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साहित्य सरोकार (हरीश बी शर्मा) (6)

साहित्य समाज में भी है वर्ण-व्यवस्था

साहित्य में संभ्रांत या मुख्यधारा के साहित्यकार की श्रेणियों का आविष्कार वैसा ही है, जैसे समाज में वर्ण-व्यवस्था या साफ शब्दों में कहें तो ऊंच-नीच और इसी के चलते जब कुछ अनपढ़ या कम पढ़े हुए बहुत अच्छा लिख गए तो यहां तक कहा गया कि संभवतया इन्हें खुद को पता नहीं है कि इन्होंने कितना अच्छा लिख दिया है। यह व्यक्ति पर फब्ती थी। समझ पर संशय था। यह इस बात को जताने की चेष्टा थी कि सही तरीके से शिक्षा-दीक्षा या ज्ञानार्जन के बगैर साहित्य रचना संभव तो है लेकिन यह संदिग्ध है कि जो रचा जा रहा है, उसके प्रभाव और क्षमता से खुद रचनाकार भी परिचित भी है या नहीं। और इस तरह से साहित्य शिक्षाविदों, जानकारों और समझदारों का हो गया। 

यह बात स्थापित हो गई कि जो कहा जाए, उसके प्रभावों का ज्ञान होना चाहिए और जो पढ़ा जाए, उसे एक नए तरीके से समझने-समझाने की क्षमता भी रचनाकार में होनी चाहिए। उसकी बात में एक चमत्कृति होनी चाहिए। भले ही इस चमत्कार को समझने वाले बहुत कम हो लेकिन बात का वजन बढ़ा-चढ़ा होना चाहिए। इस वजह से एक तरफ जहां पांडित्यपूर्ण साहित्य की रचना होने लगी। गूढ़ार्थी कविताएं लिखी जाने लगी। लालित्यपूर्ण गद्य रचा जाने लगा और इसी आधार पर समालोचना और आलोचनाएं होने लगी। यही वह दौर था जब एक बड़ा हादसा यह हुआ कि आलोचना को बुराई माना जाने लगा। कोई शब्द किस तरह से कुछ भ्रांतियों की वजह से अपना अस्तित्व खो सकता है, आलोचना शब्द के साथ हुए हादसे से जाना-पहचाना जा सकता है।
आलोचना शब्द लोचन यानी आंखों से बना है, जिसका अर्थ समग्र दृष्टि से है। नए संदर्भ में बात करें तो तीन सौ साठ डिग्री पर कसा हुआ विवेचन। इस के तहत समीक्ष्य कृति की विधा के परिप्रेक्ष्य में जांच होती और समीक्षक अपनी बात कहता। यह बात जैसे-जैसे बुरी लगने लगी, आलोचना का अर्थ भी बुराई से लिया जाने लगा। हालांकि इसके लिए जिम्मेदार तत्कालीन वाद या विचार हैं। पंडितों ने विधा की अपनी दृष्टि से समीक्षा की जबकि समग्र दृष्टि से बात होनी चाहिए थी और यहीं से आलोचना शब्द का अर्थ बदलने लगा। बदले हुए अर्थ पर मुहर तब लग गई जब समीक्ष्य कृति को आम जन में तो स्वीकृति मिली लेकिन समीक्षकों से नहीं।
