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बीकानेरी राजनीति - 'चप्पल' खोलने की तैयारी Featured

अनुराग हर्ष. बीकानेर। जब कोई व्यक्ति चप्पल पहनकर आपके आगे चल रहा है और आप पीछे हैं तो उसकी चप्पल के पिछले हिस्से पर बस एक बार पैर रख दें। उसकी चप्पल खुल जाएगी, वो उसे फिर से पहनने में उलझ जाएगा और आप तब तक चंद कदम आगे बढ़ सकते हैं। राजनीति में भी कुछ ऐसा ही होता है। खुद से आगे चल रहे नेताजी की चप्पल खोलने के लिए जैसे पूरी ताकत झौंक दी जाती है। ऐसा कुछ करने का प्रयास किया जाता है कि बड़े नेताजी वहां उलझ जाएं और पीछे वाले आगे आ जाएं। बीकानेर में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है, बड़े नेताओं की सीट पर कब्जा करने के लिए कई लोग तैयार हो गए हैं। यह बात अलग है कि वरिष्ठ नेताओं ने खूंटा इतना पक्का बांध रखा है कि जोर लगाने से भी हिल नहीं रहा है। न सिर्फ पीछे वाले नेताओं से हिल पा रहा है और न उनका साथ देने वालों की कोशिशें सफल हो पा रही है। लूणकरनसर में अर्से से राजनीति में जमे मानिकचंद सुराना की जगह लेने की कोशिश तो कई युवा नेता कर रहे हैं लेकिन उनकी दृढ़ता और समझ के आसपास भी नए नेता नहीं है। सुराना भले ही इस बार निर्दलीय उम्मीदवार है लेकिन भाजपा में टिकट पाने वाले भी उन्हें अपना मूल प्रतिद्वंद्वी मानकर चल रहे हैं। इसी तरह से श्रीडूंगरगढ़ में किशनाराम नाई का कोई विकल्प भाजपा को नहीं मिल पा रहा। यहां भी कुछ नए नेता जोर लगा रहे हैं लेकिन टिकट रास्ता एक बार फिर किसनाराम नाई की ओर से होकर ही जाएगा। ठीक इसी तरह बीकानेर पश्चिम में गोपाल जोशी भाजपा के विधायक है। उम्र के हिसाब से उन्हें टिकट मिलने की संभावनाओं पर सवाल उठ रहे हैं लेकिन युवा दावेदार आज भी मानते हैं कि अंतिम समय में कुछ भी हो सकता है। कमोबेश ऐसे ही हालात कांग्रेस में भी है। जहां पुराने नेताओं की जगह नए दावेदार तो आ रहे हैं लेकिन पुराने नेताओं की धाक अभी कायम है।

भीड़ जुटाने का काम पहली बार

अब तक प्रशासन के पास भीड़ को तीतर बितर करने का काम रहा है लेकिन पहली बार इनके पास भीड़ जुटाने का काम आ गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जयपुर में हुई सभा के लिए बीकानेर से भीड़ भेजने का काम इस बार पार्टी कार्यकर्ताओं पर नहीं था। पूरी सरकारी मशीनरी जुटी हुई थी, लाभार्थियों की तलाश करने में। जैसे-जैसे लोग मिलते गए, वैसे-वैसे उनके लिए बसों की व्यवस्था होती रही। आमतौर पर चुनावी सभाओं में पार्टी कार्यकर्ताओं की जेब से ही धन लगता है लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। सरकारी कार्यक्रम की ओट में बसों की सुविधा आसानी से मिल गई। पहली बार ऐसा हुआ कि बड़े नेता तो रात को जयपुर पहुंच गए और प्रशासनिक अधिकारी देर रात तक लोगों को भेजने में जुटे रहे।

बिना विचार की राजनीति

यह राजनीति का नियम है कि यहां करता कोई है और भरता कोई ओर है। किसी भी राजनीतिक घटना का सभी अपने हिसाब से विश्लेषण करते हैं। फिर इन घटनाओं पर मिर्च मसाला लगाकर अपने अपने हिसाब से सोशल मीडिया पर चलाते हैं, सामाजिक मंच पर मामले को रखते हैं ताकि उसका लाभ उठाया जा सके या फिर किसी को हानि पहुंचाई जा सके। पिछले दिनों बीकानेर में हुए एक राजनीतिक घटनाक्रम को लेकर भी ऐसा ही हो रहा है। जो वरिष्ठ नेता इस पूरे घटनाक्रम के आसपास भी नहीं थे, उसी नेता पर आरोप लगाए जा रहे हैं। दरअसल, राजनीति का यह उसूल बन गया है कि यहां सच बोलना ही नहीं होता, अगर कोई सच सामने आता भी है तो उसे नजरअंदाज करके अपने स्तर पर अपने हिसाब से पेश करना होता है। यह बात अलग है कि नेताओं को यह समझ ही नहीं आता कि सच को छिपाकर वो न सिर्फ पार्टी का बल्कि स्वयं का भी नुकसान करते हैं। राजनीतिक विचारधारा की लड़ाई ही राजनीति होती है लेकिन इन दिनों व्यक्तिगत राग और द्वेष का हिसाब किताब करना राजनीति हो गया है। एक विचारधारा लोग अब शायद पार्टियों में भी नहीं रह गए हैं, सभी को अपने हित साधने होते हैं। इन्हीं हितों को साधने के लिए वोर राजनीति में आते हैं और उनकी पूर्ति करने के लिए ही सच को झूठ और झूठ को सच बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते हैं। यह समझ आना चाहिए कि वो जिस विचारधारा के लिए लड़ रहे हैं, वो महत्वपूर्ण है न कि व्यक्तिगत लाभ और हानि। जब विचारधारा सत्ता में आती है तो छोटे-बड़े कई हित साध लिए जाते हैं। बात कांग्रेस की हो या फिर भाजपा की, विचारधारा को जीवित रखना जरूरी है।

युवाओं की बड़ी भूमिका

इस बार चुनाव में न सिर्फ प्रत्याशी के रूप में युवा सामने आ रहे हैं बल्कि वोटर्स के रूप में भी युवाओं की संख्या में जबर्दस्त बढ़ोतरी हुई है। यह वृद्धि बीकानेर की सातों विधानसभा सीटों पर देखने को मिल रही है। एक अनुमान के मुताबिक प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में करीब दस से पंद्रह हजार नए मतदाता तो जुड़ चुके हैं, वहीं नए मतदाताओं की संख्या में अभी नवंबर तक वृद्धि हो सकती है। पहली बार मतदान करने वाले युवाओं को अगले डेढ़ साल में न सिर्फ प्रदेश की सरकार चुननी है बल्कि इसके बाद देश की सरकार भी उन्हें चुननी होगी। इसके बाद स्थानीय निकाय के चुनाव भी होने हैं। युवाओं को राजनीति के प्रति सचेत करने के लिए भी सामाजिक संगठनों को विचार मंच तैयार करना चाहिए, ताकि हम व्यक्ति को नहीं बल्कि व्यवस्था में युवाओं को हिस्सा बना सकें।

Last modified onMonday, 09 July 2018 10:01
DNR Reporter

DNR desk

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