके मैदान में है।

क्रिकेट के बहाने राजनीति

क्रिकेट के बहाने राजनीति उ"ा स्तर पर तो होती रही है लेकिन जिला स्तर पर ऐसा मामला पहली बार ही सामने आया है। पिछले दिनों पुष्करणा स्टेडियम पर आयोजित एक क्रिकेट प्रतियोगिता के शानदार आयोजन के बाद एक नेताजी ने मंच पर खड़े होकर जमकर भाषण दिए। अपनी जाति के लिए काफी जोश और खरोश के साथ बात रखी। अ'छी बात है। इसके साथ ही उन्हें यह भी बताना था कि वो इस मैदान के लिए क्या कर रहे हैं। दुखद बात है कि बीकानेर पश्चिम विधानसभा में एक भी ऐसा खेल मैदान नहीं है जहां खिलाड़ी पूरे विश्वास के साथ अपना समय दे सकें। पुष्करणा स्टेडियम में ुसुविधा नहीं है, एमएम ग्राऊंड में जगह नहीं है। धरणीधर मैदान में कुछ कोशिश हो रही है लेकिन इंडोर गेम वाले खिलाड़ी को मन मसोसना ही पड़ेगा।

गहलोत की राजनीति

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत एक बार साबित कर गए कि बीकानेर के बड़े राजनेताओं के बावजूद उनकी फेन फॉलोविंग यहां कम नहीं है। उन्होंने 'अपनों' से जुडऩे का कोई मौका नहीं छोड़ा। वो यहां अपने मित्र भवानीशंकर शर्मा के निधन पर शोक व्यक्त करने आए थे लेकिन आ ही गए तो कई अन्य काम भी निपटा गए। रिश्तेदार रवि गहलोत के निधन पर शोक जताया तो पुराने समय के मित्र प्रोफेसर अशोक आचार्य के घर पहुंचकर उनके पुत्र संजय आचार्य से भी मिले। इतना ही नहीं गहलोत बाद में कांग्रेस नेता और माली समाज के प्रदेशाध्यक्ष गुलाब गहलोत के घर भी पहुंचे। गुलाब अशोक गहलोत के नजदीकी रहे हैं। दरअसल, गहलोत ने जिले के बड़े कांग्रेसी नेताओं को बता दिया कि उनके क्षेत्र में भी वो वजूद रखते हैं। 

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कांग्रेस का मुकाबला कांग्रेस से

सत्ता से पहले सत्ता की लड़ाई कांग्रेस में नजर आ रही है। कांग्रेस अगर यह मानकर चल रही है कि सत्ता खुद चलकर उनके पास आ रही है, तो उन्हें इस गलतफहमी को त्याग देना चाहिए। प्रदेश में भाजपा की जड़े इतनी मजबूत है कि वो किसी एक नेता के खराब प्रदर्शन के बाद भी अपनी वापसी करने में अब अक्षम नहीं है। ऐसे में कांग्रेस को आपसी मनमुटाव छोड़कर अपनी नीति और रीति को संभालना होगा।

