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नेता गिरी (अनुराग हर्ष) (23)

खाजूवाला में होगा राजनीतिक दंगल

विधानसभा चुनाव में असली दंगल तो पांच और छह महीने बाद देखने को मिलेगा लेकिन खेल के पासे फैंकने का काम अभी शुरू हो गया है। बीकानेर की सात विधानसभा सीटों में से इस बार जिस सीट पर चुनाव से पहले दंगल होने वाला है वो हैं खाजूवाला की सीट। इस बार सीट पर दलित नेताओं की बाढ़ आने वाली है। जितने भी दावेदार है, सभी दमदार है, मजबूत है। यहां से भाजपा के विधायक डॉ. विश्वनाथ है लेकिन इस बार उन्हें अपनी पार्टी के सांसद पुत्र से चुनाव से पहले दो-दो हाथ करने पड़ेंगे। दरअसल, यहां से सांसद अर्जुन राम मेघवाल के पुत्र रवि मेघवाल भी दावेदार है। दरअसल, रवि स्वयं खाजूवाला में काफी सक्रिय है और पिछले दिनों हॉर्डिंग्स लगाकर उन्होंने साफ कर दिया कि पिता की विरासत लेने के लिए पूरी तरह से तैयार है। वैसे डॉ. विश्वनाथ का काम भी कच्चा नहीं है। वो भी पूरी मजबूती के साथ इन दिनों अपने विधानसभा क्षेत्र में लगे हुए हैं। अगर रवि मेघवाल विधानसभा में टिकट के दावेदार है तो चर्चा है कि डॉ. विश्वनाथ की पत्नी डॉ. विमला भी सांसद की उम्मीदवार है। अगर किसी भी स्थिति में प्रधानमंत्री मोदी अपने सांसदों को रिपोट्र्स के आधार पर बदलते हैं तो विमला डुकवाल का नाम सबसे आगे चल रहा है। चुनाव से पहले की यह मशक्कत सिर्फ भाजपा में ही नहीं है बल्कि कांग्रेस में भी मची हुई है। यहां गोविन्द मेघवाल ने पिछला चुनाव लड़ा था। इस बार उनका टिकट कटवाने वालों की कमी नहीं है। राजनीतिक रूप से गोविन्द के प्रतिद्वंद्वी रहे नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश की राजनीति में इन दिनों काफी आगे चल रहे रामेश्वर डूडी के खास और देहात कांग्रेस अध्यक्ष महेंद्र गहलोत ने गोविन्द की अनुपस्थिति में ही आन्दोलन कर नए समीकरण पैदा कर दिए।

विधानसभा चुनाव से पहले इस मुद्दे पर कई बार बात हो गई लेकिन लगातार खाजूवाला में ही टिकट के लिए दौड़भाग हो रही है। इस आरक्षित सीट पर कांग्रेस बहुत कम अंतर से पिछला विधानसभा चुनाव हार गई थी। इस बार भी वहां कांग्रेस एक जुट नजर नहीं आ रही है। एकता के मामले में भाजपा की हालत यहां और भी ज्यादा बदतर है। भाजपा के कई धड़े वहां आमने सामने चुनाव से पहले हो गए हैं।


उपचुनाव में बीकानेर का सीधा जुड़ाव

प्रदेश में दो लोकसभा सीटों और एक विधानसभा सीट पर बीकानेर की प्रतिष्ठा भी दाव पर लगी हुई है। कैसे? वो ऐसे कि अलवर में कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में डॉ. करण सिंह यादव मैदान में है। वो बीकानेर के उदयरामसर के निवासी है और बीकानेर के काफी करीब है। इसके अलावा अजमेर में भाजपा ने जिन इक्का दुक्का लोगों को जीत की जिम्मेदारी सौंपी है, उनमें बीकानेर के पूर्व शहर भाजपा अध्यक्ष विजय आचार्य भी है। दोनों ही जगह अलग-अलग पार्टी से बीकानेरी कार्यकर्ता जुड़े हुए हैं। वैसे तीसरे विधानसभा क्षेत्र मांडलगढ़ से हमारे ही शहर के गोकुल प्रसाद पुरोहित पहले विधायक रह चुके हैं।

गुजरात का हिसाब तो दो...