इसका बहुत बड़ा उदाहरण हमें रामचरित मानस लिखने वाले गोस्वामी तुलसीदास के प्रसंग से मिलता है कि एक बार वे ऐसे हताश हुए कि मानस की पांडुलिपि को पानी में बहाने का विचार तक कर लिया। तुलसीदास की पांडुलिपि तो बच गई लेकिन जाने कितनी पांडुलिपियां संभ्र्रांत और मुख्यधारा के साहित्य के काबिल नहीं होने की वजह से वक्त के प्रवाह में बह गई और बाद में कभी बरामद नहीं हो सकी।
हालांकि, इसका एक अच्छा प्रभाव यह पड़ा कि कुछ वाद और विचार के स्तर पर बड़ा काम हुआ। बहुत सारे पंडितों ने एकराय होकर वाद और विचारों पर बड़ा काम करते हुए सम्प्रदाय तक खड़ा किया। अपनी बात को रखने के लिए न सिर्फ वाद आधारित चिंतन हुआ बल्कि सृजन भी हुआ। एक कवि हुए मम्मट। उनके समय का एक किस्सा जो बहुत ही चाव से आज भी खराब-कविता को खराब नहीं कहने की एवज में सुनाया जाता है। यह किस्सा कुछ इस तरह है कि मम्मट के पास एक युवक अपनी कविताओं की पांडुलिपि लेकर पहुंचा और बोला कि इसमें आवश्यक सुधार बता दीजिए। मम्मट ने वह पांडुलिपि रख ली और कुछ दिन बाद आने के लिए कहा। कुछ दिन बाद युवक आया तो उसे देखते ही मम्मट उसकी ओर दौड़े और उसे अपनी बाहों में भरते हुए कहा कि जो काम मैं पिछले कई सालों में नहीं कर सका, वह तुमने इस पांडुलिपि में कर दिया। यह सुनकर युवक उत्साह में भरकर पूछा, 'वह कैसे आदरणीय?Ó
मम्मट ने कहा, 'मैं एक ऐसी कृति रचना चाहता था, जिसमें सभी तरह के काव्यदोष हों, तुमने यह पांडुलिपि ऐसी बनाई है कि अब मुझे काव्यदोष बताने के लिए किसी भी तरह के दूसरे उदाहरणों की जरूरत ही नहीं है!Ó
यह एक उदाहरण है, जिससे यह पता चलता है कि साहित्य के पंडित सृजन को लेकर कितने सजग रहते थे और सृजन कैसा होना चाहिए, इस पर निरंतर बात करते रहते थे। इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि कहने का अधिकार उसी को मिला जिसके पास समझ है और समझ का पैरामीटर भी श्रेष्ठ स्तर पर भाषा और व्याकरण की शिक्षा-दीक्षा स्थापित किया गया। ऐसे में वर्तनी को नहीं समझने वाले, शब्द के प्रभावों से अनभिज्ञ और अभिधा-व्यंजना की ताकत से बचकर मध्यममार्ग तलाशने वाले कभी भी संभ्रांत या मुख्यधारा के रचनाकार नहीं बन सके। बहुत हद तक यह सही भी था लेकिन धीरे-धीरे इन सभी का रूप-स्वरूप बिगडऩे लगा और कालांतर में हम देखते हैं कि वाद का पूरी तरह से राजनीतिकरण हो चुका है तो विमर्श के नाम पर नित-नए नाम सामने आ रहे हैं। इनका सबसे अधिक बिगड़ा हुआ स्वरूप लॉबियों से पहचाना जाता है, जिसके उदाहरण भारत भवन से लेकर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और साहित्य अकादमियों तो इधर लिटरेचर फेस्टीवल और जश्ने-रेखता तक बिखरे हैं।

दरबारों-हवेलियों से होते हुए...

