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बीकानेर - यह जानबूझकर की गई 'गलती' तो नहीं? Featured

नेता गिरी - अनुराग हर्ष। पिछले दिनों अंत्योदय रेल शुरू करने के मौके पर रेलवे की ओर से वितरित किए गए आमंत्रण पत्र इन दिनों चर्चा का विषय बने हुए हैं। दरअसल, रेलवे के कार्ड में बीकानेर पूर्व की विधायक सिद्धि कुमारी का नाम था लेकिन बीकानेर पश्चिम के विधायक गोपालकृष्ण जोशी का नाम नहीं था। इतना ही नहीं संसदीय सचिव डॉ. विश्वनाथ मेघवाल का नाम भी गायब था। हालांकि स्वयं विधायक गोपाल जोशी ने अब तक इस मामले में कोई नाराजगी जाहिर नहीं की है लेकिन बीकानेर पश्चिम के मतदाता जरूर रेलवे की इस गलती से नाराज है। माना जा रहा है कि रेलवे का यह कार्ड भाजपा की राजनीति को दर्शा रहा है। कार्ड में सिर्फ बीकानेर पूर्व की विधायक सिद्धि कुमारी का नाम दिया गया, जो स्वयं इस कार्यक्रम में पहुंची ही नहीं। शायद यह पहले से तय था कि सिद्धि कुमारी कार्यक्रम में नहीं होगी। जो आ सकते थे, उनका नाम नहीं दिया। न सिर्फ गोपाल जोशी बल्कि नगर विकास न्यास के चैयरमेन महावीर रांका को भी कार्यक्रम से किनारे रखा गया। दोनों के नाम अगर कार्ड में होते तो दोनों निश्चित रूप से पहुंच जाते। 

वैसे भाजपा को इस कार्यक्रम से अलग नहीं रखा गया। मंच पर जनता के प्रतिनिधि यानी विधायक भले ही नहीं थे लेकिन पार्टी के प्रतिनिधि यानी जिलाध्यक्ष दोनों मौजूद थे। कार्यक्रम भले ही सरकारी था लेकिन पार्टी के पदाधिकारियों को मंच मिल गया।
दरअसल, राजनीति में ऐसा चलता है। अपनो को खुश रखने का सिलसिला और दूसरों को नीचे दिखाने की कोशिश। इसके बाद भी यह ध्यान रखना ही चाहिए कि जनता के प्रतिनिधि का ही अगर अपमान होगा तो उस राज में जनता का मान और सम्मान कैसे हो सकता है? जिनका अपमान हुआ है, उन्हें भी इस बारे में 'संज्ञान' लेना चाहिए था क्योंकि मामला सिर्फ उन तक सीमित नहीं था।

यह कैसी हो रही है राजनीति

यह पहला अवसर नहीं है जब पार्टी के विधायकों की अनदेखी हुई है। इससे पूर्व में भी अपनो की अनदेखी का चलता आ रहा सिलसिला राजनीति में कोई नया नहीं है। बात करें शिलान्या की या फिर विकास कार्यों के लोकार्पण की। उसमें भूल से रह गया हो या फिर जानबूझ कर गलती माने। क्षेत्र के विधायक को बुलाना तक मुनासबि नहीं समझ रहे है। जबकि विधानसभा में अपने हो या पराए दोनों ही एक-दूसरे के आमने-सामने होते है। बरहाल पार्टी की बात करें या पार्टी पदाधिकारियों की। वे चाहे भले ही जानबूझकर की गई इन छोटी-छोटी गल्तियों को चाहे भले ही नजर अंदाज कर दें, किंतु जनप्रतिनिधियों से जुड़े कार्यकर्ता तथा जनता छोटी से छोटी बात को भी गंभीरता से लेती है।

रिपोर्ट कार्ड में कौन आगे

चार वर्षों तक चाहे भले ही पार्टियां अपने विधायकों तथा उनके द्वारा किए गए कार्यों का संज्ञान न लें, लेकिन जब बात अंतिम व चुनावी वर्ष की आती है तो पार्टियां अपने विधायकों के रिपोर्ट कार्ड के आधार पर उनके कार्यों का मूल्यांकन व आंकलन करने लग जाती है। यहीं नहीं चुनाव में उनकी भूमिका तथा टिकट भी रिपोर्ट कार्ड के आधार पर तय होता है। यदि सरकार में हो या फिर विपक्ष में। पार्टियां यदि वर्ष में कम से कम एक बार अपने-अपने क्षेत्र के विधायकों की क्लास लें तथा उनकी ओर से पार्टी तथा जनहित में किए जा रहे कार्यों के बारे में सुध लें तो उसका ही फायदा पार्टियों, जनप्रतिनिधियों को मिलेगा, बल्कि जनता को भी होने वाले विकास कार्यों का समुचित लाभ मिल सकेगा। किंतु बात करें पहले वर्ष की तो पूरा साल जीत के जश्न में ही समाप्त हो जाता है। दूसरा वर्ष क्षेत्र में घूम-फिरकर उसके समझने तथा वोटरों की नब्ज टटोलने में बीत रहा है। तीसरे वर्ष में जब थोड़ा बहुत काम शुरू होता है। तब तक एक-दूसरे की टांग खिंचाई शुरू हो जाती है। इतने में चौथा साल भी निकल जाता है। ऐसे में पांचवा एवं कार्यकाल का अंतिम वर्ष चुनाव से होता है। जिसमें पार्टियों को ही नहीं जनप्रतिनिधियों को भी अपना कदम फंूक-फूंक कर रखना होता है। ऐसे में जनता की सुध लेने की फुर्सत तक नहीं मिलती। फिर भला रिपोर्ट कार्ड कैसा? पार्टियां तथा जनप्रतिनिधि कैसे और कौनसे रिपोर्ट कार्ड की बात कर रहे है। यह तो समझ से परे है, किंतु इतना जरूर है कि जनता से तीन-चार साल तक दूर रहने वाले जनप्रतिनिधियों को इन दिनों फुर्सत ही फुर्सत है। वे जनता के बीच पहुंचने तथा अपनी पार्टियों की रीति-नीति, कार्यों तथा उपलब्धियां गिनवाने से नहीं थक रहे है।

कौन कितना नजदीक?

स्थानीय राजनीति को यदि एक बारगी दरकिनार कर दिया जाएं तो चार साल नदारद रहने वाले कार्यकर्ता तथा नए-नए चेहरे नजर आने लगे है। वे हर तरह से चर्चा में रहना चाह रहे है। वे चाहते है कि उनकी चर्चा हो। ताकि चुनाव की राह उनकी आसान हो जाएं। चुनाव की बात करें तो इन दिनों हर कोई टिकट की दौड़ में शामिल हो रहा है। इनमें से कई चेहरे तो न पहले दिखे है और न ही दिखाए गए है। वे भी बढ़-चढ़कर सक्रिय राजनीति का हिस्सा बनने से पीछे नहीं रह रहे है। जुगाड़ बिठाने की राजनीति भी गर्माने लगी है। कौन शीर्ष नेताओं या टिकट वितरण करने वाले आकाओं के नजदीक है। इसकी जानकारी जुटाने तथा जुगाड़ बिठाने में मशगूल नजर आ रहे है। आने वाले विधानसभा चुनाव में किसकी टिकट पक्की होगी, किसकी कटेगी ऐसे कयास भी लगाए जा रहे है।

DNR Reporter

DNR desk

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