गुजरात में विधानसभा चुनाव खत्म हो गए। सरकार भी बन गई। इसके बाद उपमुख्यमंत्री नाराज भी हो गए, उन्हें मनचाहे विभाग भी मिल गए। कहने का मतलब है कि गुजरात विधानसभा चुनाव की बात अब पुरानी होने वाली है लेकिन हमारे यहां से गए नेताओं ने अब तक अपना हिसाब नहीं दिया है। कांग्रेस और भाजपा दोनों के ही नेता काफी जोश खरोश के साथ गुजरात में जुटे थे। कोई राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में तो कोई जातीय आधार पर अपनी पार्टी को टिकट दिलाने के लिए। वहां से खूब फोटो भी फेसबुक पर डाले लेकिन परिणाम आने के बाद किसी ने नहीं बताया कि उनके प्रचार वाले क्षेत्र में पार्टी को जीत मिली या फिर हार। हां...यह भी संभव है कि कुछ बताने लायक होगा ही नहीं तो क्या बताएं?


युवा नेता निष्क्रिय क्यों?


पिछले कुछ दिनों से देखने में आ रहा है कि शहर के कई युवा नेता अचानक से निष्क्रिय हो गए हैं। आखिर क्यों? राजनीति में रहना है तो कुछ न कुछ करना होगा। शहर भाजपा में भी कई नए और युवा चेहरों को अवसर दिया गया है लेकिन उनकी सक्रियता फिलहाल नजर नहीं आई है। वेद व्यास भी ऐसे ही नेताओं में है,जिनकी लंबी चौड़ी टीम निष्क्रिय सी नजर आ रही है। इसी तरह लूणकरनसर में टिकट के दावेदार माने जा रहे डॉ. भागीरथ मूंड भी इन दिनों कम नजर आ रहे हैं। इनकी कम सक्रियता से न सिर्फ राजनीतिक मैदान सूना नजर आ रहा है बल्कि समीकरण भी बदलते नजर आ रहे हैं। राजनीति में ऐसे युवाओं की जरूरत है और उन्हें अपने दम पर अपना रास्ता बनाएं। किसी नेता की बैसाखी पकड़कर आगे नहीं आना है, उन्हें।

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डॉ. विश्वनाथ मौन क्यों है..?

अनुराग हर्ष। एक बार फिर प्रदेश के सभी चिकित्सक हड़ताल पर है। हड़ताल भी ऐसी है कि चिकित्सक और सरकार जैसे आपस में युद्ध लड़ रहे हैं। ऐसे में बीकानेर के एक डॉक्टर साब की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है लेकिन वो खुद ही ज्यादा रुचि नहीं ले रहे या सरकार उनका उपयोग नहीं कर रही। खाजूवाला विधानसभा क्षेत्र से विधायक और संसदीय सचिव डॉ. विश्वनाथ मेघवाल सरकार के प्रतिनिधि है। पिछले दिनों हड़ताल से हालात ज्यादा बिगड़े तो डॉक्टरों से मेल मुलाकात कर मामले को निपटाने के बजाय स्वयं ही अस्पताल में जाकर मरीजो को देखने लगे। मरीजों को देखने के बाद दवा खुद नहीं लिख रहे थे बल्कि किसी साथ खड़े व्यक्ति से लिखवा रहे थे। मजे की बात है कि डॉक्टर साब स्वयं आंदोलनरत सेवारत चिकित्सक संघ के बीकानेर अध्यक्ष रहे हैं। तब भी आंदोलन में खूब आगे रहे। सरकार पर आरोपों झड़ी लगाने में पीछे नहीं रहे। अब जब स्वयं सरकार में है तो कुछ भी बोलने के लिए तैयार नहीं? न तो हड़ताल खत्म करने में रुचि है और न अपने साथियों की बात को सरकार तक पहुंचवाने में। सही भी है 'बळती' में हाथ डालने के बजाय दूर खड़े रहकर ही हाथ सैक लें तो बेहतर है। यहां यह भी कहना चाहूंगा कि डॉक्टर सॉब के डॉक्टर मित्र भी बड़े 'सयाने' हैं। वो भी नहीं चाहते कि उन्हें किसी विवाद में फंसाया जाए। जब प्रदेश की मुख्यमंत्री विधायकों को अपने अपने क्षेत्र के चिकित्सकों से बात करने का जिम्मा सौंप रही है तो अपने ही पास पड़े इस 'तुरुप के पत्ते' को आगे क्यों नहीं बढ़ाया जा रहा। हकीकत तो यह है कि अत्यंत मृदुभाषी डॉ. साब अगर कोशिश करेंगे तो यह हड़ताल दो दिन से ज्यादा नहीं चलने वाली। आखिर एक ही जमात के लोग हैं, एक ही विचारधारा के साथी है।