समाज में सृजनधर्मियों का सम्मान सदैव होता रहा है। पहले राजदरबारों में कवियों-शायरों का सम्मान होता था। फिर यह जिम्मेदारी सेठ-साहूकारों ने उठा ली। बीकानेर में दसेक साल पहले ही रामपुरिया हवेली में साहित्यकार सम्मान की परंपरा बंद हुई है। सन् 2000 से पहले सक्रिय साहित्यकारों के पास आज भी हवेली से मिली स्वेटर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मिल जाएगी। शब्द-ऋषि सम्मान भी होता था। राजा-महाराजा गए और सेठ साहूकार भी थक गए तो संस्थाओं ने यह भार उठाया। लिहाजा, जाते साल तीन सम्मान समारोह की सूचना है, एक हो चुका। डूंगर कॉलेज में उर्दू विभागाध्यक्ष डॉ. मोहम्मद हुसैन की सरपरस्ती में एक संस्था बनी है-बज्में फिक्रो फन। इस संस्था की ओर से आनंद निकेतन में बीते रविवार पांच साहित्यकारों का सम्मान हुआ। टोंक के शायर डॉ.अरशद अब्दुल हमीद को गालिब अवार्ड दिया गया। आबिद हसन को शेख निसार अहमद निसार अवार्ड, अल्ला बख्श साहिल को शेख मोहम्मद इब्राहिम अवार्ड और अल्लाबख्श सर्वा तथा अमीनुद्दीन शौकजामी को बेदिल अवार्ड से नवाजा गया। अब प्रेरणा प्रतिष्ठान डॉ.उषाकिरण सोनी को सुंदर सुरभि सम्मान, राजेंद्र जोशी को राजरत्न सम्मान और डॉ.गौरव बिस्सा अमरकीर्ति सम्मान प्रदान करेगी। यह संस्था वरिष्ठ कवि भवानीशंकर व्यास 'विनोदÓ के निर्देशन में चल रही है। इस बीच कथाकार नदीम अहमद नदीम और शायर वली मोहम्मद गौरी के प्रयासों से प्रारंभ हुए शहीद अशफाकउल्ला खां सम्मान से विभूषित होने वाले साहित्यकारों की सूची भी जारी हो गई है। हिंदी साहित्य के लिए बुलाकी शर्मा, राजस्थानी साहित्य के लिए मोनिका गौड़ और उर्दू साहित्य के लिए जियाउलहसन कादरी सहित रंगकर्म हेतु सुरेश हिंदुस्तानी, समाजसेवा के क्षेत्र में हीरालाल हर्ष और पत्रकारिता के लिए इसरार हसन कादरी को सम्मानित किया जाएगा।

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रचना के पीछे चलती है आलोचना

अगर कोई आलोचक किसी विधा में रचना भी करता है तो क्या वह इस बात की घोषणा कर सकता है कि उसने जो रचा है, वह उस विधा का आदर्श और कालजयी स्वरूप है। समीक्षा, आलोचना, समालोचना थोड़े-बहुत अंतरों के साथ लगभग एक ही जगह पर आकर खड़े हो जाते हैं। आलोचना वस्तुत: रचना पर आश्रित विधा है। रचना के बगैर आलोचना का अस्तित्व ही नहीं। साहित्य में इस विधा की सृष्टि उन लोगों के लिए हुई जो नीर-क्षीर विवेक के साथ, तटस्थ रहते हुए शास्त्रीय आधार पर अपनी बात को रखना जानते हैं। परंपरा का ज्ञान हो, प्रयोगों की पहचान हो और जिस विधा में आलोचना करे, उसके शास्त्रीय पक्ष से जान-पहचान हों। भाषा की दक्षता के साथ-साथ वर्तनी की शुद्धता का पता हो और सबसे महत्वपूर्ण बात नवाचारों को समझने की सकारात्मक दृष्टि हो। 