पिछले दिनों राजनीतिक दृष्टि से कई बड़े घटनाक्रम सामने आए। संयोग है कि दोनों ही घटनाक्रम कांग्रेस के थे और आपसी फूट से जुड़े थे। यह साबित हो गया कि जनता ने कांग्रेस को सत्ता देने का मानस बनाया है या नहीं बनाया है, यह भविष्य के गर्त में है लेकिन स्वयं कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया है कि उनकी सरकार आ रही है। पार्टी में जीत का कोई सवाल नहीं है, मुद्दा तो सिर्फ मुख्यमंत्री कौन बनेगा? इसका है। यही कारण है कि हाल ही में जब पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बीकानेर आए तो कांग्रेस के मुख्यमंत्री का मुद्दा खड़ा हो गया। पहले उन्होंने सीकर में जो कुछ कहा, वो खबर का हिस्सा बना और बाद में उनकी उपस्थिति में रामेश्वर डूडी जिंदाबाद के नारे चर्चा का केंद्र बने। दरअसल, कांग्रेस में इन दिनों तीन नेता मुख्यमंत्री पद के दावेदार है। पहले स्वयं अशोक गहलोत, दूसरे प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट और तीसरे नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी। ऐसे में डूडी समर्थक पूरे जोश के साथ जिंदाबाद के नारे लगाने से नहीं चूक रहे थे। लोकतंत्र में इस तरह की स्वतंत्रता हर किसी को है लेकिन चुनाव से दस महीने पहले इसे जल्दबाजी कहा जाएगा। पार्टी को अभी अपनी जीत सुनिश्चित करनी है, जिसके लिए माहौल बनता फिलहाल नजर नहीं आ रहा है।
दूसरा मामला था खाजूवाला का। यहां भी कांग्रेस खुद से उलझती नजर आई। एक तरफ तो कांग्रेस के देहात अध्यक्ष महेंद्र गहलोत प्रदर्शन में जुटे थे तो दूसरी तरफ कांग्रेस के नेता गोविन्द मेघवाल। इस विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस ने अपनी फूट चुनाव से पहले ही स्पष्ट कर दी। देहात अध्यक्ष महेंद्र गहलोत ने जिस तरह का प्रदर्शन यहां किया है, उससे साफ है कि वो व्यक्तिगत राजनीति में विश्वास रखते हैं।


पत्रबाजी का सिलसिला शुरू हुआ

कांग्रेस के अंदरुनी कलह का ही नमूना है कि पार्टी के नेता अपने ही पदाधिकारियों के खिलाफ जमकर पत्रबाजी कर रहे हैं। खासकर खाजूवाला मामले के बाद देहात अध्यक्ष महेंद्र गहलोत को घेरने की तैयारी पूरी हो रही है। एक ही दिन में दो आयोजन से पहले भी गहलोत के खिलाफ प्रदेशाध्यक्ष को पत्र लिखा गया था और नए सिरे से फिर गहलोत की शिकायत की जा रही है। इस बार प्रदेश अध्यक्ष के साथ नवनिर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी तक बात पहुंचाने का प्रयास हो रहा है कि यहां पार्टी को अपने ही पदाधिकारियों से नुकसान हो रहा है। यह बात अलग है कि गहलोत भी पूरी तैयारी करके मैदान में है।


क्रिकेट के बहाने राजनीति

क्रिकेट के बहाने राजनीति उच्च स्तर पर तो होती रही है लेकिन जिला स्तर पर ऐसा मामला पहली बार ही सामने आया है। पिछले दिनों पुष्करणा स्टेडियम पर आयोजित एक क्रिकेट प्रतियोगिता के शानदार आयोजन के बाद एक नेताजी ने मंच पर खड़े होकर जमकर भाषण दिए। अपनी जाति के लिए काफी जोश और खरोश के साथ बात रखी। अच्छी बात है। इसके साथ ही उन्हें यह भी बताना था कि वो इस मैदान के लिए क्या कर रहे हैं। दुखद बात है कि बीकानेर पश्चिम विधानसभा में एक भी ऐसा खेल मैदान नहीं है जहां खिलाड़ी पूरे विश्वास के साथ अपना समय दे सकें। पुष्करणा स्टेडियम में ुसुविधा नहीं है, एमएम ग्राऊंड में जगह नहीं है। धरणीधर मैदान में कुछ कोशिश हो रही है लेकिन इंडोर गेम वाले खिलाड़ी को मन मसोसना ही पड़ेगा।

गहलोत की राजनीति

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत एक बार साबित कर गए कि बीकानेर के बड़े राजनेताओं के बावजूद उनकी फेन फॉलोविंग यहां कम नहीं है। उन्होंने 'अपनोंÓ से जुडऩे का कोई मौका नहीं छोड़ा। वो यहां अपने मित्र भवानीशंकर शर्मा के निधन पर शोक व्यक्त करने आए थे लेकिन आ ही गए तो कई अन्य काम भी निपटा गए। रिश्तेदार रवि गहलोत के निधन पर शोक जताया तो पुराने समय के मित्र प्रोफेसर अशोक आचार्य के घर पहुंचकर उनके पुत्र संजय आचार्य से भी मिले। इतना ही नहीं गहलोत बाद में कांग्रेस नेता और माली समाज के प्रदेशाध्यक्ष गुलाब गहलोत के घर भी पहुंचे। गुलाब अशोक गहलोत के नजदीकी रहे हैं। दरअसल, गहलोत ने जिले के बड़े कांग्रेसी नेताओं को बता दिया कि उनके क्षेत्र में भी वो वजूद रखते हैं।