कुछ कहती है भाटी की यह भूमिका

आमतौर पर बीकानेर शहर की राजनीति से दूर रहने वाले कद्दावर नेता देवी सिंह भाटी की शहर में बढ़ी सक्रियता कुछ कहती है। देवी सिंह भाटी ने पिछले दिनों नगर निगम महापौर, पार्षदों और अधिकारियों के साथ जिस तेवर के साथ बातचीत की, वो हर किसी को प्रभावित कर रही है। शहरी क्षेत्र की राजनीतिक शून्यता के बीच भाटी की बढ़ती सक्रियता ने विधानसभा चुनाव में उनकी भूमिका को लेकर चिंतन शुरू हो जाना चाहिए। माना जा रहा है कि इस बार भाटी 'किंग मेकर' की भूमिका में नजर आएंगे। इसी कारण वो श्रीकोलायत के साथ बीकानेर पूर्व और पश्चिम दोनों सीटों पर गंभीरता से और पूरी तरह सोच विचार कर काम कर रहे हैं। सोनगिरी पटाखा कांड के बाद मकान बनवाकर देने की उनकी सोच मानवीय तो है ही, सकारात्मक राजनीति को बढ़ावा भी दे रही है। इतना ही नहीं बीकानेर पश्चिम क्षेत्र में उनके इक्का दुक्का नहीं सैकड़ों कट्टर कार्यकर्ता तैयार हो रहे हैं। अगर प्रतिद्वंद्वि पार्टी इसे हलके में ले रही है तो यह उनकी राजनीतिक समझ की कमजोरी है। उनकी सक्रियता कुछ कहती है, समझो।

सोशल मीडिया की नेतागिरी

यह नेतागिरी है, गांधीगिरी है, सोशल मीडियागिरी है या फिर कुछ करने की ललक है। कुछ भी हो, इन दिनों शहर के युवा सोशल मीडिया पर जमकर नेता गिरी कर रहे हैं। जो कर रहे हैं, उनमें दो-तीन तरह के सोशलमीडिया नेता है। एक वो नेता है, जो करते कुछ नहीं है, बस भाषण देते हैं। यह होना चाहिए, वो नहीं होना चाहिए, ऐसा क्यों किया गया, यह राष्ट्रद्रोह है, यह राष्ट्रभक्ति है, ऐसा नहीं करना चाहिए। कुछ ऐसे हैं जो गलत को गलत बताते हैं और उसे साबित करने का प्रयास भी करते हैं। ऐसे ही नेताओं ने पिछले दिनों सोशल मीडिया के माध्यम से जनजागृति का प्रयास भी किया। समय समय पर इनकी टिप्पणी कुछ बेहतर भविष्य की परिकल्पना करने को प्रोत्साहित करती है।