इन सब के अभाव में आलोचना, समीक्षा और समालोचना के नाम पर जो भी हो रहा है, वह पत्रवाचन की सीमा से बाहर नहीं निकल पाता। आलोचना वही कर सकता है, जो निर्भय लेकिन न्यायसंगत हो। ऐसा विद्वान जिसे अपनी बात विनम्रता से कहनी आती हो, आलोचना के क्षेत्र में प्रिय हो जाता है। ऐसा नहीं होने की स्थिति में भले ही कोई आलोचक स्वयं को खारा या क्रूर साबित करने की कोशिश करता रहे, उसे जन-मन में मान्यता नहीं मिलती। एक आलोचक के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती होती है कि वह जन-मन की मान्यता को साथ लेकर अपनी बात कहे।
जैसे ही कोई आलोचक जन-मन को अल्पज्ञ या नासमझ मानकर अपनी बात के साथ हावी होने की कोशिश करता है, उसका जलवा बिखरने लगता है। यहां जन-कवि भीम पांडिया की एक बात बड़ी गहरी लेकिन समीचीन मालूम होती है। वे अपनी बात को रोचक अंदाज में ऐसे कहते थे कि रवि का प्रकाश लेने वाले सारे कवि हैं। जैसे ही कोई यह सुनता, दो प्रतिक्रियाएं होती। पहली बात में उसे लगता कि यह तुकबंदी के अलावा कुछ नहीं है, दूसरा इस बात पर मंथन होता कि एक जिम्मेदार कवि अगर यह कह रहा है तो कुछ न कुछ तो बात होगी है।
भीम पांडिया समझाते कि जो जीव है, प्राणी है उसमें कवित्व इस रूप में है कि वह बात को समझ सकता है, कहने की कला भले ही नहीं आए लेकिन कवि सम्मेलन में अंतिम-छोर पर बैठा कोई सामान्य सा श्रोता अगर किसी कवि की कविता पर वाह-वाह करता है तो यह अकारण नहीं है। इसका कारण यह है कि उसके पास समझ है, संवेदना है, अनुभूति है लेकिन अभिव्यक्ति के मामले में वह मंच पर बैठे कवि से कमजोर है। इस रूप में रवि का प्रकाश लेने वाले सारे कवि हुए।
भीम पांडिया से असहमत होने का अधिकार ठीक वैसा ही है, जैसा कोई उनसे सहमत होने में अपना अधिकार माने, लेकिन उनकी बात को खारिज नहीं किया जा सकता। समझदार होने का हक सभी को है। सहमत-असहमत होने का अधिकार सभी के पास है। ऐसे में एक आलोचक के सामने यह चुनौती होती है कि वह किस तरह सभी लोगों के ग्रहण करने के तरीके को समझते हुए अपनी बात को रखे। इसके लिए ्रएक तरफ जहां आलोचक को जन-मन की बात को समझने के लिए एक दृष्टिबोध चाहिए होता है तो दूसरी ओर, जिस विधा में वह अपनी बात कह रहा है, उसमें अब तक हुए प्रतिनिधि रचनाकारों से भी परिचित होना जरूरी होता है। यहां यह उल्लेखनीय है कि अधिकांश वाद-विचार या सम्प्रदायों की स्थापना में आलोचकों का ही बड़ा योगदान रहा है। रचनाकार ने तो अपनी बात कह दी। उसे एक दृष्टिबोध के साथ समझते हुए उसे श्रेणियों में समझाने का काम आलोचक ने ही किया। कोई भी रचनाकार अव्वल तो किसी वाद-विचार या विमर्श के खाके खड़े करके रचना कर ही नहीं सकता। अगर वह करता भी है तो वह रचनाकार के नाते सबसे पहले खारिज होता है और राजनीति का हथियार भर बनकर रह जाता है।
फिर रचनाकार तो यह घोषणा भी कर सकता है कि उसकी कोई रचना किस वाद-विचार या विमर्श से प्रेरित है, उसे नहीं पता लेकिन आलोचक यह नहीं कह सकता कि उसे किसी रचना-विधान के मूल-सूत्रों की जानकारी नहीं है। वह किसी भी रचनाकार को इस तरह खारिज नहीं कर सकता कि फलां रचनाएं अच्छी है और फलां बेकार। यह तो सामान्य समझ वाला श्रोता भी कर सकता है। आलोचक के सामने अच्छी को अच्छी साबित करने की चुनौती होती है तो खराब को खराब साबित करने का साहस। बहुत सारे आलोचकों ने ऐसा किया भी है और उन्हें मान्यता भी मिली है, लेकिन कमी के कारण यहां भी पक्षपात होने लगा है।
अपनों को प्रतिष्ठा दिलाने और जानबूझकर आंखें बंद करके किसी और को समानांतर खड़ा करने की कोशिश की जाने लगी। यही वजह है कि आलोचना अस्वीकार होने लगी है। इससे जो प्रतिरोध का स्वर उभर रहा है, उसका हासिल यह है कि ऐसे आलोचकों को तो पूरी तरह से खारिज किया जाने लगा है जो खुद भी उसी विधा में सृजनरत हैं। वस्तुत: आलोचना का काम रचनाकारों का कभी रहा ही नहीं। आलोचना का अपना एक शास्त्र है, सिद्धांत है। रचनाकर्म से बहुत बाद की बल्कि रचना पर आश्रित विधा है आलोचना।

