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खाजूवाला में होगा राजनीतिक दंगल Featured

विधानसभा चुनाव में असली दंगल तो पांच और छह महीने बाद देखने को मिलेगा लेकिन खेल के पासे फैंकने का काम अभी शुरू हो गया है। बीकानेर की सात विधानसभा सीटों में से इस बार जिस सीट पर चुनाव से पहले दंगल होने वाला है वो हैं खाजूवाला की सीट। इस बार सीट पर दलित नेताओं की बाढ़ आने वाली है। जितने भी दावेदार है, सभी दमदार है, मजबूत है। यहां से भाजपा के विधायक डॉ. विश्वनाथ है लेकिन इस बार उन्हें अपनी पार्टी के सांसद पुत्र से चुनाव से पहले दो-दो हाथ करने पड़ेंगे। दरअसल, यहां से सांसद अर्जुन राम मेघवाल के पुत्र रवि मेघवाल भी दावेदार है। दरअसल, रवि स्वयं खाजूवाला में काफी सक्रिय है और पिछले दिनों हॉर्डिंग्स लगाकर उन्होंने साफ कर दिया कि पिता की विरासत लेने के लिए पूरी तरह से तैयार है। वैसे डॉ. विश्वनाथ का काम भी कच्चा नहीं है। वो भी पूरी मजबूती के साथ इन दिनों अपने विधानसभा क्षेत्र में लगे हुए हैं। अगर रवि मेघवाल विधानसभा में टिकट के दावेदार है तो चर्चा है कि डॉ. विश्वनाथ की पत्नी डॉ. विमला भी सांसद की उम्मीदवार है। अगर किसी भी स्थिति में प्रधानमंत्री मोदी अपने सांसदों को रिपोट्र्स के आधार पर बदलते हैं तो विमला डुकवाल का नाम सबसे आगे चल रहा है। चुनाव से पहले की यह मशक्कत सिर्फ भाजपा में ही नहीं है बल्कि कांग्रेस में भी मची हुई है। यहां गोविन्द मेघवाल ने पिछला चुनाव लड़ा था। इस बार उनका टिकट कटवाने वालों की कमी नहीं है। राजनीतिक रूप से गोविन्द के प्रतिद्वंद्वी रहे नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश की राजनीति में इन दिनों काफी आगे चल रहे रामेश्वर डूडी के खास और देहात कांग्रेस अध्यक्ष महेंद्र गहलोत ने गोविन्द की अनुपस्थिति में ही आन्दोलन कर नए समीकरण पैदा कर दिए।

विधानसभा चुनाव से पहले इस मुद्दे पर कई बार बात हो गई लेकिन लगातार खाजूवाला में ही टिकट के लिए दौड़भाग हो रही है। इस आरक्षित सीट पर कांग्रेस बहुत कम अंतर से पिछला विधानसभा चुनाव हार गई थी। इस बार भी वहां कांग्रेस एक जुट नजर नहीं आ रही है। एकता के मामले में भाजपा की हालत यहां और भी ज्यादा बदतर है। भाजपा के कई धड़े वहां आमने सामने चुनाव से पहले हो गए हैं।


उपचुनाव में बीकानेर का सीधा जुड़ाव

प्रदेश में दो लोकसभा सीटों और एक विधानसभा सीट पर बीकानेर की प्रतिष्ठा भी दाव पर लगी हुई है। कैसे? वो ऐसे कि अलवर में कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में डॉ. करण सिंह यादव मैदान में है। वो बीकानेर के उदयरामसर के निवासी है और बीकानेर के काफी करीब है। इसके अलावा अजमेर में भाजपा ने जिन इक्का दुक्का लोगों को जीत की जिम्मेदारी सौंपी है, उनमें बीकानेर के पूर्व शहर भाजपा अध्यक्ष विजय आचार्य भी है। दोनों ही जगह अलग-अलग पार्टी से बीकानेरी कार्यकर्ता जुड़े हुए हैं। वैसे तीसरे विधानसभा क्षेत्र मांडलगढ़ से हमारे ही शहर के गोकुल प्रसाद पुरोहित पहले विधायक रह चुके हैं।

गुजरात का हिसाब तो दो...

गुजरात में विधानसभा चुनाव खत्म हो गए। सरकार भी बन गई। इसके बाद उपमुख्यमंत्री नाराज भी हो गए, उन्हें मनचाहे विभाग भी मिल गए। कहने का मतलब है कि गुजरात विधानसभा चुनाव की बात अब पुरानी होने वाली है लेकिन हमारे यहां से गए नेताओं ने अब तक अपना हिसाब नहीं दिया है। कांग्रेस और भाजपा दोनों के ही नेता काफी जोश खरोश के साथ गुजरात में जुटे थे। कोई राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में तो कोई जातीय आधार पर अपनी पार्टी को टिकट दिलाने के लिए। वहां से खूब फोटो भी फेसबुक पर डाले लेकिन परिणाम आने के बाद किसी ने नहीं बताया कि उनके प्रचार वाले क्षेत्र में पार्टी को जीत मिली या फिर हार। हां...यह भी संभव है कि कुछ बताने लायक होगा ही नहीं तो क्या बताएं?


युवा नेता निष्क्रिय क्यों?


पिछले कुछ दिनों से देखने में आ रहा है कि शहर के कई युवा नेता अचानक से निष्क्रिय हो गए हैं। आखिर क्यों? राजनीति में रहना है तो कुछ न कुछ करना होगा। शहर भाजपा में भी कई नए और युवा चेहरों को अवसर दिया गया है लेकिन उनकी सक्रियता फिलहाल नजर नहीं आई है। वेद व्यास भी ऐसे ही नेताओं में है,जिनकी लंबी चौड़ी टीम निष्क्रिय सी नजर आ रही है। इसी तरह लूणकरनसर में टिकट के दावेदार माने जा रहे डॉ. भागीरथ मूंड भी इन दिनों कम नजर आ रहे हैं। इनकी कम सक्रियता से न सिर्फ राजनीतिक मैदान सूना नजर आ रहा है बल्कि समीकरण भी बदलते नजर आ रहे हैं। राजनीति में ऐसे युवाओं की जरूरत है और उन्हें अपने दम पर अपना रास्ता बनाएं। किसी नेता की बैसाखी पकड़कर आगे नहीं आना है, उन्हें।

DNR Reporter

DNR desk

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