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साहित्य सरोकार (हरीश बी शर्मा) (11)

लेखन के प्रति ईमानदारी बनाती है रचनाकार

लिखने के लिए सिर्फ भाषा ज्ञान होना ही जरूरी नहीं है। इस बार हरीश बता रहे हैं कि लिखने के लिए जरूरी है 

भाव-जगत स्पष्ट होना।


लिखने के लिए क्या सीखें? इस सवाल का सामान्य-सा जवाब तो यही है कि लिखने के लिए लिखना सीखें। यह सामान्य-सा जवाब ही दरअसल, परेशानियों का सबब है। हम देखते हैं कि बहुत सारे लोग यह कहते हुए देखे जा सकते हैं कि ये।।।? ये तो हमें आता है। यह तो हम भी कर सकते हैं। साहित्य में भी ऐसी त्रासद घटनाएं होती रहती है। बड़े-बड़े साहित्यकारों के रचे हुए को देखते हुए यह कहना कि ऐसा लिखना तो बहुत आसान है, भले ही कहने के स्तर पर आसान हो, लेकिन चुनौती के स्तर पर सात जन्म में नहीं हो पाने जैसा मामला है। लिखने की तकनीक सीखाने वाले सामान्यतौर पर कहते देखे जा सकते हैं कि वर्तनी शुद्ध होनी चाहिए। विराम चिह्नों का प्रयोग सलीके से किया जाना चाहिए और सबसे खास बात कि वाक्य की संरचना नौ शब्दों से अधिक नहीं होनी चाहिए। यहां तक तो ठीक है, लेकिन लिखें क्याï? यह किसी भी तकनीक से पता नहीं चल सकता। हां, सर्वे यह बता सकता है कि इन दिनों लोगों को क्या पढऩे में रुचि है, लेकिन जरूरी नहीं कि जो पढऩे में रुचि हो, उसे लिखा भी जा सके और फिर रुचि के पैदा होने का एक बड़ा कारण अभाव ही तो है। बारीकी से देखें तो पाएंगे कि हमारी रुचियां वस्तुत: हमारे मांग और आपूर्ति के साधन की प्रतिनिधि है। रुचियों का संबंध रचनात्मकता से जुड़ा है। किसी भी व्यक्ति के रचनात्मक होने के बहुत सारे कारण हो सकते हैं, लेकिन सबसे पहली शर्त उसका सुरुचिपूर्ण होना है। अगर रचनात्मक जगत से जुड़े हुआ व्यक्ति सुरुचिपूर्ण नहीं है तो उसकी रुढ़ताएं बगैर कहे ही बाहर आने लगेगी। वह पुराने पड़ चुके विषयों पर बात करेगा। बार-बार विषयांतर होगा, कुछ नया देने की कोशिश में गफलत का शिकार होगा और इस तरह के लोगों की सबसे बड़ी पहचान होगी कि शब्दों के चयन के मामले में बहुत अधिक लापरवाह होगा। वजह, सुरुचिपूर्ण नहीं होगा। सुरुचि सम्पन्न व्यक्ति सदैव कुछ नया करने की कोशिश करेगा। अगर वह लेखन के क्षेत्र से जुड़ा है तो किसी भी विषय को उठाने की बजाय, इस विषय पर ध्यान देगा कि उसे खत्म कैसे करना है। लिखने की यही सबसे बड़ी शर्त है। जब आप कलम उठाते हैं। कागज पर रखते हैं तो भले ही आप पहला शब्द लिख रहे हों, आपको पता होना चाहिए कि यह वाक्य खत्म कहां होगा। अगर यह पता चल गया कि पहले वाक्य को कहां खत्म करना है तो दूसरे वाक्य को शुरू करने के लिए किसी भी तरह की समस्या नहीं होगी। दूसरे से तीसरे में और इस तरह अंतिम पंक्ति के अंतिम विराम चिह्न तक सबकुछ व्यवस्थित हो जाएगा। ऐसा नहीं होने की स्थिति में बहुत सारी रचनाएं भ्रूण हत्या की शिकार भी हुई है। इस तरह की भ्रूण-हत्याएं उन्हीं रचनाओं की होती हैं, जिनके रचनाकार यह कहते हुए सुने जाते हैं कि ऐसा तो हम भी लिख सकते थे। दरअसल, समझ की पहली-दूसरी सीढ़ी पर खड़े ये लोग गलत कह भी नहीं रहे होते, क्योंकि जिस तरह से किसी भी बड़े साहित्यकार की रचना का मर्म सामने आता है, सभी को लगता है जैसे यह तो उसे भी पता है। एक ऐसी कहानी तो उसके भी पास है, लेकिन बात सिर्फ कहानी भर नहीं होती। कहानी को कहने का सलीका होता है। जब सलीका नहीं होता है तो समस्या खड़ी होती है। समस्या इसलिए खड़ी होती है कि भाव-जगत में कुछ भी स्पष्ट नहीं होता। जब तक भाव-जगत अपने विषय को लेकर सजग नहीं होगा। विषय को संवेदनाओं की प्राण-वायु नहीं मिलेगी। कहने का सलीका तो दूर की बात है, कैसे एक शब्द भी फूट सकता है? और हम बात कर रहे हैं कि एक कहानी, उपन्यास या कि एक कविता लिखने की। इसलिए कहते हैं कि लिखना आना चाहिए। लेखन के प्रति यह ईमानदारी ही व्यक्ति की रचनाकार बनाती है। एक रचनाकार न जाने कितनी-कितनी बार अपने लिखे हुए को खारिज करता है। बार-बार कागज फाड़ता है और अंतत: एक रचना को समाज के सामने बहुत ही संकोच से रखने का साहस रखता है। दरअसल, जब वह ऐसा कर रहा होता तो वह एक सलीके की खोज कर रहा होता है। वह बार-बार खारिज इसलिए नहीं करता, क्योंकि उसे लिखना नहीं आ रहा है। वह खारिज इसलिए कर रहा होता है कि वह सलीका नहीं आ रहा है कि एक पूरी परंपरा से निकलकर उस तक आने वाला पाठक, उसे भी सराहे। संकोच सिर्फ इस बात का है कि रचनाकार को पता है कि इस समाज में उससे अधिक ज्ञानी और समझदार लोग बैठे हैं, उनकी कसौटी पर क्या यह खरा उतर पाएगा। यही संकोच लिखना सिखाता है। वरना जिसे सामान्य शब्दों में लिखना कहते हैं, वह तो सभी साक्षरों को आता है। हम यह भी कहते हुए सुनते हैं कि छोटी मात्रा लगाएं या बड़ी, समझने वाला तो समझ ही गया। साहित्य में ऐसा नहीं है। साहित्य में सबसे पहले रचनाकार को अपनी तरफ से साफ कर देना पड़ता है कि वह क्या समझाना चाहता है। पाठक तो बाद में उसके कहन में से अलग-अलग ध्वनियां और अर्थ निकालना शुरू करते हैं। यही लिखना है, यही लेखन है। यही सृजन है, सृजन का इससे बड़ा सरोकार कोई भी नहीं है कि लिखने का सलीका आए।

मंच पर ही नकद राशि, सराहनीय पहल

पंाच दिवसीय रंग-महोत्सव में पांच नाटकों के बाद एक-दो जून को अर्पण आर्ट सोसायटी द्वारा बहुचर्चित नाटक 'प्यादाÓ का मंचन हुआ। रंग-निर्देशक दलीपसिंह भाटी के निर्देशन में मंचित इस नाटक में स्त्री-पुरुष संबंधों की पड़ताल करते हुए अंतद्र्वंद्व को दर्शाया गया। पूरे नाटक में तनाव एक अदृश्य किरदार था, जो दर्शकों के मन में चलता रहा। नवोदित रंगकर्मियों ने नाटक में जान डाल दी। प्रत्येक रंगकर्मी को बतौर मेहनताने 3000 रुपए की राशि सार्वजनिक रूप से मंच से ही दिया जाना, एक अच्छी शुरुआत है। बीकानेर में अगर प्रोफेशनल थिएटर की स्थापना करनी है तो खुले मन से रंगकर्मियों को उनके हक का पैसा देना होगा। इससे पहले पांच दिवसीय रंग आयोजन में में गवाड़, फंदी, काया में काया, अम्मा और श्यामकली का जादू नाटक मंचित हुए।

पांच दिन लगातार कार्यक्रम

आठ जून से 12 जून तक साहित्य के नाम रहेगा। नियमित चलने वाले कार्यक्रमों के अलावा पांच कार्यक्रम लगातार होने हैं। आठ जून को डॉ.राजेंद्र जोशी, नौ जून को डॉ.मंजू कच्छावा, दस जून को कवि-कथाकार राजेंद्र जोशी, 11 जून को जनकवि हरीश भादाणी की जयंती पर अवरेख और 12 जून को राजस्थानी कहानी पर केंद्रित कार्यक्रम होगा। वर्ष-2017 में 85 किताबों का प्रकाशन हुआ है। वर्ष-2018 के प्रारंभिक महीनों की सुस्ती के बाद जिस तरह से कृतियां सामने आ रही हैं, संभव है कि पिछले साल का रिकार्ड टूट जाए।

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नहरी-लेखन करना है या नदी-सी अभिव्यक्ति?