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कलाओं का कोलाज है नाटक

नाट्य-कर्म कलाओं का कोलाज है। यहां संगीत, नृत्य, गायन, वादन, चित्र और काव्य का एक ऐसा मंडल बनता है जो दर्शकों को भाव-विभोर करने की क्षमता रखे। इसी लिए नाट्य-मंडली या रंग-मंडल जैसे शब्द प्रचलन में आए। एक ऐसा वातावरण जहां सभी कलाओं के ज्ञाता हों और एक दिशा में चलने के अभ्यस्त हों। ध्येय एक हो, नाटक खेलना। वस्तुत: यह खुद को साधने की कला होती है और समस्त कलाएं मंच के इस साधक को ऊर्जावान बनाए रखने के लिए होती है। इसीलिए नाटक को अभिनेता का माध्यम कहा गया है। अभिनेता नाटक का वह चेहरा होता है, जिसके बूते पूरा परिदृश्य अभिव्यक्त होता है और हम देखते हैं कि बहुत सारे नाटक अपने पात्रों की वजह से सदियों तक याद रखे जाते हैं। बहुत सारे नाटकों के निर्देशक तो क्या लेखकों के नाम भी याद नहीं रहते लेकिन उनके पात्रों का नाम याद रहता है। थैंक यू मिस्टर ग्लाड, अंधायुग, तुगलक, भोमा, कोर्ट मार्शल, सखाराम बाइंडर, अजातघर, खबसूरत बहू, बिन बाती के दीप, आत्मकथा, तीडोराव और ऐसे ही कई नाटक अपने पात्रों की वजह से, अभिनेता की वजह से पहचाने गए।

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अभिनेता का माध्यम है नाटक...

तीन दिन नई दिल्ली में नाट्य समारोह में शिरकत करके लौटे हरीश बता रहे हैं कि दौड़ती-भागती जिंदगी और दुष्कर्म के लिए बदनाम दिल्ली में सृजनात्मकता के आयाम आशा जगाते हैं। - सं


अभी नई दिल्ली के मंडी हाउस को एक बार फिर नये सिरे से देखने का मौका मिला। नई दिल्ली का यह इलाका कला-साहित्य के नाम आरक्षित है। इधर से आपको तानसेन मार्ग निकलता दिखाई देगा तो सफदर हाशमी की याद में भी एक रास्ता जाता है। कला-साहित्य के नाम पर होने वाली अधिकांश केंद्रीय गतिविधियों का यही संकुल है। साहित्य अकादेमी, एनएसडी, श्रीराम सेंटर और फिर एक पंगत में विभिन्न राज्यों के नाम से बने हुए भवन और वहां राज्यों की संस्कृति के साथ-साथ सुस्वादु भोजन का भी प्रबंध। दौड़ती-भागती जिंदगी के लिए बदनाम हो रही दिल्ली में यह जगह एक उदाहरण है कि दिल्ली में अभी भी सृजनात्मकता बाकी है और इससे भी आगे कि बात जब देश के दूसरे शहरों में कला-साहित्य संबंधी विषय अधेड़ से प्रौढ़ होती पीढ़ी के हो गए हैं तो यहां आपको औसत 25 से 30 साल के युवा मिलेंगे जो पेशेवर रंगकर्मी बन चुके हैं। छोटे-छोटे ग्रुप बना चुके हैं। नाटक करते हैं और यहां तक की अपना एक दर्शक वर्ग बना चुके हैं। वे दावा करते हैं कि हमारी अपनी ऑडियंस है।
श्रीराम सेंटर में शो शुरू होने से पहले टिकट के लिए लाइन लगती है और प्रवेश भी लाइन से होता है। मोहन राकेश सम्मान समारोह में चयनित चार नाटकों में से तीन को देखने का मौका मिला और जानकार आश्चर्य हुआ कि धनतेरस पर भी हॉल खचाखच भरा हुआ था। सीट नहीं मिली तो दर्शक जमीन पर बैठे थे। यह एक दिन की बात नहीं है। यह निरंतर और निराश हुए बगैर काम करने का नतीजा है और इससे भी अधिक सोचना चाहें तो यह किसी एक प्रस्तुति के असफल होने से अवसाद में आने की बजाय अगली प्रस्तुति को और अधिक बेहतर-प्रभावी बनाने का संकल्प है, जिसका आदि सूत्र 'शो मस्ट गो ऑनÓ में छिपा है।
और यह सब सेवा में नहीं है। स्वांत: सुखाय नहीं है। अर्थयुक्त है। पैसे से जुड़ा मसला है। अच्छे रंगकर्मी के लिए काम की कमी नहीं है। समयबद्ध तरीके से किसी प्रोजेक्ट पर काम शुरू होता है और रंगकर्मियों का उसी के आधार पर भुगतान भी होता है। लेखक को भी नाट्यमंचन की रॉयल्टी मिलती है। मुझे तब हैरानी हुई जब मैंने देखा कि श्रीराम सेंटर के बाहर जमीन पर किताब बेचने वाली महिला पोयट्री और कॉमेडी ड्रामा मांगने पर न सिर्फ नाट्यकृतियों की पूरी फेहरिस्त गिना रही थी बल्कि यह समझाने में भी सक्षम थी कि कौनसा नाटक कितनी बार हुआ है या अब तक एक भी मंचन नहीं हुआ है।

