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गौरव यात्रा का 'रास्ता' अब तो दुरुस्त होगा

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यह तय है कि विधानसभा चुनाव में मतदान करने वालों में एक बड़ा हिस्सा माहौल देखकर मतदान करता है। यही कारण है कि हर चुनाव में मतदाता कभी इधर होते हैं तो कभी उधर। इस विधानसभा चुनाव में भी माहौल ही सबसे बड़ा होगा। फिलहाल माहौल बनाने में भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस के मुकाबले कहीं आगे नजर आ रही है। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे एक बार बीकानेर आ रही है। इस बार वो अपनी गौरव यात्रा लेकर आ रही है। यात्रा वैसे तो बस से शुरू हुई थी लेकिन अब अधिकांश हिस्सा हेलीकॉप्टर से ही पूरा हो रहा है। इस बार छह सितम्बर को जब राजे आएगी तो जबर्दस्त माहौल तैयार किया जाएगा। राजे का हेलीकॉप्टर पुष्करणा स्टेडियम में उतरेगा। पहली बार यहां हेलीकॉप्टर उतरेगा तो आसपास के लोग कोतूहलवश देखने के लिए छत्तों पर चढ़ेेंगे। इसके बाद उनकी यात्रा भी बड़ा गणेश मंदिर से शुरू होगी। यह पहला अवसर नहीं है जब बड़ा गणेश मंदिर से राजे यात्रा शुरू करेगी। पहले परिवर्तन यात्रा के दौरान भी उन्होंने बीकानेर में बड़ा गणेश मंदिर से बीकानेर की यात्रा शुरू की थी। 

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इस दौरान वो गोकुल सर्किल होते हुए नयाशहर थाने से जस्सूसर गेट, सेटेलाइट अस्पताल के पास से, चौखूंटी पुलिया के ऊपर से होते हुए मुख्य डाकघर तक आएगी। यहां से सार्दुल सिंह सर्किल से जूनागढ़ होकर लालगढ़ पहुंचेगी। जिस रास्ते से वसुंधरा का काफिला गुजरेगा, उस रास्ते पर फिलहाल तो आम आदमी का निकल पाना मुश्किल हो रहा है। पूरी तरह से टूटी यह सड़कें अगर दुरुस्त हो जाती है तो वसुंधरा राजे की यात्रा का स्थानीय लोगों को कुछ लाभ मिल सकेगा। अन्यथा ऐसी राजनीतिक यात्राएं राजनीतिक लाभ तक ही सीमित रह जाती है। खासकर रोशनीघर चौराहे से मुख्य डाकघर तक का रास्ता इस यात्रा से ठीक होने की उम्मीद बंध गई है।

यात्रा हेलीकॉप्टर से, विश्राम लालगढ़ में

मुख्यमंत्री की हेलीकॉप्टर से हो रही इस यात्रा को अब विरोधी मुद्दा बना रहे हैं। विरोधियों का कहना है कि गौरव यात्रा असल में वैभव यात्रा है। मुख्यमंत्री सर्किट हाउस में नहीं ठहरकर लालगढ़ होटल में ठहरती है। उधर, भाजपा नेताओं का कहना है कि मुख्यमंत्री समूचे प्रदेश में गौरव यात्रा के साथ ही वहां की समस्याओं से भी रूबरू हो रही है और तत्काल निराकरण भी किया जा रहा है। ऐसे में बीकानेर सहित पूरे प्रदेश को इसका लाभ मिल रहा है। अब यह तो भविष्य के गर्त में है कि किसे कितना लाभ मिल रहा है लेकिन इतना तय है कि मुख्यमंत्री ने बीकानेर पूर्व और पश्चिम में माहौल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। हालांकि इस बार पूर्व का बहुत कम हिस्सा इस यात्रा में शामिल हुआ है।

कभी इधर तो कभी उधर

एक पूर्व विधायक फिर से कांग्रेस में आने की कोशिश में जुटे हुए हैं। इसके लिए कांग्रेसी नेताओं के कार्यक्रमों में भी शरीक हो रहे हैं। कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष अगर बीकानेर आते तो अब तक शामिल भी हो गए होते। न सिर्फ विधायक बल्कि दो अन्य नेता भी फिर से कांग्रेस में शामिल होने की कोशिश में है। पिछली बार जब कांग्रेस सरकार जाती नजर आई तो इन नेताओं ने भाजपा का दामन पकड़ लिया और अब सर्वे में कांग्रेस की सरकार आती नजर आई तो फिर से पूर्व पार्टी की ओर दौड़ रहे हैं। मजे की बात यह है कि पांच साल तक जिस पार्टी को कोसते नजर आए, अब उसी पार्टी को अपना घर बताकर वापस भी आएंगे। इसे ही राजनीति कहते हैं, जहां न तो जुबान की कीमत होती है और नीतियों की। जैसे-तैसे सत्ता के साथ रहने की जुगत में कभी इधर तो कभी उधर।

हर तरफ है कोशिश

बड़े नेताओं की अपनी परेशानी है। उन्हें अपनी सीटों का ध्यान रखने के साथ आसपास की पंचायती भी करनी पड़ती है। कई बार यह पंचायती भारी पड़ जाती है तो कई बार इसी पंचायती के दम पर उनकी नेतागिरी भी बनी रहती है। इन दिनों बीकानेर जिले की सात विधानसभा सीटों की पंचायती भी कई बड़े नेताओं के हाथ में है। टिकट वितरण के दौरान उन्हें अपना ध्यान तो रखना ही है, साथ ही इन सीटों का भी वितरण इस तरह से करवाना होता है कि खुद को नुकसान नहीं हो। इसके बाद भी होम करते हाथ जलने की कहावत सिद्ध हो ही जाती है। ऐसे में सुना है कि इस बार भाजपा के एक बड़े नेता अपनी सीट के बजाय दूसरी सीट पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। वो भी एक नहीं बल्कि दो सीटों पर अपने प्रत्याशी मैदान में उतारने की कोशिश में है। कमोबेश ऐसे ही हालात कांग्रेस में भी है, जहां एक बड़े नेता अपनी टिकट पक्की मानते हुए जिले की तीन सीटों पर अपने उम्मीदवार को मैदान में उतारने की जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं। यह बात अलग है कि इस कोशिश में वो कितने सफल होंगे, यह भी तय नहीं है। एक सीट पर तो हालात यह है कि उन्होंने ज्यादा 'पंचायतीÓ की तो खुद की सीट पर नुकसान उठा सकते हैं। दरअसल, कांग्रेस के तीन बड़े नेता बीकानेर जिले से विधानसभा में जाने की कोशिश में है। अगर राज्य में कांग्रेस की सरकार बनती है तो तीनों ही मंत्री पद के दावेदार तो कम से कम है। ऐसे में हर कोई चाहता है कि उसका प्रभाव अधिक रहे। अब राजनीति है तो यह सब भी होगा। फिलहाल कांग्रेस नेताओं को अपने आदमी को जिताने की कोशिश के बजाय अपनी पार्टी को जिताने की कोशिश पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।

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