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ये राजनीति है या फुटबॉल

सप्ताह का सबसे शानदार राजनीतिक एपिसोड तो रविवार को ही सामने आया जब सुल्तानपुर के सांसद वरुण गांधी बीकानेर आए और सभा स्थल पर पहुंचे बिना ही वापस लौट गए। अरे... भीड़ के बिना नेता कैसे बोले सकते हैं...।

शहर में राजनीति हो, यहां तक तो ठीक है लेकिन शहर की राजनीति में फुटबॉल हो, यह बड़ा अटपटा मामला है। बीकानेर की राजनीति में भी इन दिनों ऐसा ही चल रहा है। भारतीय जनता पार्टी में तो हर कोई बड़ा नेता फुटबाल का शानदार खिलाड़ी है। वो कब अपने पाले में आई फुटबॉल को सामने वाले के पाले में डाल दे, पता ही नहीं चलता। बात सिर्फ एक दूसरे को पटखनी देने तक सीमित नहीं है बल्कि एक दूसरे के समर्थक तक को नीचे दिखाने की कोशिश होती है। पिछले दिनों नाल हवाई अड्डे के मामले में अब दबी जुबान कई मामले सामने आए हैं। पहले माना जा रहा था कि यह किस्सा प्रदेश की राजनीति से जुड़ा हुआ है लेकिन अब पता चला है कि सारा मामला स्थानीय स्तर पर ही हुआ था। एक गुट ने हॉर्डिंग्स लगाए और दूसरे गुट के जोश वाले समर्थकों ने हटा दिए। फिर क्या था दूसरे गुट को गुस्सा आ गया और पूरे शहर को न सिर्फ हॉर्डिंग्स से पाट दिया बल्कि कार्यक्रम स्थल पर अपना दमखम दिखा दिया। वैसे यह जायज है कि अगर आप अंधेरे में तीर मारोगे तो सामने वाला रोशनी करके सीधे छाती पर वार करेगा ही करेगा। तभी तो इन्हें 'शेरÓ कहते हंै। अब जब यह गुर्राए तो सामने वाला कोई बोला ही नहीं। खैर..। अब सुनने में आया है कि शहर भाजपा के जिस गुट को बड़े नेताजी ने अपने पाले में किया था, वो भी धीरे धीरे अब खिसकने लगा है। इस गुट का आरोप है कि वो हमारी सुन ही नहीं रहे। अपने बेटे की बात ही मानते हैं। अरे भाई... कौन नहीं मान रहा बेटे, पोते की। न सिर्फ बीकानेर बल्कि पूरे देश में समर्थक एक तरफ है, कार्यकर्ता दूसरी तरफ है, नजदीक तो सिर्फ अपने रिश्तेदार ही होते हैं। वैसे नेताजी को समझ आनी चाहिए... खाजूवाला अभी दूर है...।
कौन होगा शहर कांग्रेस का अध्यक्ष...
कांग्रेस में शहर का अध्यक्ष कौन होगा? यह इन दिनों चर्चित प्रश्र है। हम कहते हैं जिस पार्टी में राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुना जाना स्पष्ट है, वहां शहर अध्यक्ष क्या चीज है। लोकतांत्रिक तरीके से राहुल गांधी निर्विरोध निर्वाचित होंगे, यह घोषणा पहले हो जाए, इससे ज्यादा लोकतंत्र की अलोकतांत्रिक बात क्या हो सकती है? जब राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना तय है तो शहर अध्यक्ष भी तय ही होगा। नाम का इंतजार करना भी बेमानी है। अगले कुछ दिनों में नाम भी सामने आ जाएगा। वैसे यह तय है कि जो लोग सफेद कलफदार कुर्ते पायजामे खरीदकर पांच साल बाद शहर आ रहे हैं, वो नहीं बनेंगे।
जनसंघ वालों का सम्मान...
पिछले दिनों भाजपा ने जनसंघ के लोगों का सम्मान किया। मुझे सहसा ही लालकृष्ण आडवाणी याद आ गए। अगर जनसंघ वालों का सम्मान ही करना था तो बेचारों को कोई पद ही दे देते। जिला स्तर पर ही मार्गदर्शन मंडल बना देते। यह स्वयं को आडवाणी के समान पाकर ही प्रफुल्लित हो जाते। वैसे तो सरकार के इतने पद खाली पड़े हैं कि जनसंघ ही क्यों भाजपा वालो भी 'ऑब्लाइजÓ हो जाते। पिछले दिनों इनके घर पहुंचकर माला पहनाने का औचित्य समझ नहीं आया। एक भाई ने कहा कि उन्हें घर जाकर समझाकर आए हैं कि आपने जो मैदान और पिच तैयार की थी, उस पर बैटिंग हम कर रहे हैं। पार्टी के बड़े आयोजनों तक में इन्हें प्रथम पंक्ति पर नहीं बिठाया जाता, फिर सम्मान का नाटक क्यों?

दीपावली के नाम पर...
दीपावली के नाम पर नेताओं ने अपना काम करने का कोई अवसर नहीं छोड़ा। अधिकांश नेताओं ने दीपावली के उपहार उन लोगों के घर तक पहुंचाए जो चुनाव आने तक उनका कोई न कोई काम निकाल सकते हैं। जिन नेताओं को अगले चुनाव में टिकट लेने की चाह है, वो बड़े डिब्बे लेकर पहुंचे और जिन्हें पूरी उम्मीद है कि उन्हें टिकट नहीं मिलना है, उनके डिब्बे इस बार छोटे हो गए। वैसे मजे की बात है कि इस बार उन नेताजी ने भी डिब्बे भेजे जो आमतौर पर ऐसे खर्चों में विश्वास नहीं रखते। शहर प्रथम नागरिक होने के नाते सिर्फ शहर की समस्या सुनने में ही विश्वास रखते हैं, लगता है उन्हें भी विधायक की सीट नजर आ रही है।

DNR Reporter

DNR desk

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