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कह दिया, जो कविता को कहना था...

मेरी बात कविता के एक बड़े पाठक की उस जिज्ञासा से शुरू होती है, जब वह अपनी पसंद के एक कवि को पढ़ते हुए उसमें रीपीटेशन की शिकायत एक अन्य कवि से करते हुए अपना सवाल रखते हैं। पाठक को जवाब मिलता है कि तुम ठीक कह रहे हो। फलां कवि खुद की कविताओं में अपने पहले कहे हुए को ही रीपीट कर रहा है, क्योंकि अब कविता के माध्यम से कुछ कहा जाना शेष नहीं रहा है। कविता के माध्यम से जो कुछ कहा जाना था, वह कह दिया गया है। अब तो सिर्फ तरीका है कि आप अपनी बात को कैसे कहते हैं। इन दो विद्वानों के बीच हुई बात मुझे तुरंत पांच हजार साल पहले रचे महाकाव्य 'जय संहिताÓ तक पहुंचा देती है। जय संहिता, जो बाद में महाभारत के नाम से लोकप्रिय हुई। इस गंं्रथ के रचयिता वेदव्यास ने पहले श्लोक में लिखा है कि जो जय में है, वह सृष्टि में है और जो सृष्टि में नहीं है, वह जय में भी नहीं है।

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लिखने वालों के लिए सृजन का प्रवेश-द्वार है लघुकथा