सहने को कलात्मक तरीके से कहने की कला ही सृजन है- कहानी है, कविता है या अभिव्यक्ति की अनेकानेक विधाएं हैं। कहन, जो उस प्रथम पुरुष की त्रासदी को दुनिया का दर्द बनाकर प्रस्तुत करे और हर व्यक्ति को वह अपना-सा लगा, उसमें भले ही किरदार न हो, लेकिन बातें हमारी-आपकी लगे। उसमें भले ही किरदार हों, लेकिन वे देश-काल और परिस्थितियों से मुक्त समय को प्रतिनिधित्व करे, सृजन है। दिक्कत तब आती है जब कलात्मकता के नाम पर सनसनी फैलाने की कोशिश की जाती है। चौंकाए जाने के यत्न होते हैं। अतिरंजनाएं फैलाई जाती है, न तो सृजन रहता है और न कला का कोई अभिप्राय। मतलब सिर्फ यही होता है कि एक रोमांच जगाते हुए पाठक को उल्लू बनाना और यही वजह है कि अभिव्यक्ति में जैसे ही कृत्रिम कौतुहल जगाने का कीड़ा लगता है, जन से सृजन दूर होने लगता है। 

हालांकि, इस बात में दो राय नहीं है कि पाठक रंजन के लिए पढ़ता है या सुनता है, लेकिन वह प्रवाह में बहना पसंद करता है। एक नदी की तरह। नहर की तरह नहीं जो कृत्रिम किनारों की बीच चलती रहे। कभी उठाई-गिराई जाती लहरों के साथ चलती रही। नहरी-लेखन किसी वाद, विचार और विमर्श की जमीन पर लिखने को कहा जा सकता है, जहां बहुत कुछ बातें पहले से तय होती है। नदी-अभिव्यक्ति सरल, स्वाभाविक और राग-द्वेष से मुक्त होती है। इसका कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं होता जैसे नहर उसी क्षेत्रों से निकलेगी जहां ज्यादा वोट होंगे। नदी अपने रास्ते खुद बनाती है। नदी के मुंह को कोई भी राजनीतिक-आग्रह मोड़ नहीं सकता।
और इस प्रक्रिया में अगर कौतुहल भी आए तो स्वागत है। कुछ रहस्य-रोमांच पैदा हो तो हो, लेकिन उठा-पटक नहीं चाहिए। पाठक अनुभूतियों से निकलते हुए स्वयं के पूरे जीवन का आंकलन करता रहता है। वह बार-बार किताब को पढ़ते-पढ़ते बंद करता है और खुद को जोड़ता है। कई बार तो ऐसा भी होता है कि एक ही पन्ने पर घंटों पड़ा रहता है, उसकी नजरें या तो पन्ने पर गड़ी रहती है या वह चेतन-अचेतन की एक अलौकिक-सी अवस्था में चला जाता है, जहां शब्दों के बीच के स्पेस में गूंजते कथानक को अपनी जिंदगी से जोड़ते हुए स्मृतियों के कई कपाटों को खोलता-बंद करता है। इसीलिए तो पढ़ता है कोई किसी को। इसी में तो किसी के रचनाकार होने की सार्थकता है। यहीं तो आनंद है। इस आनंद का अनुभव ही किसी भी सृजनात्मकता की एकमात्र और अनिवार्य कसौटी है।
जिस रचनाकार को यह समझ आ गया। समझो वह जनप्रिय हो गया। इसे समझे बगैर कुछ नया और अनूठा कहने के चक्कर में बहुत सारे रचनाकार के प्रारंभिक वर्ष खत्म हो जाते हैं, जैसे-जैसे उसे पता चलता है प्रौढ़ता सिर चढ़ी होती है। बहुत सारे ऐसे उदाहरण हैं, जब बहुत सारे लेखकों ने अपने जवानी में पाए हुए सच को बुढ़ापे तक आते-आते नकारा और सदियों पुराने चले आ रहे सत्य को स्वीकार करते हुए उसी में स्वयं को अभिव्यक्त किया। सराहे भी गए। यह गलत भी नहीं है। व्यक्ति जब मुकम्मल नहीं है तो हासिल कैसे अंतिम हो सकता है।
कुछ लोग इसे खुद में लगातार परिवर्तन के अर्थ में स्वीकारते हुए बढ़ते हैं तो कुछ अपने कहे-किए में इतने जड़ हो चुके होते हैं तो वापसी संभव नहीं होती और मनोमस्तिष्क का यह द्वंद्व उन्हें रचनाकार नहीं रहने देता, क्योंकि रचनाकार का मन और मस्तिष्क तो कल-कल पानी की तरह बहता है। ठहरा हुआ पानी तो पानी भी कितने दिन रह पाता है भला। लेखन की सजगता और सावधानी का अपना महत्व है, लेकिन क्योंकि इसमें अनुभूतियों का प्रकटीकरण है, इसमें चालाकियों का क्या काम। अगर कोई अपने कहन मे फ्लैशबैक, प्रतीक या बिंबों को अय्यार के रमल की तरह प्रयोग भी करता है तो मानो वह सृजन नहीं कर रहा है, जुआ खेल रहा है। इस जुए की बाजी उसके खिलाफ भी हो सकती है। क्या जरूरी है अभिव्यक्ति को चौपड़-पासा बनाने की?
यह हर रचनाकार के लिए सोचने की बात है कि एक पाठक के साथ उसका रिश्ता बहुत ही समीप का होता है। हर पाठक चाहता है कि उसे एक किताब में ऐसे चार-पांच अवकाश मिले जब वह अपने जीवन में झांक आए। पन्ना किताब का खुला हो और वह अपने जीवन के अध्यायों का पुनर्पाठ कर ले। इस रूप में हर पाठक की अपने रचनाकार से यह अपेक्षा होती है, लेकिन जैसे ही उसका रचनाकार अपनी किताब के माध्यम से कुछ मायावी बनाने की कोशिश करता है, पकड़ा जाता है, क्योंकि रहस्य खड़ा करना बहुत मुश्किल है, उसे निभाना और फिर उसकी परतों को खोलना बहुत मुश्किल। जब वह इस स्तर पर नहीं कर पाता तो पकड़ा जाता है। इसलिए हर रचनाकार से उम्मीद की जाती है कि वह अपनी अभिव्यक्ति के
मामले में मौलिक और स्वाभाविक रहे, यही
पाठक चाहता है और यही बात उसे इतिहास में स्थान दिलाती है।

गठित हुआ राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल

साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली का राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल गठित हो चुका है। परामर्श मंडल के संयोजक वरिष्ठ रंगकर्मी, पत्रकार, साहित्यकार मधु आचार्य 'आशावादीÓ ने पिछले दिनों इसे अंतिम रूप दिया, जिसका अकादमी की जनरल काउंसिल की बैठक में अनुमोदन भी हो चुका है। मंडल में वरिष्ठ साहित्यकार भंवरसिंह सामौर, सोहनदान चारण, महिपालसिंह राव, मुकुट मणिराज, डॉ.शारदाकृष्णा, डॉ. मंगत बादल, कमल रंगा, राजेंद्र जोशी और डॉ.राजेश कुमार व्यास को शामिल किया गया है। आचार्य ने बताया कि मंडल को बनाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि राजस्थान के सभी अंचलों से प्रतिनिधित्व हो। राजस्थानी के प्राचीन और आधुनिक स्वरूप के जानकार इसमें रहें तो दूसरी और इतिहास, भाषा और व्याकरण के विशेषज्ञों को भी शामिल किया गया है ताकि आने वाले पांच सालों में कुछ ठोस कार्यों को पूरा किया जा सके, जिन्हें पिछले पांच साल में शुरू किया गया।

दो दिवसीय कला-महोत्सव

बीते सप्ताह कला, साहित्य, संगीत के कार्यक्रमों की धूम रही। चार अप्रैल को सखा संगम ने वरिष्ठ संगीतज्ञ डॉ.मुरारी शर्मा का जन्मदिन मनाते हुए उन्हें और उद्योगपति कन्हैयालाल बोथरा को सम्मानित किया। बीकानेर साहित्य कला संगम और थार विरासत की ओर से दो दिवसीय कला-महोत्सव में कविता और गजल पर केंद्रित दो दिवसीय कार्यक्रम हुआ। सरोद-सितार वादक अमित-असित गोस्वामी ने जयपुर में जलवा बिखेरा। खासतौर से कविता के लिए बीकानेर हमेशा से ही उर्वर रहा है। इन दिनों जिस तरह से कवियों की एक नई पौध खड़ी हो रही है, उत्साहजनक है। एक ऐसा समय जब समाज की संवेदना पर सवाल हो, बीकानेर में कवियों की बेतहाशा वृद्धि एक खबर है।

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सहा क्या नहीं, महत्वपूर्ण है कहा क्या...