जनसम्पर्क अभियान शुरू

अभी न तो विधानसभा चुनाव की घोषणा हुई है, न किसी पार्टी ने अपनी रणनीति तय की है, उम्मीदवार बनाने का काम तो शायद आठ दस महीने में शुरू होगा। इसके बाद भी बीकानेर पूर्व विधानसभा क्षेत्र से शायद एक बार फिर गोपाल गहलोत दावेदारी ठोकने वाले हैं। 'ठोकने' वाला शब्द इसलिए काम में लिया गया है कि पार्टी टिकट दें न दे। वो तो हर हाल में चुनाव लड़ेंगे। कुछ भाजपाई रंग में और कुछ कांग्रेसी रंग में रंगे गहलोत ने गौ रक्षा का ऐसा एजेंडा हाथ में लिया है, जैसा गुजरात चुनाव में उनकी पार्टी ने लिया था। 'सॉफ्ट हिन्दुत्व' के साथ चुनाव लड़ेंगे, इतना तय है। इसीलिए आजकल गली-गली पहुंचकर लोगों से संपर्क कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर अपनी यात्रा को जमकर प्रचारित कर रहे हैं। ये तो लड़ेगा भाई....।

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टिकट की दौड़ में कहां दौड़ें

विधानसभा चुनाव की घंटी बजने वाली है। गुजरात में जैसे चुनावी नतीजे आएंगे, वैसे ही राजस्थान में चुनावी तैयारियां परवान पर पहुंच जाएगी। इससे पहले वो लोग अपना होमवर्क कर रहे हैं, जो टिकट के दावेदार है। सबसे ज्यादा तैयारी भारतीय जनता पार्टी में हो रही है, जहां दावेदारों की संख्या दिन दुनी और रात चौगुनी बढ़ रही है। न सिर्फ शहर में बल्कि ग्रामीण अंचल की विधानसभा सीटों पर भी जोरदार लॉबिंग का खेल शुरू हो गया है। वर्तमान विधायकों को अपने कामों से फुर्सत नहीं है और नए विधायक बनने के दावेदारों ने उनकी जमीन हिलानी शुरू कर दी है।बात लूणकरनसर की हो या फिर नोखा की। हर कहीं नए दावेदार सामने आ रहे हैं। लूणकरनसर में एक दावेदार ने तो गांव गांव चक्कर लगाने शुरू कर दिए हैं। जातिगत राजनीति के आंकड़े दिमाग में सेट करके वो निकल पड़े है सफर पर। हर हाल में इस बार टिकट लाना है। इन नेताजी का तय रूप से मानना है कि अगर मानिकचंद सुराना को टिकट नहीं मिला तो सबसे बड़े दावेदार भाजपा से ये ही है। लूणकरनसर में प्रवेश करने के साथ ही सबसे पहले इनका ही चित्र वहां नजर आता है। लोकतंत्र की यही सुंदरता है कि यहां हर कोई अपनी दावेदारी जता सकता है। सुनने में तो यह भी आ रहा है कि बीकानेर के एक वरिष्ठ नेता बड़े ओहदे वाले नोखा से चुनाव लड़ सकते हैं। अब तक तो उनकी बीकानेर पूर्व और पश्चिम से ही चुनाव लडऩे की अटकले आ रही थी लेकिन पाटे पर अब इनके नोखा से चुनाव लडऩे की खबर ने कुछ को परेशान कर दिया और शहर वालों को कुछ राहत दे दी। समझ नहीं आ रहा इस एक नेता को भारतीय जनता पार्टी कहां कहां पर दावेदार बनाएगी। इस नगर का विकास फिर कौन करेगा?