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खाजूवाला में होगा राजनीतिक दंगल

विधानसभा चुनाव में असली दंगल तो पांच और छह महीने बाद देखने को मिलेगा लेकिन खेल के पासे फैंकने का काम अभी शुरू हो गया है। बीकानेर की सात विधानसभा सीटों में से इस बार जिस सीट पर चुनाव से पहले दंगल होने वाला है वो हैं खाजूवाला की सीट। इस बार सीट पर दलित नेताओं की बाढ़ आने वाली है। जितने भी दावेदार है, सभी दमदार है, मजबूत है। यहां से भाजपा के विधायक डॉ. विश्वनाथ है लेकिन इस बार उन्हें अपनी पार्टी के सांसद पुत्र से चुनाव से पहले दो-दो हाथ करने पड़ेंगे। दरअसल, यहां से सांसद अर्जुन राम मेघवाल के पुत्र रवि मेघवाल भी दावेदार है। दरअसल, रवि स्वयं खाजूवाला में काफी सक्रिय है और पिछले दिनों हॉर्डिंग्स लगाकर उन्होंने साफ कर दिया कि पिता की विरासत लेने के लिए पूरी तरह से तैयार है। वैसे डॉ. विश्वनाथ का काम भी कच्चा नहीं है। वो भी पूरी मजबूती के साथ इन दिनों अपने विधानसभा क्षेत्र में लगे हुए हैं। अगर रवि मेघवाल विधानसभा में टिकट के दावेदार है तो चर्चा है कि डॉ. विश्वनाथ की पत्नी डॉ. विमला भी सांसद की उम्मीदवार है। अगर किसी भी स्थिति में प्रधानमंत्री मोदी अपने सांसदों को रिपोट्र्स के आधार पर बदलते हैं तो विमला डुकवाल का नाम सबसे आगे चल रहा है। चुनाव से पहले की यह मशक्कत सिर्फ भाजपा में ही नहीं है बल्कि कांग्रेस में भी मची हुई है। यहां गोविन्द मेघवाल ने पिछला चुनाव लड़ा था। इस बार उनका टिकट कटवाने वालों की कमी नहीं है। राजनीतिक रूप से गोविन्द के प्रतिद्वंद्वी रहे नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश की राजनीति में इन दिनों काफी आगे चल रहे रामेश्वर डूडी के खास और देहात कांग्रेस अध्यक्ष महेंद्र गहलोत ने गोविन्द की अनुपस्थिति में ही आन्दोलन कर नए समीकरण पैदा कर दिए।

विधानसभा चुनाव से पहले इस मुद्दे पर कई बार बात हो गई लेकिन लगातार खाजूवाला में ही टिकट के लिए दौड़भाग हो रही है। इस आरक्षित सीट पर कांग्रेस बहुत कम अंतर से पिछला विधानसभा चुनाव हार गई थी। इस बार भी वहां कांग्रेस एक जुट नजर नहीं आ रही है। एकता के मामले में भाजपा की हालत यहां और भी ज्यादा बदतर है। भाजपा के कई धड़े वहां आमने सामने चुनाव से पहले हो गए हैं।


उपचुनाव में बीकानेर का सीधा जुड़ाव

प्रदेश में दो लोकसभा सीटों और एक विधानसभा सीट पर बीकानेर की प्रतिष्ठा भी दाव पर लगी हुई है। कैसे? वो ऐसे कि अलवर में कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में डॉ. करण सिंह यादव मैदान में है। वो बीकानेर के उदयरामसर के निवासी है और बीकानेर के काफी करीब है। इसके अलावा अजमेर में भाजपा ने जिन इक्का दुक्का लोगों को जीत की जिम्मेदारी सौंपी है, उनमें बीकानेर के पूर्व शहर भाजपा अध्यक्ष विजय आचार्य भी है। दोनों ही जगह अलग-अलग पार्टी से बीकानेरी कार्यकर्ता जुड़े हुए हैं। वैसे तीसरे विधानसभा क्षेत्र मांडलगढ़ से हमारे ही शहर के गोकुल प्रसाद पुरोहित पहले विधायक रह चुके हैं।

गुजरात का हिसाब तो दो...

