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सोशल मीडिया पर किचकिच

सोशल मीडिया ने जहां नेताओं के लिए प्रचार के रास्ते खोले हैं, वहीं जनता को भी एक जरिया दे दिया, जहां वो तुरंत प्रभाव से अपनी बात कह देते हैं। कई बार अच्छी बात कमेंट बॉक्स में होती है तो कई बार भड़ास डॉट कॉम।

नेताओं की सफलता और लोकप्रियता को आंकने का तरीका हर युग में नया इजाद होता है। एक वक्त था जब नेताजी की लोकप्रियता का आंकलन उनके पीछे चल रही गाडिय़ों की संख्या से लगाया जाता था, फिर उनके घर के आगे खड़ी भीड़ से आंका जाने लगा और अब सोशल मीडिया के युग में यही एक तरीका शेष रह गया है। वैसे तो देश के प्रधान सेवक ने सोशल मीडिया की लोकप्रियता को सफलता के मानदंडों में शामिल करके मंत्रियों को मजबूरन इस और धकेल दिया है। ऐसे में बीकानेर के नेता और मंत्री भी कहां पीछे रहने वाले थे। केंद्रीय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ट्विटर पर काफी सक्रिय है, यात्रा बीकानेर की हो या फिर शिलॉंग की। ट्विट जरूर करते हैं। कुछ मुद्दों पर वो खुद सोशल मीडिया पर नहीं आते बल्कि उनके समर्थक आते हैं। हाल ही में उनके संसदीय कोटे के खर्च पर एक पत्रकार ने सवाल खड़ा किया तो अगले ही दिन 'विधिक समर्थकÓ ने फेसबुक पर सांसद कोटे से खर्च का हिसाब दे दिया। काफी तार्किक रूप से आंकड़े दिए गए। यह बात अलग है कि इन आंकड़ों के जवाब में अधिकांश प्रतिक्रियाएं नकारात्मक ही आई। अब क्या करें, बीकानेर में विरोध करने वाले पीछे ही पड़ जाते हैं। यह गलत बात है। एक अन्य साथी ने श्रीडूंगरगढ़ विधायक के समर्थन में पोस्ट लिखी तो वहां भी उल्टे जवाब ही मिले।
देखो भई, पोस्ट पर अपनी बात कहने का सभी को अधिकार है। इसका आशय यह नहीं है कि हम उस पोस्ट के खिलाफ ही बोलते रहें। कभी कभी पोस्ट के समर्थन में भी लिख देना चाहिए। विरोध करने की परम्परा हमारे देश में बहुत है। राजस्थान में कुछ ज्यादा ही है, बीकानेर वाले तो पीछे ही पड़ जाते हैं।
कांग्रेस का सोशल मीडिया में जवाबी हमला
अब तक भाजपा ही सोशल मीडिया पर हावी थी लेकिन पिछले कुछ महीने से कांग्रेस ने भी इस 'फोकटÓ और त्वरित प्रचार पर अपना ध्यान फोकस कर लिया है। न सिर्फ भाजपा कार्यकर्ताओं की तरह त्वरित जवाब दे रहे हैं। कांग्रेस ने भाजपा की देखा देखी अपना आईटी सेल भी मजबूत कर दिया है। अब हर मौके पर आईटी सेल अपनी एक पोस्ट जरूर डालता है। कभी जन्म दिन की बधाई तो कभी पुराने नेता की स्मृति में। कांग्रेसी नेताओं समझना होगा कि सिर्फ सोशल मीडिया से काम नहीं चलेगा, कुछ जमीन पर भी तेवर दिखाने होंगे। यह रास्ता भी बुरा नहीं है, सत्ता इससे भी मिलती है।
बीकानेर में नमो नहीं, लमो जी है
सफाई अभियान के साथ साथ एक सज्जन इन दिनों नेता बनने की तैयारी में है। वो नमो है और यह लमो है। जहां भी महापौर जी जाते हैं, ये सोशल मीडिया पर सक्रिय हो जाते हैं। कभी इंस्टाग्राम तो कभी ट्विटर। महापौरजी को बचाने के लिए इन्होंने अपना 'एक्सक्लूसिव सोशल मीडिया चैनलÓ ही बना दिया है। नि:संदेह लमो जी स्वच्छता के लिए अच्छा काम कर रहे हैं लेकिन इस अभियान की जरूरत पडऩे के पीछे जो प्रशासनिक कारण है, उसे भी साफ सुधरी दृष्टि से ही देखना होगा। साब की गाड़ी में बैठकर जनता की नजर से भी देखें। वैसे आपके स्वच्छता अभियान हम भूरी भूरी प्रशंसा करते हैं...।
वो क्या कहते हैं....? हां.... किप इट अप।
पूरे 52 बटुक है भाजपा में
पिछले दिनों एक साथी ने कहा कि भाजपा में ५२ बटुक है। हम समझ नहीं पाए कि इतनी बड़ी संख्या में बटुक कहां से आ गए। उन्होंने एक फोटो की तरफ इशारा करते हुए तुरंत कहा कि एक बटुक तो यह है, दूसरे ५१ भी राजनीति में सक्रिय है। इन सभी की साधना बटुक की तरह ही है और हर हाल में टिकट लेने की कोशिश में है। वहीं कांग्रेस के लिए पश्चिम विधानसभा में बटुकों की संख्या काफी कम है। इक्का दुक्का दम जरूर लगा रहे हैं लेकिन यह संख्या किसी भी स्थिति में भाजपा के आंकड़ों के आसपास भी नहीं आ सकती। कारण साफ है यहां सरकार है और वहां अभी सरकार के आसार कम है।

DNR Reporter

DNR desk

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