कांग्रेस का हिन्दूवादी प्रेम
कांग्रेस आजकल हिन्दूवाद में शायद भाजपा से भी आगे निकलने की कोशिश में है। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी मंदिर मंदिर मत्था टेक रहे हैं तो स्थानीय स्तर तक इसका असर दिख रहा है। एक कांग्रेस नेता गौ सेवा में व्यस्त है। सुबह उठने के साथ ही गायों की सेवा में लग जाते हैं। बताया जाता है कि गाय की सेवा से फल मिल जाता है। इनका तो बस एक ही लक्ष्य है कि एक बार जैसे-तैसे विधायक बनना है। गौ सेवा ऐसा मुद्दा है, जिस पर हिन्दू भी साथ है और पार्टी से नए मतदाता भी जुड़ रहे हैं। वैसे बता दें कि कुछ और कांग्रेसी नेता इन दिनों हिन्दू और सनातन विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं। अच्छी बात है।
नमो विजय मंच
राजनीति के लिए मंच की जरूरत होती है, इसलिए हर कोई इसी जुगत में लगा है कि उसे टिकट मिल जाए। अब टिकट लेने के लिए अपना दमखम भी दिखाना पड़ता है। बाकी दावेदारों ने अपना काम किया, एक नेताजी ने अपना काम शुरू कर दिया है। बकायदा एक मंच गठित किया गया है, कार्यालय खोला गया है। नाम भी ऐसा दिया गया है जो कई अर्थ लिए हुए हैं। नमो विजय मंच। नमो यानी नरेंद्र मोदी और विजय यानी जीत। नरेंद्र मोदी को जीत मिले इसके लिए इस मंच का गठन किया है। या फिर यूं कहें कि भाजपा के एक 'विजयÓ को विजय दिलाने के लिए जतन अभी से शुरू हो गए हैं। अच्छी बात है। राजनीति में भी आजकल ऐसा ही है, जो दिखता है वो चलता है।
छवि सुधारने में लगे हैं
बात लूणकरनसर की चल पड़ी है तो बड़े वाले नेताजी की भी बात कर लेते हैं। सुनने में आया है कि वो आज कल काफी 'लिबरलÓ हो गए हैं। लोगों के बीच बैठते हैं, बात करते हैं, उनकी समस्याओं पर चर्चा करते हैं। विधानसभा चुनाव में इस बार भी अपनी पार्टी से वो इकलौते दावेदार है। पिछले चुनाव में अपने ओहदे और जिम्मेदारियों के कारण ठेठ ग्रामीण परिवेश वाले 'अपनोंÓ को नाराज कर बैठे थे। इस बार इस छवि को बदलने में लगे हैं कि वो कुछ अलग अंदाज में रहते हैं। ग्रामीण क्षेत्र में जो भी रूस गए हैं, अरे... वो विदेश वाला रूस नहीं...। रूस गए यानी जो नाराज हो गए हैं, उन्हें वापस राजी करने में लगे हैं। छोटी छोटी बातों की नाराजगी दूर हो जाती है तो बड़ी बड़ी सफलताएं मिल ही जाती है।