गुजरात में विधानसभा चुनाव खत्म हो गए। सरकार भी बन गई। इसके बाद उपमुख्यमंत्री नाराज भी हो गए, उन्हें मनचाहे विभाग भी मिल गए। कहने का मतलब है कि गुजरात विधानसभा चुनाव की बात अब पुरानी होने वाली है लेकिन हमारे यहां से गए नेताओं ने अब तक अपना हिसाब नहीं दिया है। कांग्रेस और भाजपा दोनों के ही नेता काफी जोश खरोश के साथ गुजरात में जुटे थे। कोई राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में तो कोई जातीय आधार पर अपनी पार्टी को टिकट दिलाने के लिए। वहां से खूब फोटो भी फेसबुक पर डाले लेकिन परिणाम आने के बाद किसी ने नहीं बताया कि उनके प्रचार वाले क्षेत्र में पार्टी को जीत मिली या फिर हार। हां...यह भी संभव है कि कुछ बताने लायक होगा ही नहीं तो क्या बताएं?


युवा नेता निष्क्रिय क्यों?


पिछले कुछ दिनों से देखने में आ रहा है कि शहर के कई युवा नेता अचानक से निष्क्रिय हो गए हैं। आखिर क्यों? राजनीति में रहना है तो कुछ न कुछ करना होगा। शहर भाजपा में भी कई नए और युवा चेहरों को अवसर दिया गया है लेकिन उनकी सक्रियता फिलहाल नजर नहीं आई है। वेद व्यास भी ऐसे ही नेताओं में है,जिनकी लंबी चौड़ी टीम निष्क्रिय सी नजर आ रही है। इसी तरह लूणकरनसर में टिकट के दावेदार माने जा रहे डॉ. भागीरथ मूंड भी इन दिनों कम नजर आ रहे हैं। इनकी कम सक्रियता से न सिर्फ राजनीतिक मैदान सूना नजर आ रहा है बल्कि समीकरण भी बदलते नजर आ रहे हैं। राजनीति में ऐसे युवाओं की जरूरत है और उन्हें अपने दम पर अपना रास्ता बनाएं। किसी नेता की बैसाखी पकड़कर आगे नहीं आना है, उन्हें।

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डॉ. विश्वनाथ मौन क्यों है..?

अनुराग हर्ष। एक बार फिर प्रदेश के सभी चिकित्सक हड़ताल पर है। हड़ताल भी ऐसी है कि चिकित्सक और सरकार जैसे आपस में युद्ध लड़ रहे हैं। ऐसे में बीकानेर के एक डॉक्टर साब की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है लेकिन वो खुद ही ज्यादा रुचि नहीं ले रहे या सरकार उनका उपयोग नहीं कर रही। खाजूवाला विधानसभा क्षेत्र से विधायक और संसदीय सचिव डॉ. विश्वनाथ मेघवाल सरकार के प्रतिनिधि है। पिछले दिनों हड़ताल से हालात ज्यादा बिगड़े तो डॉक्टरों से मेल मुलाकात कर मामले को निपटाने के बजाय स्वयं ही अस्पताल में जाकर मरीजो को देखने लगे। मरीजों को देखने के बाद दवा खुद नहीं लिख रहे थे बल्कि किसी साथ खड़े व्यक्ति से लिखवा रहे थे। मजे की बात है कि डॉक्टर साब स्वयं आंदोलनरत सेवारत चिकित्सक संघ के बीकानेर अध्यक्ष रहे हैं। तब भी आंदोलन में खूब आगे रहे। सरकार पर आरोपों झड़ी लगाने में पीछे नहीं रहे। अब जब स्वयं सरकार में है तो कुछ भी बोलने के लिए तैयार नहीं? न तो हड़ताल खत्म करने में रुचि है और न अपने साथियों की बात को सरकार तक पहुंचवाने में। सही भी है 'बळती' में हाथ डालने के बजाय दूर खड़े रहकर ही हाथ सैक लें तो बेहतर है। यहां यह भी कहना चाहूंगा कि डॉक्टर सॉब के डॉक्टर मित्र भी बड़े 'सयाने' हैं। वो भी नहीं चाहते कि उन्हें किसी विवाद में फंसाया जाए। जब प्रदेश की मुख्यमंत्री विधायकों को अपने अपने क्षेत्र के चिकित्सकों से बात करने का जिम्मा सौंप रही है तो अपने ही पास पड़े इस 'तुरुप के पत्ते' को आगे क्यों नहीं बढ़ाया जा रहा। हकीकत तो यह है कि अत्यंत मृदुभाषी डॉ. साब अगर कोशिश करेंगे तो यह हड़ताल दो दिन से ज्यादा नहीं चलने वाली। आखिर एक ही जमात के लोग हैं, एक ही विचारधारा के साथी है।