सामान्य भाषा में सृजन को प्रसव-वेदना से परिभाषित किया जाता है। कुछ लोग ऐसा कह भी देते हैं, लेकिन सृजन का निर्णायक-पक्ष कभी भी वेदना नहीं बल्कि संवेदना रही है। वेदना तो सभी सहते हैं, अभिव्यक्त वही कर सकता है, जिसमें संवेदना हो। कदाचित सृजन को प्रसव-वेदना से इसलिए जोड़ दिया गया हो कि प्रसव-वेदना को पीड़ा का चरम माना गया है और इससे मिलने वाले परिणाम को सृजन का सुख। इसलिए एक साधारणीकरण करने के लिए यह परिभाषा दी गई और मोटी-मोटी बात समझ में आ गई तो फिर इस पर बहस भी नहीं हुई। अगर यह परीक्षा के सवालों को हल करने और नंबर लेने तक सीमित है तो ठीक, लेकिन एक रचनाकार को अपना आंकलन करने की शर्त से जुड़ा मसला है तो पुनरावलोकन की मांग करता है। जैसे ही हम प्रसव-वेदना के निहितार्थ पर जाते हैं तो पता चलता है कि यहां सिर्फ वेदना की बात है और थोड़ा-सा खींचतान करते हुए इसे पीड़ा से उपजे क्रंदन से जोड़ सकते हैं। सनद रहे! यह क्र्रंदन अभिव्यक्ति नहीं है। यह दर्द से निजात पाने की एक अवैज्ञानिक विधि भर है। कहीं यह प्रमाणित नहीं हुआ है कि रोने से दर्द कम हुआ है। असली बात तो उसे अभिव्यक्त करना है, जो सहा। यह सभी के वश में नहीं है। यह सच है कि प्रसव-वेदना अनिर्वचनीय होती है। लेकिन सृजन में अभिव्यक्ति ही प्राण-तत्त्व है। अभिव्यक्ति जितनी सघन होगी, संवेदनायुक्त होगी, समष्टि का भाव लिए होगी उतना ही विस्तृत उसका आकाश होगा। 

इस बात की बहुत अधिक संभावना रहती है कि पीड़ा की अभिव्यक्ति के लिए रचना में कल्पना का सहारा भी लिया जाए। भले ही इस वजह से साहित्य में विज्ञान जैसी विश्वसनीयता नहीं आ पाती, लेकिन साहित्य की यही कमी उसकी सुंदरता है। मौलिकता है। वरना साहित्य भी विज्ञान हो जाता। विज्ञान व्यक्तिगत स्तर पर परिणाम देता है, लेकिन साहित्य तो हर पढऩे वाले के मन में उतरकर उसकी थाह लेता है। एक पुस्तक न जाने कितने-कितनों की अंतर्कथाओं को स्पर्श करते हुए आगे बढ़ती है। विज्ञान में जो काम तर्क और यथार्थ करता है, साहित्य में अनुभूतियां करती हैं। अनुभूतियां जितनी सघन होंगी, अभिव्यक्ति उतनी ही व्यापक होगी। सारी बात को समझने के लिए एक बार फिर हमें प्रसव वेदना को समझना होगा। प्रसव-वेदना यथार्थ है, लेकिन इस वेदना के बाद उत्पन्न सारे बच्चों के प्रति समाज का एक जैसा नजरिया नहीं होता। जैसे, प्रसव-वेदना के बाद भी उत्पन्न बच्चे का लिंग, वर्ण और शारीरिक संरचनागत विशेषताओं के आधार पर सामान्य लोग खुशियों के अवसर ढूंढते हुए देखे जा सकते हैं। सभी परिणाम एक जैसे नहीं होते, लेकिन प्रसव-वेदना तो लगभग समान ही होती है। ऐसे में प्रसव-वेदना को सृजन से जोडऩे पर एक सनसनी तो पैदा की जा सकती है, लेकिन यह अंतिम नहीं है। निर्णायक नहीं है। सृजन प्रसव-वेदना नहीं है। सिवाय इसके कि प्रसव-वेदना जैसी पीड़ा का कोई भी स्तर सृजन का कारक माना जा सकता है। वास्तव में इन दोनों का कोई लंबी दूरी का रिश्ता नहीं है। सिवाय इसके कि जैसे हर प्रसव वेदना के बाद मिलने वाला परिणाम खुशियों की गारंटी नहीं होता, उसी तरह हर लिखा हुआ जनप्रिय होने की गारंटी नहीं होता। यह दूसरा अर्थ तो फिर भी सम्प्रेषित होता है, लेकिन सृजन और पीड़ का कोई सीधा संबंध स्थापित नहीं करता। इसमें कोई दो राय नहीं है कि पीड़ा से अभिव्यक्ति का एक मार्ग बनता है। यह अभिव्यक्ति आंसू, कराह, क्रंदन से भी हो सकती है और समझे या सहे दर्द को दुनिया का दर्द बना देने से भी। फिर जरूरी नहीं है कि पीडि़त ही सृजक हो। रामायण काल से जुड़े एक पौराणिक आख्यान में शिकारी द्वारा क्रौंच-वध करना और फिर मादा क्रौंच के विलाप की प्रतिक्रिया में एक कवि का हमें मिलना, इसका एक बड़ा उदाहरण है। फिर वाल्मीकी ही क्यों, कलिंग का एक युद्ध सम्राट अशोक की सारी प्राथमिकताएं बदलने वाला साबित हुआ। स्त्री और दलितों ने जिस पशुवत-जीवन को अपनी नियति समझकर स्वीकार कर लिया, उसी को लेखकों ने मानवीयता और समानता के दृष्टिकोण से देखा। भुगता किसी ने,अभिव्यक्ति किसी और ने किया। सहा किसी ने, कहा किसी और ने। यहां इसे यूं समझ सकते हैं कि ठोकर खाने के बाद सीखना ही जरूरी नहीं। ठोकर खाने वाले को देखकर भी सीखा जा सकता है। पीडि़त व्यक्ति ही अपना दर्द लिखे, जरूरी नहीं। किसी की पीड़ा को देखकर भी अभिव्यक्त किया जा सकता है। बशर्ते की संवेदनाएं हों। संवेदनाएं ही व्यक्ति के जिंदा होने का सबूत है। रोजाना होने वाले घटनाक्रमों में जो व्यक्ति संवेदनशील नहीं है, वह तो मृतक के समान ही हुआ। यही पीड़ा और अभिव्यक्ति का अंतर्सबंध है, जो संवेदना के रसायन के बगैर नहीं मिलता। यहीं से सवाल खड़ा होता है कि दर्द एक जैसा होने के बाद भी अभिव्यक्ति का स्तर अलग-अलग कैसे होता है? इसी सवाल के जवाब में सृजक होने की चाबी छिपी है। एक ही घटना, समय या संदर्भ से प्रभावित लोगों की अभिव्यक्ति का स्तर ही उनके अनुभवी होने का प्रमाण देता है। बहुत सारे लोग सामने आने वाली चीजों को 'तत्काल, समकाल और चिरकालÓ की डिवाइस से देखते हैं। पता करते हैं कि इस तरह की घटनाओं के सूत्र भूतकाल में कैसे और कहां
मिलते हैं।
उन प्रवृत्तियों पर जाते हैं, जिससे घटना का जन्म हुआ और फिर इन सारी स्थितियों को भविष्य में देखते हैं और इस पूरे अध्ययन से जो हासिल होता है, उसे अपनी रचना में शामिल करते हुए पहला ड्राफ्ट तैयार करते हैं और उसे बार-बार अपनी ही कसौटी पर कसते हैं। हर बार यह सवाल करते हैं कि क्या उसे जो कहना था, वह सौ फीसदी आ चुका है और जो रचना इस तसल्ली तक पहुंचे बगैर सार्वजनिक हो जाती है, स्तरीय नहीं हो पाती। यहां स्तरीय होना महत्वपूर्ण है और यह कहना जरूरी नहीं कि स्तरीय होने का फैसला करने के लिए न्याय या शासन व्यवस्था निर्णायक नहीं होती। यह तो मन तक पहुंचने की कला है। मन ही निर्णय करता है और मन को संवेदन ही झंकृत कर सकता है। सबसे पहली जरूरत संवेदनाओं के तार कसने की है। अगर संवेदना है तो प्रसव-वेदना क्या, किसी बच्चे को मारे जाने वाले एक थप्पड़ से भी कालजयी कृति का प्रणयन हो सकता है। अगर संवेदना नहीं है तो भले ही दस-दस प्रसवों का साक्षी बन जाए कोई, अभिव्यक्ति का आधा-क भी कहां लगाना है, पता नहीं चलेगा। इसलिए पीड़ नहीं, सृजन की अनिवार्यता अनुभूति है, संवेदना है। संवेदनशील मन ही कर सकता है सृजन।