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मानो ना मानो, दावेदार तो हो

कई बार सार्वजनिक कार्यक्रमों में सक्रियता पचास तरह की चर्चाओं को जन्म दे देती है। ऐसे में आप मानो या ना मानो, लोग के जुबां पर बात आ ही जाती है। पिछले दिनों संसदीय सचिव डॉ. विश्वनाथ मेघवाल की पत्नी गृह विज्ञान महाविद्यालय की वरिष्ठ व्याख्याता डॉ. विमला डुकवाल के साथ भी ऐसा ही हुआ। कुछ समय से उनकी सक्रियता को लेकर तरह तरह के कयास लगाए जा रहे थे लेकिन सार्वजनिक तौर पर किसी ने कोई बात नहीं बोली। यहां तक कि स्वयं उनके निर्देशन में आयोजित एक बड़े कार्यक्रम में भी किसी ने मंच से इस तरह की बात नहीं की लेकिन मोहता भवन में आयोजित एक कार्यक्रम में वक्ता ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि आप राजनीति में भी आ रही है तो हम आपका पूरा सहयोग करेंगे। अब उनके पास प्रतिक्रिया देने के लिए शब्द नहीं। पास में बैठे लोगों से जरूर कहा कि उनका ऐसा कोई मानस नहीं है। बात यहीं तक खत्म हो जाती तो कोई बात नहीं। कार्यक्रम के बाद वो बाहर निकले तो एक महिला ने भी उन्हें बड़े पद पर जाने का आशीर्वाद दे डाला। अब यह सब कुछ पत्रकारों के सामने होगा तो चर्चा ए आम तो होगी ही। वैसे आपको याद होगा कि पिछले लोकसभा चुनाव में भी डॉ. विमला का नाम चर्चा में आया था और एक बार फिर इसी नाम पर चर्चा हो रही है। हालांकि स्वयं डॉ. विमला कई बार स्पष्ट कर चुकी है कि वो चुनाव लडऩे के लिए सक्रिय नहीं है। जैसे हालात नजर आ रहे हैं, उससे लगता है कि इस बार भी भाजपा के एक दल विशेष की ओर से उनका नाम आगे किया जाएगा। अगर ऐसा हो जाता है तो कोई गलत भी नहीं। पढ़ी लिखी सांसद आखिर किसको नहीं चाहिए? हां, वैसे वर्तमान वाले सांसद भी कहां कम है, वो तो आईएएस अधिकारी थे।

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हर बॉल को हुक कर गए सीपी

एयरपोर्ट बनने से बीकानेर वालों को जयपुर और दिल्ली जाने का लाभ तो हुआ ही है यहां के पत्रकारों को भी खूब फायदा हुआ है। एयरपोर्ट बना है तो नेता अब यहीं से होकर आसपास के शहरों में जाते हैं। हमारे पत्रकार भाई भी पहुंच जाते हैं अपना माइक लेकर। आदत से मजबूर है सवाल ऐसा करेंगे कि सामने वाले के तीर सा चुभे। अब सी पी जोशी आये तो उनसे हजार सवाल किए जा सकते थे लेकिन पूछे वो ही सवाल जिसका दर्द साफ नजर आ जाये। पहला सवाल था कि गुजरात मे क्या होगा? अब अच्छा बताए तो संकट बुरा बताए तो संकट। सो बोल दिया अशोक जी से पूछो। अरे भाई आप ही अच्छा बता देते तो कौनसा अशोक जी सर्वसम्मति से विधायक दल के नेता घोषित हो रहे थे।
दूसरा सवाल किया तो वो भी बाउंसर था। जोशी क्रिकेट के प्रशसनिक खिलाड़ी है तो इस बॉल को भी हुक कर दिया। सवाल था राजस्थान में अगले चुनाव में चेहरा कौन होगा। जवाब था कांग्रेस तय करेगी। हम तो सोच रहे थे आप ही कांग्रेस है लेकिन यहां भी कुछ उत्साहजनक जवाब नहीं दिया। खैर हम खबरनवीस तो इसे भी खबर बना लेते हैं। रवि की हर बॉल पर सीपी ने बचाव किया लेकिन खबर तो फिर भी बनी।
2 स्वागत में कमी नहीं
कहते हैं दिल मिले ना मिले हाथ मिलने चाहिए। पिछले दिनों कांग्रेस नेताओं ने ऐसा ही जज़्बा दिखाया। एयरपोर्ट पर जोशी का स्वागत करने वालों में अधिकांश वो थे जो हाथ मिलाने गए थे ताकि आगे रोड़ा ना डालें। अच्छी पहल है।
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भाजपा इन दिनों सदस्यता अभियान में व्यस्त है। खूब कार्यक्रम करवा रहे हैं। हर कार्यक्रम में पहुंच रहे हैं । ये भी नही देख रहे कि अपने वोटर है या नहीं। पिछले दिनों एक कार्यक्रम में अध्यक्ष जी काफी सक्रिय नज़र आये। तालाब में खूब पानी बजी डलवाया। पूजा भी करवाई। बाद में किसी ने बताया कि उनमें से कोई भी अपना वोटर नहीं है। अधिकांश का तो वोटर लिस्ट में ही नाम नहीं है। खैर कभी कभार भगवान ही अच्छा काम करवा लेते हैं । जाने अनजाने ही सही।
यहां पार्टी मायने नहीं रखती
विचार बड़ा हो तो मानसिकता बदल लेनी चाहिए। अच्छे काम के लिए समझौता कर लेना चाहिए। सिद्धान्त भी किनारे रख देने चाहिए। अभी कांग्रेस और भाजपा के नेता दो मामलों में ये सदाशयता दिखा रहे हैं। अब आपको उन मुद्दों से क्या मतलब कि कहां दोनों ने समझौता किया। आप नहीं मानों तो बता देते हैं। दीमापुर औऱ दे माताजी वाला मामले में दोनों एक थे।