कुछ कहती है भाटी की यह भूमिका

आमतौर पर बीकानेर शहर की राजनीति से दूर रहने वाले कद्दावर नेता देवी सिंह भाटी की शहर में बढ़ी सक्रियता कुछ कहती है। देवी सिंह भाटी ने पिछले दिनों नगर निगम महापौर, पार्षदों और अधिकारियों के साथ जिस तेवर के साथ बातचीत की, वो हर किसी को प्रभावित कर रही है। शहरी क्षेत्र की राजनीतिक शून्यता के बीच भाटी की बढ़ती सक्रियता ने विधानसभा चुनाव में उनकी भूमिका को लेकर चिंतन शुरू हो जाना चाहिए। माना जा रहा है कि इस बार भाटी 'किंग मेकर' की भूमिका में नजर आएंगे। इसी कारण वो श्रीकोलायत के साथ बीकानेर पूर्व और पश्चिम दोनों सीटों पर गंभीरता से और पूरी तरह सोच विचार कर काम कर रहे हैं। सोनगिरी पटाखा कांड के बाद मकान बनवाकर देने की उनकी सोच मानवीय तो है ही, सकारात्मक राजनीति को बढ़ावा भी दे रही है। इतना ही नहीं बीकानेर पश्चिम क्षेत्र में उनके इक्का दुक्का नहीं सैकड़ों कट्टर कार्यकर्ता तैयार हो रहे हैं। अगर प्रतिद्वंद्वि पार्टी इसे हलके में ले रही है तो यह उनकी राजनीतिक समझ की कमजोरी है। उनकी सक्रियता कुछ कहती है, समझो।

सोशल मीडिया की नेतागिरी

यह नेतागिरी है, गांधीगिरी है, सोशल मीडियागिरी है या फिर कुछ करने की ललक है। कुछ भी हो, इन दिनों शहर के युवा सोशल मीडिया पर जमकर नेता गिरी कर रहे हैं। जो कर रहे हैं, उनमें दो-तीन तरह के सोशलमीडिया नेता है। एक वो नेता है, जो करते कुछ नहीं है, बस भाषण देते हैं। यह होना चाहिए, वो नहीं होना चाहिए, ऐसा क्यों किया गया, यह राष्ट्रद्रोह है, यह राष्ट्रभक्ति है, ऐसा नहीं करना चाहिए। कुछ ऐसे हैं जो गलत को गलत बताते हैं और उसे साबित करने का प्रयास भी करते हैं। ऐसे ही नेताओं ने पिछले दिनों सोशल मीडिया के माध्यम से जनजागृति का प्रयास भी किया। समय समय पर इनकी टिप्पणी कुछ बेहतर भविष्य की परिकल्पना करने को प्रोत्साहित करती है।