इतिहास रच रहा
है 'अवरेखÓ

प्रज्ञालय संस्थान की ओर से शुरू किए गए 'अवरेखÓ कार्यक्रम में इस बार साहित्यकार शंभूदयाल सक्सेना की रचनाओं का
अनुवाद हुआ।
यह एक ऐसा नवाचार है, जिसमें अनुवाद-कला को प्रोत्साहन मिलेगा। यह सच है कि अनुवाद से ही हम दूसरी भाषाओं में रचे जाने वाले साहित्य को समझ सकते हैं। हर व्यक्ति चाहता है कि वह अपने जीवनकाल में अपनी किसी एक प्रिय कृति का अपनी भाषा में अनुवाद करे। बहुत सारे लोग अनुवाद को एक नई कृति के लिए की जाने वाली मेहनत से भी दुष्कर विधा मानते हैं, क्योंकि यहां लेखक को प्रयोग की तो छूट होती है लेकिन कथ्य बदलने की नहीं।


रंगकर्मियों का सम्मान

विश्व रंगमंच दिवस पर रमक-झमक संस्थान ने शहर के रंगकर्मियों का सम्मान किया। अशोक जोशी के निर्देशन में 'शहर हमारा सोता हैÓ का मंचन हुआ। इसके बाद धरणीधर रंगमंच पर आनंद वि. आचार्य के लिखे नाटक 'सूरज रो पूतÓ का मंचन हुआ।

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चाहने भर से नहीं बन जाता कोई कवि

सृजनशील व्यक्तिके लिए जरूरी है कि 'चांदमारी' की बजाय ठोस और सार्थक लिखे। ऐसा लिखे, जिसे कालजयी कहा जा सके। काव्य-रचना बहुत ही कठिन विधा है। कलारूपों में काव्य को बहुत ही सम्मान से देखा जाता है। कला का उत्कृष्ट रूप काव्य और उत्कृष्टतम रूप नाटक को माना गया है।

भारतीय साहित्य के इतिहास के प्रारंभिक दौर में जहां कवित्त ही बरामद होता है, उसी देश में आज कविता को सबसे उपेक्षित विधा करार दे दिया गया है। प्रकाशक काव्य-संग्रहों के प्रकाशन को मांग और आपूर्ति के सिद्धांत विपरीत मानते हैं तो मंचों पर चोरी और चुटकले बाजी से आगे बढ़ते हुए मजमेबाजी तक के आरोप कवियों पर लगने लगे हैं। इस दौर में कविता पर आलोचना की जगह व्यंग्य होने लगा है। यहां तक कहा जाने लगा है कि आकाश में कंकर फेंको, नीचे जिस पर भी गिरेगा-कवि होगा। अशोक चक्रधर और कुमार विश्वास के सेलिब्रिटी बन जाने से परेशान लोग भले ही आदर्श के रूप में तुलसी, सूर, मीरा, रसखान, निराला, गुप्त, दिनकर के नाम गिनाएं लेकिन कवि सम्मेलनों में आधे से अधिक कवि अशोक चक्रधर और कुमार विश्वास की शैली की नकल करने वाले फॉलोअर ही मिलते है। कुछ लोग जो कविता के माध्यम से कुछ संजीदा करने की कोशिश कर रहे हैं, उनसे किसी को कोई सरोकार नहीं है और यही वजह है कि कवियों के भी जन-सरोकार खत्म होते जा रहे हैं। इस बढ़ती हुई खाई में कुछ ऐसे लोगों की बन आई है, जो ऑन-लाइन कविता सिखा सकते हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से ऐसे गुरुओं ने कविता की कुछ 'झटपट-विधियोंÓ का आविष्कार किया है, जो रातोंरात कवि बनाने का सामथ्र्य पैदा कर सकती है। रोचक तथ्य यह है कि ऐसे लोगों को धन और समर्थन भी खूब मिल रहा है। नव-रचनाकार इनके ईजाद किए हुए फार्मूलों से कविताएं रच रहे हैं, छप रहे हैं और सराहे जा रहे हैं। दावा यह है कि इस इंस्टेट-फार्मूले से तैयार अठारह हजार कवियों के बूते जल्द ही एक युग का प्रवत्र्तन होने वाला है! यह ये समकालीन कविता का परिदृश्य। भले ही इसे इस रूप में निराशाजनक नहीं कहा जा सकता कि कविता कर रहे समाज में संवेदना होती है, लेकिन उस आरोप का क्या जब कविता समाज में अपनी उपस्थिति दिखाने के लिए की जाए। गोया कविता करना सामाजिक प्रतिबद्धता नहीं होकर ग्लैमर हो गई। लोक-कल्याण की बजाय लोकप्रियता का माध्यम बन गई। किसी युग में युवकों द्वारा शरीर-सौष्ठव का प्रदर्शन इसीलिए किया जा सकता था कि भीड़ से अलग दिखाई दे। इसी तरह एक-दो किताबें प्रकाशित होते ही विद्वान और बुद्धिजीवी का तमगा मिल जाता है। सच तो यह है कि विद्वता और रचनाशीलता का आपस में कोई सीधा ताल्लुक नहीं है। बहुत सारे विद्वान रचनात्मकता के पेेटे सिफर साबित हुए हैं। रचनाशीलता के लिए पढ़ा-लिखा होना जरूरी नहीं है। वाल्मीकी और रामायण के बीच संबंधों की भविष्यवाणी कोई कर सकता था? कबीर कहां पढऩे गए थे? सूर ने कौनसे कृष्ण को देखा था? लेकिन इनके जीवन में रचनाशीलता ने निर्णायक भूमिका निभाई। कहा जा सकता है कि इस रचनाशीलता ने इनके जीवन को कविता बना दिया। कविता के रूप में इन्हें जीवन मिल गया। अनुभूति के जिस स्तर पर इन कवियों ने यात्रा की, सच तो यह है कि उसे भी पूरा व्यक्त नहीं कर पाए। क्योंकि, अन्वेषण और अभिव्यक्ति अदृश्य और अनिवर्चनीय है। यह पूर्णत: व्यक्तिगत है और कोई भी दूसरा व्यक्ति यह नहीं बता सकता कि फलां व्यक्ति ने इतना पाया और उसमें से इतना ही दे पाया। यहां तो पात्रता स्वयं की है। हां, स्वयं को यह अच्छे से पता चलता रहता है कि उसकी अनुभूतियों और अभिव्यक्तियों के बीच कितना झोल है। यह कसमसाहट स्तरहीनता के एहसास से जुड़ी होती है। सच्चा रचनाकार इस तरह से अपनी सीमाएं पहचानता है और अपनी रचनात्मकता के जरिये, फिर मैं फिर से फिरकर आता कि तर्ज पर खुद को अभिव्यक्त करता है। इसी को सीमा तोडऩा कहते हैं। इसी को बार-बार एक नए सत्य के साक्षात्कार की प्रक्रिया कहते हैं और इस तरह एक से दूसरे सत्य की टोह लेते हुए रचनाकार कई बार खुद को खारिज करता है तो कई बार अब तक के अनुभव को। इसलिए अनुभवों का परिमार्जन जारी रहना चाहिए। अनुभव का फलक जितना व्यापक होगा, अभिव्यक्त नहीं हो पाने का असंतोष उतना ही बढ़ेगा। यह असंतोष अगर रचनात्मक हो जाए तो फिर क्या तो कविता और क्या कहानी। साहित्य की किसी भी विधा में रचे हुए साहित्य को सराहना मिल सकती है। यह जो एक निराशाजनक माहौल है, उसमें आशा का संचार हो सकता है। बस, यह जान लेना जरूरी है कि रचनात्मक होने का कोई शॉर्ट-कट नहीं है। सच तो यह है कि इसका कोई निर्धारित-पैमाना भी नहीं है। यही वजह है कि सिर्फ चाहने भर से कोई कवि-साहित्यकार बन भी नहीं सकता। सबसे अच्छी बात यह है कि कवि-साहित्यकार होने का दम भरने वाले भी इस सत्य को स्वीकार करते हैं और नैतिक रहते हैं। हम देखते हैं कि भले ही कवियों की संख्या के बारे में कुछ भी कहा जाता रहा हो, लेकिन इन सभी कवियों को यह पता है कि कविता के क्षेत्र में उनकी उड़ान कितनी है।
यहां विज्ञान का शोध पूरी तरह से लागू होता है, जिसमें कहा गया है जैसे-जैसे हम ऊपर जाते हैं, हवा का दबाव कम होने लगता है और एक स्थान तो ऐसा आ जाता है, जहां हम स्थिर हो जाते हैं। न ऊपर जा सकते हैं और न नीचे आ सकते हैं। साहित्य में भी ऐसा ही होता है। सामान्य अनुभवों से भले ही हम धरती पर कूद-फांद कर लें। लिख-छप लें, लेकिन अनुभवों का अन्वेषण हमें जिस यात्रा पर ले जाएगा, वहां जाने के बाद स्पेस जैसे हालात पेश आएंगे। यहीं से निकलना बड़ी चुनौती है। इस चुनौती को पार करने वाले की प्रतीक्षा विस्तृत आकाश करता है। इसलिए हर सृजनशील व्यक्ति के लिए जरूरी है कि 'चांदमारीÓ की बजाय ठोस और सार्थक लिखे। ऐसा लिखे, जिसे कालजयी कहा जा सके। काव्य-रचना बहुत ही कठिन विधा है। कलारूपों में काव्य को बहुत ही सम्मान से देखा जाता है। कला का उत्कृष्ट रूप काव्य और उत्कृष्टतम रूप नाटक को माना गया है। नाटक- संगीत, नृत्य, शिल्प तथा अन्य ललित कलाओं का भी कोष है, लेकिन काव्य में अनुभूतियों में पिरोए हुए शब्द जन-मन तक पहुंचते हैं।