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हर बॉल को हुक कर गए सीपी

एयरपोर्ट बनने से बीकानेर वालों को जयपुर और दिल्ली जाने का लाभ तो हुआ ही है यहां के पत्रकारों को भी खूब फायदा हुआ है। एयरपोर्ट बना है तो नेता अब यहीं से होकर आसपास के शहरों में जाते हैं। हमारे पत्रकार भाई भी पहुंच जाते हैं अपना माइक लेकर। आदत से मजबूर है सवाल ऐसा करेंगे कि सामने वाले के तीर सा चुभे। अब सी पी जोशी आये तो उनसे हजार सवाल किए जा सकते थे लेकिन पूछे वो ही सवाल जिसका दर्द साफ नजर आ जाये। पहला सवाल था कि गुजरात मे क्या होगा? अब अच्छा बताए तो संकट बुरा बताए तो संकट। सो बोल दिया अशोक जी से पूछो। अरे भाई आप ही अच्छा बता देते तो कौनसा अशोक जी सर्वसम्मति से विधायक दल के नेता घोषित हो रहे थे।

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ये राजनीति है या फुटबॉल

सप्ताह का सबसे शानदार राजनीतिक एपिसोड तो रविवार को ही सामने आया जब सुल्तानपुर के सांसद वरुण गांधी बीकानेर आए और सभा स्थल पर पहुंचे बिना ही वापस लौट गए। अरे... भीड़ के बिना नेता कैसे बोले सकते हैं...।

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सोशल मीडिया पर किचकिच

सोशल मीडिया ने जहां नेताओं के लिए प्रचार के रास्ते खोले हैं, वहीं जनता को भी एक जरिया दे दिया, जहां वो तुरंत प्रभाव से अपनी बात कह देते हैं। कई बार अच्छी बात कमेंट बॉक्स में होती है तो कई बार भड़ास डॉट कॉम।

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आओ जन्मदिन मनाते हैं?