सोशल मीडिया के दौर में लघुकथा साहित्य की सबसे अधिक उपयोग में आने वाली विधा बन गई है। हर व्यक्ति जो कुछ लिखना चाहता है लेकिन सीधे तौर पर बात नहीं करना चाहता, वह लघुकथा के माध्यम को अपनाता है। अप्रत्यक्ष रूप से किसी प्रवृत्ति या घटना पर अपनी दृष्टि रखने का एक सशक्त माध्यम बनती जा रही है लघुकथा। देखा जाए तो इसकी सहजता, सम्पे्रषणीयता और संक्षिप्तता ही ऐसे तीन कारण हैं कि नवोदित का ध्यान भी अपनी ओर खींचते हैं तो प्रौढ़ रचनाकार के लिए भी एक चुनौती बन जाते हैं। चुनौती बनने के दो कारण हैं। पहला तो यह कि लघुकथा कभी भी व्यंग्य या विश्लेषण से निकलते हुए हास्य पैदा करने का कारण बनकर चुटुकले की श्रेणी में आ सकती है। इसके लिए लेखक और खासतौर से प्रतिष्ठित लेखकों से अतिरिक्त श्रम का आग्रह हो जाता है तो दूसरी ओर लघुकथा भले ही भारतेंदु युग से चली आ रही हो, इसके शास्त्रीय स्वरूप या मानकीकरण का काम अभी तक नहीं हुआ है। अभी भी यह व्यंग्य की तरह प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए मशक्कत कर रही है। तो दूसरी ओर कई बार संस्मरण, रेखाचित्र आदि के बीच के फर्क की तरह इसे भी दूसरी विधाओं में शामिल कर लिया जाता है। व्यंग्य के मुकाबले नियमित रूप से लघुकथा लिखने वाले रचनाकारों की संख्या बहुत कम है, इस वजह से इस विधा को अभी भी साहित्य की जाजम पर चर्चा के लिहाज से तीजे-चौथे पायदान पर ही माना जाता है।
सोशल मीडिया ने जरूर इसे मुख्यधारा में लाने की कोशिश की है और यह कोशिश इस रूप में सार्थक भी हुई है कि यह लिखने वालों के लिए साहित्य का प्रवेश द्वार बन गया है, लेकिन यहां यह स्पष्ट करना बहुत जरूरी है कि बात लिखने वालों की हो रही है, लिखना सीखने वालों की नहीं। जिन्हें लिखना आता है, वे छोटी-छोटी घटना और समय को उकेरते हुए अपनी बात को कहने के लिए लघुकथा विधा का उपयोग करते देखें भी जा सकते हैं। क्योंकि हर व्यक्ति के पास पर्याप्त तर्क, तथ्य और भाषा शक्ति नहीं होती, इसलिए वह अपने आसपास और परिवेश में होने वाले घटनाक्रमों पर लिख नहीं पाता, लेकिन जो भी अपने आसपास होते हुए देखता है और इन सभी को देखते हुए जो झंझावात उभरता है, उसे कहने की गुंजाइश भर से एक लघुकथा बना लेता है। अपने भाव, दृष्टि और सामान्य बुनावट के साथ बात कहने का सलीका ही लघुकथा के क्षेत्र में प्रवेश के लिए उर्वर जमीन का कारण बनता है।
सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें न तो घटनाओं की भरमार होती है और न किरदारों की भीड़। थोड़े-से शब्दों में भी अपनी बात कही जा सकती है। हालांकि इन थोड़े-से शब्दों की अधिकतम शब्द-सीमा का अभी तक कहीं निर्धारण नहीं हो सका है। हाल ही में प्रकाशित कथारंग-3 के ‘लघुकथा अंक’ में सबसे छोटी लघुकथा मुकेश व्यास की मिलती है, जो 29 शब्दों की है और अपनी बात कहने में सफल भी, लेकिन कई बार लघुकथा के नाम पर कहानी के शब्दों को कम करने की कोशिशें हास्यास्पद स्थितियां पैदा करती है और ‘कहन’ कमजोर हो जाता है। इसलिए लघुकथा को बजाय शब्दों के एक घटना, एक समय के इर्दगिर्द बुने कथानक से लिया जाता है। जैसे ही लेखक फ्लैशबैक में गया, किरदार रचने शुरू किए या अगले समय में छलांग लगाई वह लघुकथा से दूर होने लगता है। नव-लेखकों की यह बड़ी समस्या होती है कि वे एक समय से