कविता शब्दों का गुम्फन नहीं

कविता वस्तुत: शब्दों का गुम्फन नहीं है। कुछ अक्षरों का समूह नहीं है, जिसे विराम चिह्नों ने अधिक सुंदर बना दिया हो। कविता को समझने वाले शब्द से शब्द के बीच में बचे हुए खाली स्थान (स्पेस) मेंं से कविता का अर्थ बरामद करते हैं। व्यक्ति के मन में यह खाली स्थान उनका एकांत होता है। यहीं पर प्रकट होता है कि अपनी बात को कहने के लिए कवि कितना उत्साही लेकिन सजग है। समय की अनुगूंज के बीच कवि बहुत सारे रहस्यों पर से भी पर्दा उठाता है। इस दृष्टि को समझना ही विषय की गहराई को समझना है। तेजी से बदलती घटनाओं को कोई कवि जिस तरह से संबद्ध करता है, उसे समझना जरूरी है। वेद-पुराणों के आख्यानों, कला-संगीत के प्रतीकों, बातों-मुहावरों की रोचकता से अपनी बात को रखने वाला कवि अपने साथ इस रूप में एक परंपरा का संवाहक होता है।

कविता मन की तृप्ति का साधन

इन सब में वह एक समूचा जीवन अभिव्यक्ति करता है। कला, संस्कृति, सभ्यता के पुनरावलोकन का अवसर देता है। वह जब किसी घटना या व्यक्ति का उल्लेख करता है तो वह उल्लेख भर नहीं होकर एक पूरा संदर्भ होता है। ये छोटे-छोटे संदर्भ विराट फलक की रचना करते हैं। यहां एक बात और उल्लेखनीय है कि कई बार कवियों को जागरण का अग्रदूत भी बता दिया जाता है।
कवि अपने मौलिक रूप में ऐसा कुछ भी नहीं होता है। हां, यह संभव है कि बाजार उसका इस रूप में उपयोग कर ले, लेकिन वस्तुत: एक कवि जन-मन के स्पंदन का कारण सिर्फ उसी अर्थ में बनता है, जब उसे पढ़ा या सुना जाए। कवि किसी के कान में अपनी कविता तो फूंकने से रहा। कवि घर-घर जाकर दूधवाले की बंधी की तरह तो कविताएं बांटने से रहा। कविता तो मन की तृप्ति का साधन है। यह समय जब लोग मन को मारकर बैठे हैं, कविता उन्हें क्या दे सकती है? कविता में तो आदमी स्वयं को ढूंढ़े तो बात बने। जिसने कविता में खुद को पा लिया, उसे जीवन मिल गया। इसलिए हर रचनाकार के लिए जरूरी है कि वह राजनीति की बजाय रचने पर केंद्रित हो। यह दिखाने करने की बजाय कि वह अच्छा लेखक है, अच्छा लिखने की ओर प्रवृत्त हो।

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चाहने भर से नहीं बन जाता कोई कवि