जन्मदिन के बहाने ही सही, बीकानेर में राजनीति का पैंतरा हर कोई चलाने के लिए तैयार है। पिछले एक महीने में जन्मदिन पॉलिटिक्स इतनी दमदार रही है कि हर किसी ने अपने जन्म को और अपने नेता के जन्म को उत्सव का रूप दे दिया। प्रधानमंत्री का जन्मदिन तो सर्वमान्य तरीके से मनाया गया लेकिन इसके बाद जो जन्मदिन आए वो राजनीति से पूरी तरह प्रेरित थे। राजनीति भी अंदरुनी। एक विधायक का जन्मदिन आया तो सिर्फ उनके क्षेत्र में कुछ हॉर्डिंग्स लगा दिए गए। एक टिकट दावेदार का जन्म दिन आया तो उन्होंने ‘जीमण’ कर दिया। शहर कांग्रेस अध्यक्ष का जन्मदिन आया तो शक्ति प्रदर्शन किया गया। एक नेताजी जन्मदिन मनाने मूक बधिर विद्यालय पहुंच गए। मजे की बात यह है कि एक नेता के जन्मदिन से दूसरा नेता प्रभावित हुआ तो उन्होंने भगवान का नाम लेकर ऐसे ही आयोजन कर दिया। राजनीति में अवसर ही सबसे बड़ी चीज है। ‘मौके पर चौके’ की जरूरत होती है। अब जब चुनावी सीजन शुरू होने वाला है, ऐसे में जन्मदिन ही सबसे बड़ा मौका है। पिछले दिनों जन्मदिन मनाने वालों में अधिकांश को विधानसभा में टिकट की जरूरत है तो कुछ अपनी ही पार्टी में पद की दरकार है। ‘बर्थ डे पोलिटिक्स’ गलत नहीं है, जरूरत सिर्फ इतनी सी है कि बधाई दें तो दिल से दें। आगे तारीफ और पीछे से छुरा चलाने वालों से सावधान रहने की जरूरत है। मेरा इशारा किसी की तरफ नहीं है, इसलिए ज्यादा दिमाग ना लगाएं, दिल से बधाई देने तक ही सीमित रहें।

इसका श्रेय कौन लेगा?
पिछले दिनों दिल्ली विमान सेवा शुरू हुई तो एयरपोर्ट पर श्रेय लेने वालों की होड मच गई। ‘जिंदाबाद-मुर्दाबाद’ के नारे लगे, केंद्रीय मंत्री को अपमानित होकर वापस लौटना पड़ा। इसके विपरीत अब सुनने में आ रहा है कि बीकानेर से जयपुर के बीच चल रही विमान सेवा दम तोडऩे के कगार पर है। अगर यह सेवा भी बंद हो जाए तो नेता जी श्रेय लेने के लिए तैयार रहें। अब इसमें ऐसा नहीं हो कि फ्लाइट जयपुर की है तो जयपुर वाले नेता का दोष और दिल्ली की है तो दिल्ली वाले नेताजी को श्रेय। देखते हैं इसका श्रेय लेने कौन आगे आएगा?
युवा भाजपा में भी आडवाणी?
भारतीय जनता पार्टी के युवा मोर्चे की कार्यकारिणी पिछले दिनों घोषित हुई। एक भाई ने सोशल मीडिया पर लिखा कि युवा भाजपा में भी आडवाणी है। बात बहुत साधारण तरीके से कही गई लेकिन तीर बहुत निशाने पर जाकर लगा है। समझना होगा कि युवा नेतृत्व को साथ लेकर पार्टी नहीं चलेगी तो नींव हिल सकती है। फिर वो युवा जो अंग-अंग में पार्टी को रचा बसा चुका है, उसे ही हतोत्साहित किया तो नए लोग क्यों जुड़ेंगे?

अच्छा लगा नेताजी?
पिछले दिनों एक युवा नेता ने फिर से प्रभावित किया। पार्टी की नीति और रीति अपनी जगह है और मित्रवत रिश्ते और शिष्टता अपनी जगह। आज के दौर में जब नेता एक दूसरे के लिए अपशब्द बोल रहे हैं, सोशल मीडिया पर अशिष्ट भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, ऐसे में भाजपा नेता सुरेंद्र सिंह शेखावत ने पिछले दिनों अस्वस्थ चल रहे कांग्रेस नेता गुलाब गहलोत के घर पूरे लवाजमे के साथ पहुंचे। भाजयुमो के प्रदेश अध्यक्ष अशोक सैनी भी उनके आवास पर गए। राजनीति का ऐसा स्तर तो प्रभावित करता है, अच्छा लगा नेताजी।
वो क्या कहते हैं....? हां.... किप इट अप।

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