जनसम्पर्क अभियान शुरू

अभी न तो विधानसभा चुनाव की घोषणा हुई है, न किसी पार्टी ने अपनी रणनीति तय की है, उम्मीदवार बनाने का काम तो शायद आठ दस महीने में शुरू होगा। इसके बाद भी बीकानेर पूर्व विधानसभा क्षेत्र से शायद एक बार फिर गोपाल गहलोत दावेदारी ठोकने वाले हैं। 'ठोकने' वाला शब्द इसलिए काम में लिया गया है कि पार्टी टिकट दें न दे। वो तो हर हाल में चुनाव लड़ेंगे। कुछ भाजपाई रंग में और कुछ कांग्रेसी रंग में रंगे गहलोत ने गौ रक्षा का ऐसा एजेंडा हाथ में लिया है, जैसा गुजरात चुनाव में उनकी पार्टी ने लिया था। 'सॉफ्ट हिन्दुत्व' के साथ चुनाव लड़ेंगे, इतना तय है। इसीलिए आजकल गली-गली पहुंचकर लोगों से संपर्क कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर अपनी यात्रा को जमकर प्रचारित कर रहे हैं। ये तो लड़ेगा भाई....।

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टिकट की दौड़ में कहां दौड़ें

विधानसभा चुनाव की घंटी बजने वाली है। गुजरात में जैसे चुनावी नतीजे आएंगे, वैसे ही राजस्थान में चुनावी तैयारियां परवान पर पहुंच जाएगी। इससे पहले वो लोग अपना होमवर्क कर रहे हैं, जो टिकट के दावेदार है। सबसे ज्यादा तैयारी भारतीय जनता पार्टी में हो रही है, जहां दावेदारों की संख्या दिन दुनी और रात चौगुनी बढ़ रही है। न सिर्फ शहर में बल्कि ग्रामीण अंचल की विधानसभा सीटों पर भी जोरदार लॉबिंग का खेल शुरू हो गया है। वर्तमान विधायकों को अपने कामों से फुर्सत नहीं है और नए विधायक बनने के दावेदारों ने उनकी जमीन हिलानी शुरू कर दी है।बात लूणकरनसर की हो या फिर नोखा की। हर कहीं नए दावेदार सामने आ रहे हैं। लूणकरनसर में एक दावेदार ने तो गांव गांव चक्कर लगाने शुरू कर दिए हैं। जातिगत राजनीति के आंकड़े दिमाग में सेट करके वो निकल पड़े है सफर पर। हर हाल में इस बार टिकट लाना है। इन नेताजी का तय रूप से मानना है कि अगर मानिकचंद सुराना को टिकट नहीं मिला तो सबसे बड़े दावेदार भाजपा से ये ही है। लूणकरनसर में प्रवेश करने के साथ ही सबसे पहले इनका ही चित्र वहां नजर आता है। लोकतंत्र की यही सुंदरता है कि यहां हर कोई अपनी दावेदारी जता सकता है। सुनने में तो यह भी आ रहा है कि बीकानेर के एक वरिष्ठ नेता बड़े ओहदे वाले नोखा से चुनाव लड़ सकते हैं। अब तक तो उनकी बीकानेर पूर्व और पश्चिम से ही चुनाव लडऩे की अटकले आ रही थी लेकिन पाटे पर अब इनके नोखा से चुनाव लडऩे की खबर ने कुछ को परेशान कर दिया और शहर वालों को कुछ राहत दे दी। समझ नहीं आ रहा इस एक नेता को भारतीय जनता पार्टी कहां कहां पर दावेदार बनाएगी। इस नगर का विकास फिर कौन करेगा?
कांग्रेस का हिन्दूवादी प्रेम
कांग्रेस आजकल हिन्दूवाद में शायद भाजपा से भी आगे निकलने की कोशिश में है। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी मंदिर मंदिर मत्था टेक रहे हैं तो स्थानीय स्तर तक इसका असर दिख रहा है। एक कांग्रेस नेता गौ सेवा में व्यस्त है। सुबह उठने के साथ ही गायों की सेवा में लग जाते हैं। बताया जाता है कि गाय की सेवा से फल मिल जाता है। इनका तो बस एक ही लक्ष्य है कि एक बार जैसे-तैसे विधायक बनना है। गौ सेवा ऐसा मुद्दा है, जिस पर हिन्दू भी साथ है और पार्टी से नए मतदाता भी जुड़ रहे हैं। वैसे बता दें कि कुछ और कांग्रेसी नेता इन दिनों हिन्दू और सनातन विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं। अच्छी बात है।
नमो विजय मंच
राजनीति के लिए मंच की जरूरत होती है, इसलिए हर कोई इसी जुगत में लगा है कि उसे टिकट मिल जाए। अब टिकट लेने के लिए अपना दमखम भी दिखाना पड़ता है। बाकी दावेदारों ने अपना काम किया, एक नेताजी ने अपना काम शुरू कर दिया है। बकायदा एक मंच गठित किया गया है, कार्यालय खोला गया है। नाम भी ऐसा दिया गया है जो कई अर्थ लिए हुए हैं। नमो विजय मंच। नमो यानी नरेंद्र मोदी और विजय यानी जीत। नरेंद्र मोदी को जीत मिले इसके लिए इस मंच का गठन किया है। या फिर यूं कहें कि भाजपा के एक 'विजयÓ को विजय दिलाने के लिए जतन अभी से शुरू हो गए हैं। अच्छी बात है। राजनीति में भी आजकल ऐसा ही है, जो दिखता है वो चलता है।
छवि सुधारने में लगे हैं
बात लूणकरनसर की चल पड़ी है तो बड़े वाले नेताजी की भी बात कर लेते हैं। सुनने में आया है कि वो आज कल काफी 'लिबरलÓ हो गए हैं। लोगों के बीच बैठते हैं, बात करते हैं, उनकी समस्याओं पर चर्चा करते हैं। विधानसभा चुनाव में इस बार भी अपनी पार्टी से वो इकलौते दावेदार है। पिछले चुनाव में अपने ओहदे और जिम्मेदारियों के कारण ठेठ ग्रामीण परिवेश वाले 'अपनोंÓ को नाराज कर बैठे थे। इस बार इस छवि को बदलने में लगे हैं कि वो कुछ अलग अंदाज में रहते हैं। ग्रामीण क्षेत्र में जो भी रूस गए हैं, अरे... वो विदेश वाला रूस नहीं...। रूस गए यानी जो नाराज हो गए हैं, उन्हें वापस राजी करने में लगे हैं। छोटी छोटी बातों की नाराजगी दूर हो जाती है तो बड़ी बड़ी सफलताएं मिल ही जाती है।