सृजन सरोकार 
 
सृजनशील व्यक्ति के लिए जरूरी है कि 'चांदमारीÓ की बजाय ठोस और सार्थक लिखे। ऐसा लिखे, जिसे कालजयी कहा जा सके। काव्य-रचना बहुत ही कठिन विधा है। कलारूपों में काव्य को बहुत ही सम्मान से देखा जाता है। कला का उत्कृष्ट रूप काव्य और उत्कृष्टतम रूप नाटक को माना गया है। 
विश्व कविता दिवस (21 मार्च) के संदर्भ में इस बात हरीश कर रहे हैं कविता पर बात।  
- हरीश बी.शर्मा
भारतीय साहित्य के इतिहास के प्रारंभिक दौर में जहां कवित्त ही बरामद होता है, उसी देश में आज कविता को सबसे उपेक्षित विधा करार दे दिया गया है। प्रकाशक काव्य-संग्रहों के प्रकाशन को मांग और आपूर्ति के सिद्धांत विपरीत मानते हैं तो मंचों पर चोरी और चुटकले बाजी से आगे बढ़ते हुए मजमेबाजी तक के आरोप कवियों पर लगने लगे हैं। इस दौर में कविता पर आलोचना की जगह व्यंग्य होने लगा है। यहां तक कहा जाने लगा है कि आकाश में कंकर फेंको, नीचे जिस पर भी गिरेगा-कवि होगा। अशोक चक्रधर और कुमार विश्वास के सेलिब्रिटी बन जाने से परेशान लोग भले ही आदर्श के रूप में तुलसी, सूर, मीरा, रसखान, निराला, गुप्त, दिनकर के नाम गिनाएं लेकिन कवि सम्मेलनों में आधे से अधिक कवि अशोक चक्रधर और कुमार विश्वास की शैली की नकल करने वाले फॉलोअर ही मिलते है। 
कुछ लोग जो कविता के माध्यम से कुछ संजीदा करने की कोशिश कर रहे हैं, उनसे किसी को कोई सरोकार नहीं है और यही वजह है कि कवियों के भी जन-सरोकार खत्म होते जा रहे हैं। इस बढ़ती हुई खाई में कुछ ऐसे लोगों की बन आई है, जो ऑन-लाइन कविता सिखा सकते हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से ऐसे गुरुओं ने कविता की कुछ 'झटपट-विधियोंÓ का आविष्कार किया है, जो रातोंरात कवि बनाने का सामथ्र्य पैदा कर सकती है। रोचक तथ्य यह है कि ऐसे लोगों को धन और समर्थन भी खूब मिल रहा है। नव-रचनाकार इनके ईजाद किए हुए फार्मूलों से कविताएं रच रहे हैं, छप रहे हैं और सराहे जा रहे हैं। दावा यह है कि इस इंस्टेट-फार्मूले से तैयार अठारह हजार कवियों के बूते जल्द ही एक युग का प्रवत्र्तन होने वाला है! यह ये समकालीन कविता का परिदृश्य।  
भले ही इसे इस रूप में निराशाजनक नहीं कहा जा सकता कि कविता कर रहे समाज में संवेदना होती है, लेकिन उस आरोप का क्या जब कविता समाज में अपनी उपस्थिति दिखाने के लिए की जाए। गोया कविता करना सामाजिक प्रतिबद्धता नहीं होकर ग्लैमर हो गई। लोक-कल्याण की बजाय लोकप्रियता का माध्यम बन गई। किसी युग में युवकों द्वारा शरीर-सौष्ठव का प्रदर्शन इसीलिए किया जा सकता था कि भीड़ से अलग दिखाई दे। इसी तरह एक-दो किताबें प्रकाशित होते ही विद्वान और बुद्धिजीवी का तमगा मिल जाता है। सच तो यह है कि विद्वता और रचनाशीलता का आपस में कोई सीधा ताल्लुक नहीं है। बहुत सारे विद्वान रचनात्मकता के पेेटे सिफर साबित हुए हैं। 
रचनाशीलता के लिए पढ़ा-लिखा होना जरूरी नहीं है। वाल्मीकी और रामायण  के बीच संबंधों की भविष्यवाणी कोई कर सकता था? कबीर कहां पढऩे गए थे? सूर ने कौनसे कृष्ण को देखा था? लेकिन इनके जीवन में रचनाशीलता ने निर्णायक भूमिका निभाई। कहा जा सकता है कि इस रचनाशीलता ने इनके जीवन को कविता बना दिया। कविता के रूप में इन्हें जीवन मिल गया। अनुभूति के जिस स्तर पर इन कवियों ने यात्रा की, सच तो यह है कि उसे भी पूरा व्यक्त नहीं कर पाए। क्योंकि , अन्वेषण और अभिव्यक्ति अदृश्य और अनिवर्चनीय है। यह पूर्णत: व्यक्तिगत है और कोई भी दूसरा व्यक्ति यह नहीं बता सकता कि फलां व्यक्ति ने इतना पाया और उसमें से इतना ही दे पाया। यहां तो पात्रता स्वयं की है। 
हां, स्वयं को यह अच्छे से पता चलता रहता है कि उसकी अनुभूतियों और अभिव्यक्तियों के बीच कितना झोल है। यह कसमसाहट स्तरहीनता के एहसास से जुड़ी होती है। सच्चा रचनाकार इस तरह से अपनी सीमाएं पहचानता है और अपनी रचनात्मकता के जरिये, फिर मैं फिर से फिरकर आता कि तर्ज पर खुद को अभिव्यक्त करता है। इसी को सीमा तोडऩा कहते हैं। इसी को बार-बार एक नए सत्य के साक्षात्कार की प्रक्रिया कहते हैं और इस तरह एक से दूसरे सत्य की टोह लेते हुए रचनाकार कई बार खुद को खारिज करता है तो कई बार अब तक के अनुभव को। इसलिए अनुभवों का परिमार्जन जारी रहना चाहिए। 
अनुभव का फलक जितना व्यापक होगा, अभिव्यक्त नहीं हो पाने का असंतोष उतना ही बढ़ेगा। यह असंतोष अगर रचनात्मक हो जाए तो फिर क्या तो कविता और क्या कहानी। साहित्य की किसी भी विधा में रचे हुए साहित्य को सराहना मिल सकती है। यह जो एक निराशाजनक माहौल है, उसमें आशा का संचार हो सकता है। 
बस, यह जान लेना जरूरी है कि रचनात्मक होने का कोई शॉर्ट-कट नहीं है। सच तो यह है कि इसका कोई निर्धारित-पैमाना भी नहीं है। यही वजह है कि सिर्फ चाहने भर से कोई कवि-साहित्यकार बन भी नहीं सकता। सबसे अच्छी बात यह है कि कवि-साहित्यकार होने का दम भरने वाले भी इस सत्य को स्वीकार करते हैं और नैतिक रहते हैं। हम देखते हैं कि भले ही कवियों की संख्या के बारे में कुछ भी कहा जाता रहा हो, लेकिन इन सभी कवियों को यह पता है कि कविता के क्षेत्र में उनकी उड़ान कितनी है। यहां विज्ञान का शोध पूरी तरह से लागू होता है, जिसमें कहा गया है जैसे-जैसे हम ऊपर जाते हैं, हवा का दबाव कम होने लगता है और एक स्थान तो ऐसा आ जाता है, जहां हम स्थिर हो जाते हैं। न ऊपर जा सकते हैं और न नीचे आ सकते हैं। साहित्य में भी ऐसा ही होता है। सामान्य अनुभवों से भले ही हम धरती पर कूद-फांद कर लें। लिख-छप लें, लेकिन अनुभवों का अन्वेषण हमें जिस यात्रा पर ले जाएगा, वहां जाने के बाद स्पेस जैसे हालात पेश आएंगे। यहीं से निकलना बड़ी चुनौती है। इस चुनौती को पार करने वाले की प्रतीक्षा विस्तृत आकाश करता है। 
इसलिए हर सृजनशील व्यक्ति के लिए जरूरी है कि 'चांदमारीÓ की बजाय ठोस और सार्थक लिखे। ऐसा लिखे, जिसे कालजयी कहा जा सके। काव्य-रचना बहुत ही कठिन विधा है। कलारूपों में काव्य को बहुत ही सम्मान से देखा जाता है। कला का उत्कृष्ट रूप काव्य और उत्कृष्टतम रूप नाटक को माना गया है। नाटक- संगीत, नृत्य, शिल्प तथा अन्य ललित कलाओं का भी कोष है, लेकिन काव्य में अनुभूतियों में पिरोए हुए शब्द जन-मन तक पहुंचते हैं। कविता वस्तुत: शब्दों को गुम्फन नहीं है। कुछ अक्षरों का समूह नहीं है, जिसे विराम चिह्नों ने अधिक सुंदर बना दिया हो। कविता को समझने वाले शब्द से शब्द के बीच में बचे हुए खाली स्थान (स्पेस) मेंं से कविता का अर्थ बरामद करते हैं। व्यक्ति के मन में यह खाली स्थान उनका एकांत होता है। यहीं पर प्रकट होता है कि अपनी बात को कहने के लिए कवि कितना उत्साही लेकिन सजग है।  समय की अनुगूंज के बीच कवि बहुत सारे रहस्यों पर से भी पर्दा उठाता है। इस दृष्टि को समझना ही विषय की गहराई को समझना है। तेजी से बदलती घटनाओं को कोई कवि जिस तरह से संबद्ध करता है, उसे समझना जरूरी है। वेद-पुराणों के आख्यानों, कला-संगीत के प्रतीकों, बातों-मुहावरों की रोचकता से अपनी बात को रखने वाला कवि अपने साथ इस रूप में एक परंपरा का संवाहक होता है। 
इन सब में वह एक समूचा जीवन अभिव्यक्ति करता है। कला, संस्कृति, सभ्यता के पुनरावलोकन का अवसर देता है। वह जब किसी घटना या व्यक्ति का उल्लेख करता है तो वह उल्लेख भर नहीं होकर एक पूरा संदर्भ होता है। ये छोटे-छोटे संदर्भ विराट फलक की रचना करते हैं।  यहां एक बात और उल्लेखनीय है कि कई बार कवियों को जागरण का अग्रदूत या क्रांतिचेता भी बता दिया जाता है। कवि अपने मौलिक रूप में ऐसा कुछ भी नहीं होता है। हां, यह संभव है कि बाजार उसका इस रूप में उपयोग कर ले, लेकिन वस्तुत: एक कवि जन-मन के स्पंदन का कारण सिर्फ उसी अर्थ में बनता है, जब उसे पढ़ा या सुना जाए। कवि किसी के कान में अपनी कविता तो फूंकने से रहा। कवि घर-घर जाकर दूधवाले की बंधी की तरह तो कविताएं बांटने से रहा। कविता तो मन की तृप्ति का साधन है। यह समय जब लोग मन को मारकर बैठे हैं, कविता उन्हें क्या दे सकती है? कविता में तो आदमी स्वयं को ढूंढ़े तो बात बने। जिसने कविता में खुद को पा लिया, उसे जीवन मिल गया। इसलिए हर रचनाकार के लिए जरूरी है कि वह राजनीति की बजाय रचने पर केंद्रित हो। यह दिखाने करने की बजाय कि वह अच्छा लेखक है, अच्छा लिखने की ओर प्रवृत्त हो। 
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साहित्य समाज में भी है वर्ण-व्यवस्था

साहित्य में संभ्रांत या मुख्यधारा के साहित्यकार की श्रेणियों का आविष्कार वैसा ही है, जैसे समाज में वर्ण-व्यवस्था या साफ शब्दों में कहें तो ऊंच-नीच और इसी के चलते जब कुछ अनपढ़ या कम पढ़े हुए बहुत अच्छा लिख गए तो यहां तक कहा गया कि संभवतया इन्हें खुद को पता नहीं है कि इन्होंने कितना अच्छा लिख दिया है। यह व्यक्ति पर फब्ती थी। समझ पर संशय था। यह इस बात को जताने की चेष्टा थी कि सही तरीके से शिक्षा-दीक्षा या ज्ञानार्जन के बगैर साहित्य रचना संभव तो है लेकिन यह संदिग्ध है कि जो रचा जा रहा है, उसके प्रभाव और क्षमता से खुद रचनाकार भी परिचित भी है या नहीं। और इस तरह से साहित्य शिक्षाविदों, जानकारों और समझदारों का हो गया। 

