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मानो ना मानो, दावेदार तो हो

कई बार सार्वजनिक कार्यक्रमों में सक्रियता पचास तरह की चर्चाओं को जन्म दे देती है। ऐसे में आप मानो या ना मानो, लोग के जुबां पर बात आ ही जाती है। पिछले दिनों संसदीय सचिव डॉ. विश्वनाथ मेघवाल की पत्नी गृह विज्ञान महाविद्यालय की वरिष्ठ व्याख्याता डॉ. विमला डुकवाल के साथ भी ऐसा ही हुआ। कुछ समय से उनकी सक्रियता को लेकर तरह तरह के कयास लगाए जा रहे थे लेकिन सार्वजनिक तौर पर किसी ने कोई बात नहीं बोली। यहां तक कि स्वयं उनके निर्देशन में आयोजित एक बड़े कार्यक्रम में भी किसी ने मंच से इस तरह की बात नहीं की लेकिन मोहता भवन में आयोजित एक कार्यक्रम में वक्ता ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि आप राजनीति में भी आ रही है तो हम आपका पूरा सहयोग करेंगे। अब उनके पास प्रतिक्रिया देने के लिए शब्द नहीं। पास में बैठे लोगों से जरूर कहा कि उनका ऐसा कोई मानस नहीं है। बात यहीं तक खत्म हो जाती तो कोई बात नहीं। कार्यक्रम के बाद वो बाहर निकले तो एक महिला ने भी उन्हें बड़े पद पर जाने का आशीर्वाद दे डाला। अब यह सब कुछ पत्रकारों के सामने होगा तो चर्चा ए आम तो होगी ही। वैसे आपको याद होगा कि पिछले लोकसभा चुनाव में भी डॉ. विमला का नाम चर्चा में आया था और एक बार फिर इसी नाम पर चर्चा हो रही है। हालांकि स्वयं डॉ. विमला कई बार स्पष्ट कर चुकी है कि वो चुनाव लडऩे के लिए सक्रिय नहीं है। जैसे हालात नजर आ रहे हैं, उससे लगता है कि इस बार भी भाजपा के एक दल विशेष की ओर से उनका नाम आगे किया जाएगा। अगर ऐसा हो जाता है तो कोई गलत भी नहीं। पढ़ी लिखी सांसद आखिर किसको नहीं चाहिए? हां, वैसे वर्तमान वाले सांसद भी कहां कम है, वो तो आईएएस अधिकारी थे।

डॉक्टर के यहां डॉक्टर और इंजीनियर के यहां इंजीनियर हो तो आश्यर्च नहीं वैसे ही नेताजी के यहां अगर कोई पौध होगी तो नेता ही निकालेगी और जनता को भी आश्चर्य नहीं होगा। साथ साथ नेता बनने वाला व्यक्ति अपने आप को नेता होना स्वीकार भी नहीं करता ये भी एक रिवाज है। वैसे इस देश में राजनीति से जुडे तो सब है और जुडे रहना भी चाहते हैं लेकिन राजनीति करना नहीं चाहते। भले हो कुछ भी अब जब दाव खेले जा रहे हैं तो बात हो होगी

सोशल मीडिया पर सक्रिय भाजपा
भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता इन दिनों अपने क्षेत्र और बूथ पर सक्रिय है या नहीं? इसकी जानकारी नहीं है लेकिन सोशल मीडिया पर सर्वाधिक सक्रिय है, इसके दर्जनभर प्रमाण है। कुछ नेता तो रोज सुबह उठते ही मुख्यमंत्री के साथ एक पोस्ट तैयार करते हैंं और व्हाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर और यहां तक कि इंस्टाग्राम पर भी डालते हैं। इस दौड़ में सक्रिय युवा नेताओं को पता है कि एक दिन आएगा जब मुख्यमंत्री पोस्ट देखेगी और उस पर प्रतिक्रिया करेगी। बस उस प्रतिक्रिया पर ही शेष रहा एक साल गुजार लेंगे। वैसे भी 'काकाजीÓ के राज में कुछ खास नहीं हो रहा।

तैयार हो रहे हैं समानान्तर पार्षद
जब अपने खिलाड़ी कप्तान के हाथ में न हो तो पड़ौसियों के खिलाडिय़ों को बेटिंग पर थोड़े ही भेज सकते हैं? क्रिकेट में ऐसा नहीं होता होगा लेकिन बीकानेर नगर निगम में सब कुछ संभव है। शहर की समस्याओं से रूबरू करवाने के बजाय अपने हितों के लिए लडऩे वाले पार्षदों को जवाब देने के लिए महापौर नारायण चौपड़ा ने जोरदार तरीका निकाला है। अब वो स्वच्छता प्रभारी तैयार कर रहे हैं। वैसे चौपड़ा तो इन्हें अच्छे उद्देश्य के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं लेकिन विरोधियों का कहना है कि महापौर पार्षदों के समानान्तर पार्षद खड़े कर रहे हैं, जिससे पार्टी को नुकसान हो सकता है। अरे भई, कुछ अच्छा करने की कोशिश कर रहे हैं तो इसमें बुरा भी क्या है।

कौन होगा दावेदार?
इन दिनों कांग्रेस और भाजपा नेताओं के पास जो प्रश्न सबसे बड़ा बना हुआ है वो है 'बीकानेर पूर्व और पश्चिम से कौन होगा दावेदारÓ। दावेदार ढूंढना गलत नहीं है लेकिन ऐसे ऐसे दावेदारों के नाम लगाकर पोस्ट करना अजीब लगता है जिन्हें अब तक पार्षद का टिकट मिलना भी मुश्किल है। कई बार तो लगता है कि इच्छुक नेता गण खुद ही अपनी पोस्ट तैयार करवा रहे हैं और इधर-उधर फेसबुक पर चिपका रहे हैं या फिर यूं कहे चिपकवा रहे हैं। चुनाव लडऩा हर किसी का अधिकार है लेकिन मजा तब आए जब स्वयं जनता कहे कि इसे चुनाव लडऩा चाहिए। अब तो हर कोई खुद को विधायक पद का दावेदार मान रहा है। सब बटुक बनकर अपने दावे ठोक रहे हैं, भले ही जिसे टिकट देना है, वो अभी इस पचड़े में पडे ना हो।

DNR Reporter

DNR desk

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