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मानो ना मानो, दावेदार तो हो

कई बार सार्वजनिक कार्यक्रमों में सक्रियता पचास तरह की चर्चाओं को जन्म दे देती है। ऐसे में आप मानो या ना मानो, लोग के जुबां पर बात आ ही जाती है। पिछले दिनों संसदीय सचिव डॉ. विश्वनाथ मेघवाल की पत्नी गृह विज्ञान महाविद्यालय की वरिष्ठ व्याख्याता डॉ. विमला डुकवाल के साथ भी ऐसा ही हुआ। कुछ समय से उनकी सक्रियता को लेकर तरह तरह के कयास लगाए जा रहे थे लेकिन सार्वजनिक तौर पर किसी ने कोई बात नहीं बोली। यहां तक कि स्वयं उनके निर्देशन में आयोजित एक बड़े कार्यक्रम में भी किसी ने मंच से इस तरह की बात नहीं की लेकिन मोहता भवन में आयोजित एक कार्यक्रम में वक्ता ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि आप राजनीति में भी आ रही है तो हम आपका पूरा सहयोग करेंगे। अब उनके पास प्रतिक्रिया देने के लिए शब्द नहीं। पास में बैठे लोगों से जरूर कहा कि उनका ऐसा कोई मानस नहीं है। बात यहीं तक खत्म हो जाती तो कोई बात नहीं। कार्यक्रम के बाद वो बाहर निकले तो एक महिला ने भी उन्हें बड़े पद पर जाने का आशीर्वाद दे डाला। अब यह सब कुछ पत्रकारों के सामने होगा तो चर्चा ए आम तो होगी ही। वैसे आपको याद होगा कि पिछले लोकसभा चुनाव में भी डॉ. विमला का नाम चर्चा में आया था और एक बार फिर इसी नाम पर चर्चा हो रही है। हालांकि स्वयं डॉ. विमला कई बार स्पष्ट कर चुकी है कि वो चुनाव लडऩे के लिए सक्रिय नहीं है। जैसे हालात नजर आ रहे हैं, उससे लगता है कि इस बार भी भाजपा के एक दल विशेष की ओर से उनका नाम आगे किया जाएगा। अगर ऐसा हो जाता है तो कोई गलत भी नहीं। पढ़ी लिखी सांसद आखिर किसको नहीं चाहिए? हां, वैसे वर्तमान वाले सांसद भी कहां कम है, वो तो आईएएस अधिकारी थे।

