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बीकानेर नेता गिरी - मृत्यु के बाद सब के हो गए अटल जी Featured

अनुराग हर्ष. वैसे तो अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक थे और बीकानेर जैसे शहर में भाजपा की नींव को मजबूत तरीके से रखने का काम उन्होंने ही किया। इसके बाद भी उनका व्यक्तित्व इतना विशाल रहा कि मृत्यु के बाद वो सभी के हो गए। पार्टी विचारधारा से काफी आगे निकल गए। पंद्रह अगस्त को जब यह खबर आई कि अटल बिहारी वाजपेयी गंभीर रूप से अस्वस्थ है, तब से हर किसी के मन में एक चिंता का भाव था। बाद में चिंता ही दुखद सच के रूप में सामने आई। बीकानेर में कांगे्रसी हो या फिर भाजपाई हर कोई अटल बिहारी वाजपेयी की मौत के बाद दुखी नजर आया। शायद ही कोई नेता ऐसा था, जिसने अटलजी के निधन के बाद उन्हें शब्दों से श्रद्धांजलि नहीं दी हो। आमतौर पर एक दूसरे के खिलाफ सोशल मीडिया पर जमकर आरोप प्रत्यारोप लगाने वालों ने भी राजनीतिक बयानबाजी किनारे रखकर अटलजी को याद किया। रविवार को जब एक संस्थान ने उन्हें श्रद्धांजलि देने की पेशकश की तो सभी बड़े नेताओं ने पहुंचने का विश्वास दिलाया। पहुंचे भी। केंद्रीय राज्य मंत्री अर्जुनराम मेघवाल और कांग्रेस के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष डॉ. बी.डी. कल्ला भी एक मंच पर ही नजर आए। कांग्रेस नेता यशपाल गहलोत और नगर विकास न्यास के पूर्व चैयरमेन मकसूद अहमद भी पहुंचे। यह साबित करता है कि बीकानेर के राजनेताओं में संवेदना अभी शेष है। यह बात अलग है कि इस कार्यक्रम में कई भाजपा नेता और विधायक नजर नहीं आए। हो सकता है कि उन्हें सूचना ही नहीं मिली और और सूचना मिली है तो अटल बिहारी वाजपेयी को श्रद्धांजलि से भी बड़ा कोई राजनीतिक काम उनके पास रहा होगा। जब दूसरी पार्टी के नेता आकर पुष्प चढ़ा सकते हैं तो अपनी ही पार्टी के मतभेदों को छोड़कर उस शख्स को पुष्प अर्पित कर ही सकते हैं, जिसने इस पार्टी को बनाया था।

हर किसी के साथ थी उनकी यादें

अटल बिहारी वाजपेयी के निधन के बाद मीडिया वालों ने पुराने नेताओं को टटोलना शुरू किया। सुखद सच था कि लगभग हर पुराने नेता के पास अटल बिहारी के साथ फोटो उपलब्ध था। बीकानेर में भाजपा को स्थापित करने वाले ओम आचार्य के पास यादों का पिटारा था तो सोमदत्त श्रीमाली जैसे पुराने नेताओं की यादें भी जीवंत हो गई। दिवंगत भाजपा नेता द्वारका प्रसाद तिवाड़ी के घर भी कई फोटो में अटल जी नजर आए। पर्वतारोही मगन बिस्सा और सुषमा बिस्सा का हौंसला बढ़ाते हुए भी नजर आए तो बीकानेर से तब सवा लाख रुपए की पोटली देते कृपाचंद सुराना का फोटो भी वायरल हो गया। पूर्व विधायक नन्दलाल व्यास और भाजपा अध्यक्ष सत्यप्रकाश आचार्य के साथ भी अटल नजर आए।

छात्र संघ चुनाव का संकट

बड़े नेताओं के लिए विधानसभा चुनाव से ठीक पहले छात्र संघ चुनाव की आहट ने चिंता की लकीरें खींच दी है। दरअसल, छात्र संघ चुनाव में युवाओं का जमघट रहता है। टिकट वितरण और समर्थन देने की माथा पच्ची के बीच अधिकांश बार एक या एक से अधिक गुट नाराज हो जाता है। जो विधानसभा चुनाव पर सीधा असर डालता है। पिछले छात्र संघ चुनावों का ऐसा ही नतीजा बड़े नेता भुगत चुके हैं। पिछले दिनों जब एक नाराज युवा से कारण पूछा गया तो उसने साफ कहा कि फलां नेता ने हमें छात्र संघ चुनाव में सहयोग नहीं किया, इसलिए कुछ भी हो जाए हम विरोध करेंगे। अब युवाओं के विरोध का पंगा कोई लेना भी नहीं चाहता। माना जा रहा है कि छात्र संघ चुनाव इसी महीने के अंत में हो जाएंगे। अधिकांश विधानसभा टिकट दावेदार इससे दूर रहने की कोशिश में जुट गए हैं।

नए दावेदार को लेकर गंभीरता

भारतीय जनता पार्टी में एक नए दावेदार के नाम की फुसफुसाहट के बाद कई दावेदार उन्हें गंभीरता से ले रहे हैं। दरअसल, माइन्स व्यवसायी राजेश चूरा का नाम पिछले दिनों भाजपा के टिकटार्थियों में जुड़ गया। चूरा का नाम इसलिए महत्वपूर्ण हो गया क्योंकि उनके पीछे भाजपा के कद्दावर नेता देवीसिंह भाटी का नाम जुड़ा हुआ है। ऐसे में पहले से टिकट की दौड़ में चल रहे नेताओं में खलबली मची हुई है। उन्हें भी लगता है कि चूरा न सिर्फ जातीय समीकरणों को पूरा करते हैं, बल्कि हर तरह से टिकट पाने के लिए सक्षम है। पिछले कई वर्षों से चूरा सामाजिक गतिविधियों में भी काफी सक्रिय हो गए हैं। ऐसे में उनकी दावेदारी मजबूत है। हालांकि देवी सिंह भाटी केंप से ही रामकिशन आचार्य और महावीर रांका का भी नाम आ रहा है लेकिन विकल्प के तौर पर राजेश चूरा के नाम पर भाटी के अलावा दूसरे केंप भी 'हांÓ कर सकते हैं। दरअसल, चूरा भाजपाई विचारधारा से तो जुड़े रहे हैं लेकिन सामाजिक तौर पर उनकी छवि ज्यादा महत्वपूर्ण है। व्यापारियों के एक बड़े दल में भी वो काफी सम्मान की दृष्टि से देखे जा रहे हैं। भाजपा से टिकट की मांग कर रहे अधिकांश नेता स्वयं को संघी, पुराना भाजपाई और पार्टी का कर्मठ कार्यकर्ता बताने का प्रयास कर रहा है। इस बीच चूरा से एक वरिष्ठ संघ नेता के मिलने की चर्चा ने दूसरे दावेदारों की नींद उड़ा रखी है। पिछले कुछ दिनों एक युवा नेता का नाम भी चर्चा से दूर होता जा रहा है। इस युवा नेता के कंधों पर अन्य जिम्मेदारियां अधिक होने के कारण भी संभवत: उनकी सक्रियता शहर में कम हो गई है। कमोबेश ऐसे ही हालात बीकानेर पूर्व में भी है, जहां नए नेता कुछ उम्मीद के साथ जुटे हुए हैं।

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