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आओ 'सुराना जी' से सीखें Featured

विधानसभा में जब मानिकचंद सुराना को श्रेष्ठ विधायक का सम्मान दिया जा रहा था, तब उनके प्रशसंक खुश हो रहे थे लेकिन भाजपा में कई लोगों के चेहरे उदास थे। दरसअल, इस वयोवृद्ध नेता ने कई युवा चेहरों को हराकर विधानसभा में फिर अपना स्थान बनाया था। ऐसे में उनके प्रतिद्वंद्वियों का नाराज होना तो जायज था। कुछ नेता इस बार भाजपा से टिकट लेना चाहते हैं, वो भी सुराना की इस उपलब्धि से ज्यादा खुश नहीं हो रहे थे, उन्हें लगा कि सुराना वापस पार्टी में आए तो उन्हें नुकसान हो सकता है। किसी का खुश होना और नाराज होना अपनी जगह है लेकिन मानिक चंद सुराना के व्यक्तित्व, राजनीतिक जीवन और उनकी दृढ़ता से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। उनका सम्मान वर्ष २०१४ के लिए हुआ है लेकिन उनकी लड़ाई और हर लड़ाई में जीत उनके लंबे राजनीतिक जीवन का हिस्सा है। ऐसे में सिर्फ वर्ष २०१४ तक उन्हें सीमित करना भी उचित नहीं है। कई बार शिकायतों के चलते कार्यकर्ता और वोटर उनसे नाराज भी होते हैं लेकिन हर बार वो किसी न किसी जन मुद्दे पर ही अपनी शिकायत को अंजाम देते हैं। सुराना की लड़ाईयों से भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है, जिसमें उन्होंने किसान, गरीब और मध्यम वर्ग के लिए आवाज उठाई है। पिछले दिनों उन्हें सम्मान मिलने के बाद सोशल मीडिया में यह मुद्दा भी उठाया गया कि लूणकरनसर में विकास नहीं हो रहा। वो शायद यह भूल रहे हैं कि उसी लूणकरनसर से दूसरे विधायक भी निकले हैं, मंत्री भी बने हैं लेकिन जो दर्जा इस क्षेत्र को मिलना चाहिए था, वो नहीं मिला। सुराना के कार्यकाल पर सवाल तो उठाए जा सकते हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक इच्छा शक्ति पर सवाल उठाना बेमानी है।

बधाईयों में भी राजनीति है

अब बधाई तो बधाई है, लेकिन सोशल मीडिया पर बधाई में भी राजनीति नजर आती है। कई बड़े नेताओं के बड़े सिपहसालार फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर सक्रिय है। वो हर रोज कुछ न कुछ पोस्ट करते हैं लेकिन करते वो ही है, जो उनके नेताजी को पसंद हो। न सिर्फ वो पोस्ट करते हैं बल्कि पार्टी को किनारे रखकर अपने नेताजी के विचारों का ही समर्थन करते हैं। अब राज्यसभा की सीटों की घोषणा होने के बाद कई नेताओं ने बधाई बांटी लेकिन इसमें राजनीति साफ नजर आई। जिस तरह के शब्दों का उपयोग हुआ, उसका उनकी ही पोस्ट पर जमकर विरोध भी हुआ।

अब धर्मयात्रा की चर्चा

बीकानेर में एक बार फिर धर्मयात्रा को लेकर चर्चा जोरों पर हैं। १८ मार्च को होने वाली इस धर्म यात्रा को लेकर उन नेताओं के लिए हर बार उहापोह की स्थिति बन जाती है, जो हिन्दू धर्म यात्रा में शामिल तो होना चाहते हैं लेकिन भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सहित अन्य संगठनों के झंडे के नीचे नहीं आना चाहते। आयोजक बार बार इसे गैर राजनीतिक बता रहे हैं लेकिन राजनीति है कि आड़े आ ही जाती है। पिछली बार भी इस इस यात्रा में सभी पार्टियों के लोग शामिल हुए थे और इस बार भी सभी को जोडऩे का प्रयास है। अच्छी बात देखने को मिली कि विचारधारा को किनारे रखकर इस यात्रा का वैभव बढ़ाने के लिए कई दिग्गज नेताओं के परिजन सार्वजनिक मंच पर भी आए हैं। यात्रा अच्छा संदेश दे, सद्भाव को बढ़ावा दें यह सभी चाहते हैं। प्रशासन भी ऐसा ही कुछ चाहता है।

रैली में कितने गए?

पिछले दिनों झुंझुनूं में प्रधानमंत्री की रैली के लिए बड़ा जबर्दस्त अभियान चलाया गया। हर कोई बसों के दावे करता रहा, कोई चार बस तो कोई पांच बस के लिए दावे कर रहा था। हकीकत यह थी कि जितनी बसें बीकानेर से जयपुर लिखवाई गई थी, उतनी बसें तो जिला परिवहन अधिकारी के रिकार्ड में ही नहीं थी। वैसे भी दबाव इसी महकमें पर था कि वो बसों की व्यवस्था करे। आला अधिकारियों ने कुछ बड़े नेताओं के दबाव में बसों का जुगाड़ भी करवाया लेकिन इसके बाद भी सुबह सवेरे तैयार हुए कार्यकर्ताओं को बसों के अभाव में वापस लौटना पड़ा। अब सवाल यह है कि अगर बस परिवहन विभाग ने नहीं भेजी तो अपनी ही कर लेते। कुछ नेता अपनी 'पर्सनलÓ कार से गए भी और फेस बुक पर लाइव भी चलाया कि हम जा रहे हैं।

DNR Reporter

DNR desk

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