यह बात स्थापित हो गई कि जो कहा जाए, उसके प्रभावों का ज्ञान होना चाहिए और जो पढ़ा जाए, उसे एक नए तरीके से समझने-समझाने की क्षमता भी रचनाकार में होनी चाहिए। उसकी बात में एक चमत्कृति होनी चाहिए। भले ही इस चमत्कार को समझने वाले बहुत कम हो लेकिन बात का वजन बढ़ा-चढ़ा होना चाहिए। इस वजह से एक तरफ जहां पांडित्यपूर्ण साहित्य की रचना होने लगी। गूढ़ार्थी कविताएं लिखी जाने लगी। लालित्यपूर्ण गद्य रचा जाने लगा और इसी आधार पर समालोचना और आलोचनाएं होने लगी। यही वह दौर था जब एक बड़ा हादसा यह हुआ कि आलोचना को बुराई माना जाने लगा। कोई शब्द किस तरह से कुछ भ्रांतियों की वजह से अपना अस्तित्व खो सकता है, आलोचना शब्द के साथ हुए हादसे से जाना-पहचाना जा सकता है।
आलोचना शब्द लोचन यानी आंखों से बना है, जिसका अर्थ समग्र दृष्टि से है। नए संदर्भ में बात करें तो तीन सौ साठ डिग्री पर कसा हुआ विवेचन। इस के तहत समीक्ष्य कृति की विधा के परिप्रेक्ष्य में जांच होती और समीक्षक अपनी बात कहता। यह बात जैसे-जैसे बुरी लगने लगी, आलोचना का अर्थ भी बुराई से लिया जाने लगा। हालांकि इसके लिए जिम्मेदार तत्कालीन वाद या विचार हैं। पंडितों ने विधा की अपनी दृष्टि से समीक्षा की जबकि समग्र दृष्टि से बात होनी चाहिए थी और यहीं से आलोचना शब्द का अर्थ बदलने लगा। बदले हुए अर्थ पर मुहर तब लग गई जब समीक्ष्य कृति को आम जन में तो स्वीकृति मिली लेकिन समीक्षकों से नहीं।
इसका बहुत बड़ा उदाहरण हमें रामचरित मानस लिखने वाले गोस्वामी तुलसीदास के प्रसंग से मिलता है कि एक बार वे ऐसे हताश हुए कि मानस की पांडुलिपि को पानी में बहाने का विचार तक कर लिया। तुलसीदास की पांडुलिपि तो बच गई लेकिन जाने कितनी पांडुलिपियां संभ्र्रांत और मुख्यधारा के साहित्य के काबिल नहीं होने की वजह से वक्त के प्रवाह में बह गई और बाद में कभी बरामद नहीं हो सकी।
हालांकि, इसका एक अच्छा प्रभाव यह पड़ा कि कुछ वाद और विचार के स्तर पर बड़ा काम हुआ। बहुत सारे पंडितों ने एकराय होकर वाद और विचारों पर बड़ा काम करते हुए सम्प्रदाय तक खड़ा किया। अपनी बात को रखने के लिए न सिर्फ वाद आधारित चिंतन हुआ बल्कि सृजन भी हुआ। एक कवि हुए मम्मट। उनके समय का एक किस्सा जो बहुत ही चाव से आज भी खराब-कविता को खराब नहीं कहने की एवज में सुनाया जाता है। यह किस्सा कुछ इस तरह है कि मम्मट के पास एक युवक अपनी कविताओं की पांडुलिपि लेकर पहुंचा और बोला कि इसमें आवश्यक सुधार बता दीजिए। मम्मट ने वह पांडुलिपि रख ली और कुछ दिन बाद आने के लिए कहा। कुछ दिन बाद युवक आया तो उसे देखते ही मम्मट उसकी ओर दौड़े और उसे अपनी बाहों में भरते हुए कहा कि जो काम मैं पिछले कई सालों में नहीं कर सका, वह तुमने इस पांडुलिपि में कर दिया। यह सुनकर युवक उत्साह में भरकर पूछा, 'वह कैसे आदरणीय?Ó
मम्मट ने कहा, 'मैं एक ऐसी कृति रचना चाहता था, जिसमें सभी तरह के काव्यदोष हों, तुमने यह पांडुलिपि ऐसी बनाई है कि अब मुझे काव्यदोष बताने के लिए किसी भी तरह के दूसरे उदाहरणों की जरूरत ही नहीं है!Ó
यह एक उदाहरण है, जिससे यह पता चलता है कि साहित्य के पंडित सृजन को लेकर कितने सजग रहते थे और सृजन कैसा होना चाहिए, इस पर निरंतर बात करते रहते थे। इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि कहने का अधिकार उसी को मिला जिसके पास समझ है और समझ का पैरामीटर भी श्रेष्ठ स्तर पर भाषा और व्याकरण की शिक्षा-दीक्षा स्थापित किया गया। ऐसे में वर्तनी को नहीं समझने वाले, शब्द के प्रभावों से अनभिज्ञ और अभिधा-व्यंजना की ताकत से बचकर मध्यममार्ग तलाशने वाले कभी भी संभ्रांत या मुख्यधारा के रचनाकार नहीं बन सके। बहुत हद तक यह सही भी था लेकिन धीरे-धीरे इन सभी का रूप-स्वरूप बिगडऩे लगा और कालांतर में हम देखते हैं कि वाद का पूरी तरह से राजनीतिकरण हो चुका है तो विमर्श के नाम पर नित-नए नाम सामने आ रहे हैं। इनका सबसे अधिक बिगड़ा हुआ स्वरूप लॉबियों से पहचाना जाता है, जिसके उदाहरण भारत भवन से लेकर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और साहित्य अकादमियों तो इधर लिटरेचर फेस्टीवल और जश्ने-रेखता तक बिखरे हैं।

दरबारों-हवेलियों से होते हुए...

समाज में सृजनधर्मियों का सम्मान सदैव होता रहा है। पहले राजदरबारों में कवियों-शायरों का सम्मान होता था। फिर यह जिम्मेदारी सेठ-साहूकारों ने उठा ली। बीकानेर में दसेक साल पहले ही रामपुरिया हवेली में साहित्यकार सम्मान की परंपरा बंद हुई है। सन् 2000 से पहले सक्रिय साहित्यकारों के पास आज भी हवेली से मिली स्वेटर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मिल जाएगी। शब्द-ऋषि सम्मान भी होता था। राजा-महाराजा गए और सेठ साहूकार भी थक गए तो संस्थाओं ने यह भार उठाया। लिहाजा, जाते साल तीन सम्मान समारोह की सूचना है, एक हो चुका। डूंगर कॉलेज में उर्दू विभागाध्यक्ष डॉ. मोहम्मद हुसैन की सरपरस्ती में एक संस्था बनी है-बज्में फिक्रो फन। इस संस्था की ओर से आनंद निकेतन में बीते रविवार पांच साहित्यकारों का सम्मान हुआ। टोंक के शायर डॉ.अरशद अब्दुल हमीद को गालिब अवार्ड दिया गया। आबिद हसन को शेख निसार अहमद निसार अवार्ड, अल्ला बख्श साहिल को शेख मोहम्मद इब्राहिम अवार्ड और अल्लाबख्श सर्वा तथा अमीनुद्दीन शौकजामी को बेदिल अवार्ड से नवाजा गया। अब प्रेरणा प्रतिष्ठान डॉ.उषाकिरण सोनी को सुंदर सुरभि सम्मान, राजेंद्र जोशी को राजरत्न सम्मान और डॉ.गौरव बिस्सा अमरकीर्ति सम्मान प्रदान करेगी। यह संस्था वरिष्ठ कवि भवानीशंकर व्यास 'विनोदÓ के निर्देशन में चल रही है। इस बीच कथाकार नदीम अहमद नदीम और शायर वली मोहम्मद गौरी के प्रयासों से प्रारंभ हुए शहीद अशफाकउल्ला खां सम्मान से विभूषित होने वाले साहित्यकारों की सूची भी जारी हो गई है। हिंदी साहित्य के लिए बुलाकी शर्मा, राजस्थानी साहित्य के लिए मोनिका गौड़ और उर्दू साहित्य के लिए जियाउलहसन कादरी सहित रंगकर्म हेतु सुरेश हिंदुस्तानी, समाजसेवा के क्षेत्र में हीरालाल हर्ष और पत्रकारिता के लिए इसरार हसन कादरी को सम्मानित किया जाएगा।

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रचना के पीछे चलती है आलोचना

अगर कोई आलोचक किसी विधा में रचना भी करता है तो क्या वह इस बात की घोषणा कर सकता है कि उसने जो रचा है, वह उस विधा का आदर्श और कालजयी स्वरूप है। समीक्षा, आलोचना, समालोचना थोड़े-बहुत अंतरों के साथ लगभग एक ही जगह पर आकर खड़े हो जाते हैं। आलोचना वस्तुत: रचना पर आश्रित विधा है। रचना के बगैर आलोचना का अस्तित्व ही नहीं। साहित्य में इस विधा की सृष्टि उन लोगों के लिए हुई जो नीर-क्षीर विवेक के साथ, तटस्थ रहते हुए शास्त्रीय आधार पर अपनी बात को रखना जानते हैं। परंपरा का ज्ञान हो, प्रयोगों की पहचान हो और जिस विधा में आलोचना करे, उसके शास्त्रीय पक्ष से जान-पहचान हों। भाषा की दक्षता के साथ-साथ वर्तनी की शुद्धता का पता हो और सबसे महत्वपूर्ण बात नवाचारों को समझने की सकारात्मक दृष्टि हो। 