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हर बॉल को हुक कर गए सीपी

एयरपोर्ट बनने से बीकानेर वालों को जयपुर और दिल्ली जाने का लाभ तो हुआ ही है यहां के पत्रकारों को भी खूब फायदा हुआ है। एयरपोर्ट बना है तो नेता अब यहीं से होकर आसपास के शहरों में जाते हैं। हमारे पत्रकार भाई भी पहुंच जाते हैं अपना माइक लेकर। आदत से मजबूर है सवाल ऐसा करेंगे कि सामने वाले के तीर सा चुभे। अब सी पी जोशी आये तो उनसे हजार सवाल किए जा सकते थे लेकिन पूछे वो ही सवाल जिसका दर्द साफ नजर आ जाये। पहला सवाल था कि गुजरात मे क्या होगा? अब अच्छा बताए तो संकट बुरा बताए तो संकट। सो बोल दिया अशोक जी से पूछो। अरे भाई आप ही अच्छा बता देते तो कौनसा अशोक जी सर्वसम्मति से विधायक दल के नेता घोषित हो रहे थे।
दूसरा सवाल किया तो वो भी बाउंसर था। जोशी क्रिकेट के प्रशसनिक खिलाड़ी है तो इस बॉल को भी हुक कर दिया। सवाल था राजस्थान में अगले चुनाव में चेहरा कौन होगा। जवाब था कांग्रेस तय करेगी। हम तो सोच रहे थे आप ही कांग्रेस है लेकिन यहां भी कुछ उत्साहजनक जवाब नहीं दिया। खैर हम खबरनवीस तो इसे भी खबर बना लेते हैं। रवि की हर बॉल पर सीपी ने बचाव किया लेकिन खबर तो फिर भी बनी।
2 स्वागत में कमी नहीं
कहते हैं दिल मिले ना मिले हाथ मिलने चाहिए। पिछले दिनों कांग्रेस नेताओं ने ऐसा ही जज़्बा दिखाया। एयरपोर्ट पर जोशी का स्वागत करने वालों में अधिकांश वो थे जो हाथ मिलाने गए थे ताकि आगे रोड़ा ना डालें। अच्छी पहल है।
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भाजपा इन दिनों सदस्यता अभियान में व्यस्त है। खूब कार्यक्रम करवा रहे हैं। हर कार्यक्रम में पहुंच रहे हैं । ये भी नही देख रहे कि अपने वोटर है या नहीं। पिछले दिनों एक कार्यक्रम में अध्यक्ष जी काफी सक्रिय नज़र आये। तालाब में खूब पानी बजी डलवाया। पूजा भी करवाई। बाद में किसी ने बताया कि उनमें से कोई भी अपना वोटर नहीं है। अधिकांश का तो वोटर लिस्ट में ही नाम नहीं है। खैर कभी कभार भगवान ही अच्छा काम करवा लेते हैं । जाने अनजाने ही सही।
यहां पार्टी मायने नहीं रखती
विचार बड़ा हो तो मानसिकता बदल लेनी चाहिए। अच्छे काम के लिए समझौता कर लेना चाहिए। सिद्धान्त भी किनारे रख देने चाहिए। अभी कांग्रेस और भाजपा के नेता दो मामलों में ये सदाशयता दिखा रहे हैं। अब आपको उन मुद्दों से क्या मतलब कि कहां दोनों ने समझौता किया। आप नहीं मानों तो बता देते हैं। दीमापुर औऱ दे माताजी वाला मामले में दोनों एक थे।

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