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ये बहस बड़ी है मस्त Featured

इन दिनों शहर में चुनावी चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। चर्चा जल्दी ही बहस में तब्दील हो जाती है और फिर व्यक्तिगत आरोपों का लंबा सिलसिला चलता है। अंत आते आते मामला बिगड़ जाता है। चर्चा का सबसे बड़ा विषय है कि टिकट किसे मिलेगा। हर व्यक्ति के पास किसी भी नेता के टिकट काटने के दस तर्क मौजूद है। टीवी चैनल पर बैठे लोग जैसी बहस नहीं सकते, उससे ज्यादा जिम्मेदार और प्रभावी बहस यह लोग अपने तर्कों से कर जाते हैं। बात बीकानेर पूर्व और पश्चिम की हो या फिर खाजूवाला, नोखा, डूंगरगढ़ या फिर श्रीकोलायत की। सभी बड़े नेताओं के टिकट पाटे पर आसानी से काट लिए जाते हैं। किस नेता का किससे सीधा संपर्क है, यह नेताजी को पता है या नहीं? पाटे पर बहस कर रहे संभागी को सब पता होता है। किस नेता का बेटा चुनाव लड़ सकता है और किसका पोता तैयारी कर रहा है, इसकी खबर भी पाटे पर सबसे पहले आती है। मजे की बात तो यह है कि कई बार खबरों का पैमाना इतना बड़ा होता है कि वो खुद नेता को अपने तथ्यों के बारे में बताए तो हैरानी में पड़ जाए कि वो इतना बड़ा कब बन गया। दरअसल, जो लोग चुनाव लडऩा चाहते हैं, वो हर हाल में इन चर्चाओं को जारी रखना चाहते हैं। पाटों पर बैठे लोगों में कुछ तो इन्हीं में से हैं। वो कोशिश करते हैं कि सामान हो या ना हो, चर्चा में बने रहना जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्र में भी कई लोग अपने टिकट को लेकर आश्वस्त नहीं है लेकिन दूसरी पार्टी की पंचायती कर रहे हैं। पाटों की राजनीतिक चर्चा से ज्यादा मजबूत चर्चा तो गांवों में हो रही है। छुटभैये नेता भी इन दिनों दोनों पार्टियों के नेताओं को एक दूसरे के खिलाफ बोलकर पूरी तरह से लुत्फ उठा 

रहे हैं।

विपक्षी पार्टी का टिकट बता रहे विधायक

आमतौर पर विधायक अपनी ही पार्टी की पंचायती पूरी तरह से कर ले तो गनीमत समझी जाती है लेकिन बीकानेर के एक विधायकजी तो दूसरी पार्टी की पंचायती करने में भी नंबर वन है। दरअसल, भाजपा के एक विधायक जी को कांग्रेस के दिग्गज नेता पिछले दिनों नई दिल्ली में मिल गए तो उन्हें ज्ञान दे आए कि टिकट तो '***' को ही देना। वो ही एक मात्र विकल्प है आपकी पार्टी का। कांंग्रेस के दिग्गज नेता भी चकित थे कि अपने ही प्रतिद्वंद्वि की तारीफ कर रहा है यह विधायक। हकीकत तो यह है कि विधायकजी को लगता है कि जिसकी तारीफ कर रहे हैं, वो खड़ा होगा तभी मैं आराम से जीत पाऊंगा। इसीलिए...।


ये बेचारा काम का मारा

न सिर्फ वर्तमान सत्तारुढ़ पार्टी भाजपा बल्कि अपने समय में कांग्रेस ने भी कुछ ऐसे लोगों को जोड़कर रखा, जो छोटे बड़े खर्चों के वक्त अपना पर्स आगे बढ़ा देते हैं। चूंकि सत्ता भाजपा की है, इसलिए अधिकांश कामों के लिए भाजपा ने सूची तैयार कर रखी है। कोई भी छोटा-बड़ा नेता आए, खर्च संबंधित व्यक्ति को ही करना होता है। इन दिनों बड़े नेताओं के बीकानेर आगमन का सिलसिला चल पड़ा है तो व्यवस्था संभालने वाले 'प्रमुख कार्यकर्ताओंÓ को ही जिम्मा मिलता है। अब जो 'सेवा' दे रहे हैं, वो भी चाहते हैं कि किसी नए को पकड़ लो, ताकि खर्च आधा आधा हो जाए। यह बात अलग है कि नया आ नहीं रहा और पिछले चार साल से एक ही 'बेचारा' काम आ रहा है। अब संगठन में भले ही कोई बैठा हो खर्च के नाम पर इन चंद लोगों पर ही तलवार लटकती रहती है।


जाति बड़ी चीज है

आने वाले वक्त में आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक पार्टियों से भी ऊपर चला जाएगा। इन दिनों सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के खिलाफ आंदोलन कर रहे अनुसूचित जाति व जन जाति का जमकर विरोध और समर्थन हो रहा है। समर्थन और विरोध करने वालों में अधिकांश नेता अपनी पार्टी लाइन से हटकर आरक्षण की बात कर रहे हैं। मजे की बात है कि दोनों ही प्रमुख पार्टियों के कार्यकर्ता अपनी विचारधारा औरा अब तक के राजनीतिक पार्टी के विचारों को किनारे रखकर आरक्षण का समर्थन और विरोध कर रहा है। इक्का दुक्का नेताओं ने विपरीत धारा में जाकर समर्थन भी किया। सोशल मीडिया पर कांग्रेस और भाजपा के अंतिम पंक्ति के नेता पार्टी के बजाय आरक्षण का विरोध करते नजर आ रहे हैं। इतने ही लोग समर्थन में लामबंद हो रहे हैं।

DNR Reporter

DNR desk

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