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पश्चिम में बदलेगा समीकरण Featured

क्या बीकानेर पश्चिम में भारतीय जनता पार्टी समीकरण बदलने के मूड में है? क्या किसी ऐसे समीकरण पर पार्टी विचार कर सकती है, जिस पर अब तक कोई बड़ा काम नहीं हुआ है। दरअसल, बीकानेर पश्चिम में भाजपा के दावेदारों में एक नाम आता है महावीर रांका का। महावीर रांका नगर विकास न्यास के चैयरमेन है। वर्तमान में बीकानेर पश्चिम विधानसभा सीट पर दोनों ही बड़ी पार्टियां किसी न किसी ब्राह्मण वो भी पुष्करणा को टिकट देती रही है। शहर के भीतरी क्षेत्र में पुष्करणा बाहुल्य होने के कारण माना जाता रहा है कि इस सीट पर पुष्करणा नेता ही जीत सकता है, क्योंकि तीन दशक पहले मानिक चंद सुराना को जीती हुई बाजी में हार देखनी पड़ी थी। हालांकि इसके बाद समीकरण बदल गए, परिसीमन ने इस सीट को सर्वाधिक प्रभावित किया। जो क्षेत्र पहले श्रीकोलायत विधानसभा में आते थे, वो अब बीकानेर पश्चिम का हिस्सा हो गए। जिसमें श्रीगंगाशहर और भीनासर शामिल है। इन दोनों क्षेत्रों में वैश्य और माली समाज का बोलबाला है। वहीं बीकानेर पश्चिम के कुछ हिस्से में पहले से वैश्य समाज के वोट है। माना जा रहा है कि महावीर रांका और उनकी टीम इसी आधार पर बीकानेर पश्चिम से अपनी दावेदारी जता सकती है। भाजपा के एक गुट ने स्वयं टिकट की दावेदारी को प्रमुखता से आगे रखा है और इस गुट को अगर टिकट नहीं मिलता है तो वो रांका का नाम आगे कर सकते हैं। रांका भी इन दिनों शहर के भीतरी क्षेत्र में सक्रियता बढ़ाए हुए हैं। रात-रात भर पाटों पर बैठकर हथाई करने के साथ ही भोजन भी पाटों पर हो रहा है। शहर भाजपा के पूर्व अध्यक्ष रामकिसन आचार्य भी पार्टी से दावेदार है, फिर भी उनका पूरा स्नेह रांका को मिल रहा है। हालांकि 'नेशनल राजस्थानÓ से बातचीत में कहा कि वो टिकट के लिए कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं लेकिन साथ ही यह भी कहा कि पार्टी आदेश करेगी, वो स्वीकार है। टिकट देगी तो लड़ेंगे, नहीं तो दूसरे प्रत्याशी के साथ जुटेंगे।

कांग्रेस के बढ़ गए टिकट दावेदार

हालांकि कांग्रेस के बजाय भाजपा में टिकट दावेदारों की संख्या अधिक है लेकिन कांग्रेस में भी धीरे धीरे टिकट दावेदारों की संख्या बढ़ती जा रही है। बीकानेर की सातों विधानसभा क्षेत्रों में बीकानेर पश्चिम और नोखा को छोड़ दें तो शेष पांचों सीटों पर दावेदारों की संख्या एक दर्जन तक पहुंच रही है। सबसे बड़ी भिडंत खाजूवाला में होने जा रही है, जहां गोविन्दराम मेघवाल के सामने टिकट मांगने वालों की संख्या में वृद्धि हो रही है। नोखा में रामेश्वर डूडी और बीकानेर पश्चिम में बी.डी. कल्ला के सामने में टिकटार्थियों की संख्या कम है। लूणकरनसर में पूर्व गृह राज्य मंत्री वीरेंद्र बेनीवाल और नोखा में मंगलाराम के सामने भी कई लोग टिकट के लिए अंदरखाने कोशिश कर रहे हैं।

युवा चेहरे अभी भी कम

कांग्रेस में युवा चेहरों की कमी अभी भी खल रही है, वहीं भाजपा में टिकट पाने के इच्छुक लोगों में युवाओं की कतार ज्यादा लंबी है। कांगे्रेस में युवाओं का एक बड़ा गुट नोखा विधायक रामेश्वर डूडी के साथ है। स्वयं डूडी नोखा से दावेदार है, ऐसे में उनके सामने कोई भी टिकट पाने की इच्छा नहीं रखता। वहीं दूसरी तरफ भाजपा में युवा चेहरे सर्वाधिक सामने आए हैं। इनमें बीकानेर पश्चिम से अविनाश जोशी सबसे युवा चेहरा है। इसके अलावा लूणकरनसर से डॉ. भागीरथ मूंड भाग्य आजमा रहे हैं। वहीं हनुमान बेनीवाल के साथ राजनीतिक मैदान में उतरे विजयपाल बेनीवाल भी किसी विधानसभा क्षेत्र से भाग्य आजमा सकते हैं। यह दोनों कॉलेज स्तर की राजनीति से निकल आए जनप्रतिनिधि है, जिन्होंने पार्टियां तो अलग अलग चुनी है लेकिन फेन फॉलोविंग दोनों की बेहतर है।

दो युवा नेताओं का अनोखा ब्याह

एक तरफ जहां राजनीति में दिखावा बढ़ गया है। बात बात पर लाखों रुपए खर्च करने वाले युवाओं के बीच बीकानेर में दो नेताओं ने बहुत ही प्रेरणास्पद काम किया है। कुछ महीने पहले भाजपा के युवा चेहरे डॉ. भागीरथ मूंड ने अपने विवाह में दहेज तो दूर सामान्य खर्चों पर भी पूरी तरह लगाम लगा दी। बहुत ही साधारण परिवेश में शादी करके डॉ. भागीरथ ने जहां युवाओं को प्रेरित करने वाला काम किया, वहीं हनुमान बेनीवाल के साथ जुड़े विजयपाल बेनीवाल ने कुछ दिन पूर्व ही अपने विवाह में ऐसी ही सादगी दिखाई। विवाह में आने वाले लोगों को पेड़ पौधे लगाने के लिए प्रेरित किया गया। इतना ही नहीं कुछ रीति रिवाज में तो पौधे लगाने का ही संकल्प लिया गया। उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर विवाह के उपलक्ष्य में न सिर्फ पौधारोपण करवाया बल्कि इन पौधों को पेड़ के रूप में बड़ा करने के लिए तमाम व्यवस्थाओं को भी पुख्ता किया है। बीकानेर के इन दो चेहरों को देखकर लगता है कि राजनीति में सुधार का दौर जारी है। अब इन दो चेहरों को देखकर ही अन्य को सीख लेनी चाहिए। न सिर्फ राजनीति में बल्कि सामाजिक रूप से भी स्वयं को इतना सुदृढ़ बनाया जाना चाहिए कि आने वाली पीढिय़ां उनका उदाहरण दे सके। राजनीति को जो लोग आय का माध्यम समझते हैं, उन्हें सामाजिक उदाहरण भी पेश करने चाहिए। यहां तक कि राजनीतिक दलों को भी ऐसे लोगों को प्रोत्साहित करना चाहिए। दागी नेताओं को टिकट देने के बजाय ऐसे सामाजिक काम करने वाले नेताओं को किसी ने किसी तरह लाभान्वित करना चाहिए ताकि आने वाली पीढिय़ां भी सामाजिक सरोकारों के साथ आगे बढ़ती हुई नजर आए, न कि गुंडागर्दी और अवसरवादिता के कारण पहचानी जाए।

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