दूसरे समय में जाते समय भाषा के मामले में चूक जाते हैं। किरदार रच नहीं पाते और कथानक को सम्पे्रषणीय बनाने के लिए स्मृतियों तथा संयोगों का सही तरीके से आश्रय नहीं ले पाते। इसलिए बड़ी कहानियों की बुनावट करना उनके वश में नहीं होता लेकिन लघुकथा के माध्यम से अपनी बात बहुत ही आसानी से कह सकते हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया के दौर में लघुकथा साहित्य में प्रवेश का वह द्वार है जो आपको एक रचनाकार के रूप में पहचना तो दिला सकता है, लेकिन यह पहचान ठीक उसी तरह की होती है जैसे लघुकथा होती है। बहुत सारे लेखकों ने पहले लघुकथा लिखी और फिर उसी के विस्तार से बेहतर कहानियां भी रच पाए। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि लघुकथाएं करते हुए लिखने वाला सृजन के रास्ते पर आगे बढ़ सकता है, बशर्ते कि उसे लघुकथा के छोटे-छोटे ‘रिस्क-फैक्टर्स’ का पता हो। इन सभी के बीच में लघुकथा-विधा की प्रतिष्ठा का सवाल अभी भी खड़ा है और यह प्रतिष्ठा तब ही संभव है जब परिपक्व और प्रतिबद्ध रचनाकार स्वयं को अभिव्यक्त करने का माध्यम लघुकथा को चुनेंगे।
आयोजनों की धूम
बीकानेर में साहित्य-कला-संस्कृति के आयोजनों की संख्या इन दिनों बढ़ी-चढ़ी रही है। बीकानेर में लंबे समय बाद टीएम ऑडिटोरियम में विरासत संवद्र्धन संस्थान की ओर से मुशायरा आयोजित किया गया तो बरबस ही सवाल खड़ा हुआ कि क्या मुशायरा अब दो-ढाई सौ की तादाद तक सीमित हो चुका है? शहर में सुनने वाले कम हो गए हैं कि बुलाने वालों ने ही कुछ सरहदें या अर्हताएं तय कर दी हैं? मुशायरा और कवि-सम्मेलन का तो मतलब ही खुला आसमान और सामने बैठा हर खासोआम हुआ करता था। ये सारे परिवर्तन के लक्षण हैं तो यही सही। दूसरी ओर कथारंग के दोनों अंकों का लोकार्पण बीकानेर में होने के बाद इस बार हनुमानगढ़ में लघुकथा अंक का लोकार्पण करवाया गया और इसे साहित्य को बंद कमरों से आम जन के बीच ले जाने की कवायद बताया गया। ‘जन तक सृजन’ अभियान के तहत जहां बीकानेर से बाहर भी साहित्यिक माहौल बनाने की बात हुई तो यह भी एक बड़ी खबर है कि जल्द ही एक लघुकथा सम्मेलन के लिए बीकानेर में लेखक जुट रहे हैं। डेजर्ट फेस्टिवल भी हुआ लेकिन कुछ सूना-सा लगा। कुछ चेहरे गायब मिले। आयोजनों में यह होना कोई नई बात नहीं है। दो अक्टूबर को जनकवि हरीश भादाणी का जन्मदिन था। कृतज्ञ शहर उन्हें नहीं भूला।
खामोश हुआ एक समय
सीपी माथुर नहीं रहे। बीकानेर रंग-जगत में वे एक हलचल की तरह थे। जहां जाते एक हलचल मचा देते। उनकी दमदार आवाज और उस पर जिंदादिली। जहां खड़े होते अपना ध्यान खींचते। पूरा जीवन संघर्ष में बीता लेकिन हार नहीं मानीं। घर बनाने का सपना पूरा होने वाला ही था। निमंत्रण-पत्र बांट रहे थे कि एक एक्सीडेंट हुआ और मेजर आपरेशन के बाद लंबा समय शून्य में बीता। फिर कैंसर ने जकड़ लिया। हार्ट-पेशेंट भी थे। बावजूद इसके ‘खामोश अदालत जारी है’, ‘गुलाम बादशाह’, ‘पंछी ऐसे आते हैं’ जैसे कितने ही नाटकों में अपने किरदार से लोकप्रिय हुए सीपी माथुर को भुला पाना इतना आसान नहीं होगा। वास्तव में वे ऐसे रंगकर्मी थे, जिन्होंने बीकानेर के रंगजगत को अपने खून-पसीने से सींचा। एक ऐसी आवाज को खामोश होना भला किसे नहीं अखरेगा।

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