इन सब के अभाव में आलोचना, समीक्षा और समालोचना के नाम पर जो भी हो रहा है, वह पत्रवाचन की सीमा से बाहर नहीं निकल पाता। आलोचना वही कर सकता है, जो निर्भय लेकिन न्यायसंगत हो। ऐसा विद्वान जिसे अपनी बात विनम्रता से कहनी आती हो, आलोचना के क्षेत्र में प्रिय हो जाता है। ऐसा नहीं होने की स्थिति में भले ही कोई आलोचक स्वयं को खारा या क्रूर साबित करने की कोशिश करता रहे, उसे जन-मन में मान्यता नहीं मिलती। एक आलोचक के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती होती है कि वह जन-मन की मान्यता को साथ लेकर अपनी बात कहे।
जैसे ही कोई आलोचक जन-मन को अल्पज्ञ या नासमझ मानकर अपनी बात के साथ हावी होने की कोशिश करता है, उसका जलवा बिखरने लगता है। यहां जन-कवि भीम पांडिया की एक बात बड़ी गहरी लेकिन समीचीन मालूम होती है। वे अपनी बात को रोचक अंदाज में ऐसे कहते थे कि रवि का प्रकाश लेने वाले सारे कवि हैं। जैसे ही कोई यह सुनता, दो प्रतिक्रियाएं होती। पहली बात में उसे लगता कि यह तुकबंदी के अलावा कुछ नहीं है, दूसरा इस बात पर मंथन होता कि एक जिम्मेदार कवि अगर यह कह रहा है तो कुछ न कुछ तो बात होगी है।
भीम पांडिया समझाते कि जो जीव है, प्राणी है उसमें कवित्व इस रूप में है कि वह बात को समझ सकता है, कहने की कला भले ही नहीं आए लेकिन कवि सम्मेलन में अंतिम-छोर पर बैठा कोई सामान्य सा श्रोता अगर किसी कवि की कविता पर वाह-वाह करता है तो यह अकारण नहीं है। इसका कारण यह है कि उसके पास समझ है, संवेदना है, अनुभूति है लेकिन अभिव्यक्ति के मामले में वह मंच पर बैठे कवि से कमजोर है। इस रूप में रवि का प्रकाश लेने वाले सारे कवि हुए।
भीम पांडिया से असहमत होने का अधिकार ठीक वैसा ही है, जैसा कोई उनसे सहमत होने में अपना अधिकार माने, लेकिन उनकी बात को खारिज नहीं किया जा सकता। समझदार होने का हक सभी को है। सहमत-असहमत होने का अधिकार सभी के पास है। ऐसे में एक आलोचक के सामने यह चुनौती होती है कि वह किस तरह सभी लोगों के ग्रहण करने के तरीके को समझते हुए अपनी बात को रखे। इसके लिए ्रएक तरफ जहां आलोचक को जन-मन की बात को समझने के लिए एक दृष्टिबोध चाहिए होता है तो दूसरी ओर, जिस विधा में वह अपनी बात कह रहा है, उसमें अब तक हुए प्रतिनिधि रचनाकारों से भी परिचित होना जरूरी होता है। यहां यह उल्लेखनीय है कि अधिकांश वाद-विचार या सम्प्रदायों की स्थापना में आलोचकों का ही बड़ा योगदान रहा है। रचनाकार ने तो अपनी बात कह दी। उसे एक दृष्टिबोध के साथ समझते हुए उसे श्रेणियों में समझाने का काम आलोचक ने ही किया। कोई भी रचनाकार अव्वल तो किसी वाद-विचार या विमर्श के खाके खड़े करके रचना कर ही नहीं सकता। अगर वह करता भी है तो वह रचनाकार के नाते सबसे पहले खारिज होता है और राजनीति का हथियार भर बनकर रह जाता है।
फिर रचनाकार तो यह घोषणा भी कर सकता है कि उसकी कोई रचना किस वाद-विचार या विमर्श से प्रेरित है, उसे नहीं पता लेकिन आलोचक यह नहीं कह सकता कि उसे किसी रचना-विधान के मूल-सूत्रों की जानकारी नहीं है। वह किसी भी रचनाकार को इस तरह खारिज नहीं कर सकता कि फलां रचनाएं अच्छी है और फलां बेकार। यह तो सामान्य समझ वाला श्रोता भी कर सकता है। आलोचक के सामने अच्छी को अच्छी साबित करने की चुनौती होती है तो खराब को खराब साबित करने का साहस। बहुत सारे आलोचकों ने ऐसा किया भी है और उन्हें मान्यता भी मिली है, लेकिन कमी के कारण यहां भी पक्षपात होने लगा है।
अपनों को प्रतिष्ठा दिलाने और जानबूझकर आंखें बंद करके किसी और को समानांतर खड़ा करने की कोशिश की जाने लगी। यही वजह है कि आलोचना अस्वीकार होने लगी है। इससे जो प्रतिरोध का स्वर उभर रहा है, उसका हासिल यह है कि ऐसे आलोचकों को तो पूरी तरह से खारिज किया जाने लगा है जो खुद भी उसी विधा में सृजनरत हैं। वस्तुत: आलोचना का काम रचनाकारों का कभी रहा ही नहीं। आलोचना का अपना एक शास्त्र है, सिद्धांत है। रचनाकर्म से बहुत बाद की बल्कि रचना पर आश्रित विधा है आलोचना।

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कलाओं का कोलाज है नाटक

नाट्य-कर्म कलाओं का कोलाज है। यहां संगीत, नृत्य, गायन, वादन, चित्र और काव्य का एक ऐसा मंडल बनता है जो दर्शकों को भाव-विभोर करने की क्षमता रखे। इसी लिए नाट्य-मंडली या रंग-मंडल जैसे शब्द प्रचलन में आए। एक ऐसा वातावरण जहां सभी कलाओं के ज्ञाता हों और एक दिशा में चलने के अभ्यस्त हों। ध्येय एक हो, नाटक खेलना। वस्तुत: यह खुद को साधने की कला होती है और समस्त कलाएं मंच के इस साधक को ऊर्जावान बनाए रखने के लिए होती है। इसीलिए नाटक को अभिनेता का माध्यम कहा गया है। अभिनेता नाटक का वह चेहरा होता है, जिसके बूते पूरा परिदृश्य अभिव्यक्त होता है और हम देखते हैं कि बहुत सारे नाटक अपने पात्रों की वजह से सदियों तक याद रखे जाते हैं। बहुत सारे नाटकों के निर्देशक तो क्या लेखकों के नाम भी याद नहीं रहते लेकिन उनके पात्रों का नाम याद रहता है। थैंक यू मिस्टर ग्लाड, अंधायुग, तुगलक, भोमा, कोर्ट मार्शल, सखाराम बाइंडर, अजातघर, खबसूरत बहू, बिन बाती के दीप, आत्मकथा, तीडोराव और ऐसे ही कई नाटक अपने पात्रों की वजह से, अभिनेता की वजह से पहचाने गए।

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अभिनेता का माध्यम है नाटक...

तीन दिन नई दिल्ली में नाट्य समारोह में शिरकत करके लौटे हरीश बता रहे हैं कि दौड़ती-भागती जिंदगी और दुष्कर्म के लिए बदनाम दिल्ली में सृजनात्मकता के आयाम आशा जगाते हैं। - सं


अभी नई दिल्ली के मंडी हाउस को एक बार फिर नये सिरे से देखने का मौका मिला। नई दिल्ली का यह इलाका कला-साहित्य के नाम आरक्षित है। इधर से आपको तानसेन मार्ग निकलता दिखाई देगा तो सफदर हाशमी की याद में भी एक रास्ता जाता है। कला-साहित्य के नाम पर होने वाली अधिकांश केंद्रीय गतिविधियों का यही संकुल है। साहित्य अकादेमी, एनएसडी, श्रीराम सेंटर और फिर एक पंगत में विभिन्न राज्यों के नाम से बने हुए भवन और वहां राज्यों की संस्कृति के साथ-साथ सुस्वादु भोजन का भी प्रबंध। दौड़ती-भागती जिंदगी के लिए बदनाम हो रही दिल्ली में यह जगह एक उदाहरण है कि दिल्ली में अभी भी सृजनात्मकता बाकी है और इससे भी आगे कि बात जब देश के दूसरे शहरों में कला-साहित्य संबंधी विषय अधेड़ से प्रौढ़ होती पीढ़ी के हो गए हैं तो यहां आपको औसत 25 से 30 साल के युवा मिलेंगे जो पेशेवर रंगकर्मी बन चुके हैं। छोटे-छोटे ग्रुप बना चुके हैं। नाटक करते हैं और यहां तक की अपना एक दर्शक वर्ग बना चुके हैं। वे दावा करते हैं कि हमारी अपनी ऑडियंस है।
श्रीराम सेंटर में शो शुरू होने से पहले टिकट के लिए लाइन लगती है और प्रवेश भी लाइन से होता है। मोहन राकेश सम्मान समारोह में चयनित चार नाटकों में से तीन को देखने का मौका मिला और जानकार आश्चर्य हुआ कि धनतेरस पर भी हॉल खचाखच भरा हुआ था। सीट नहीं मिली तो दर्शक जमीन पर बैठे थे। यह एक दिन की बात नहीं है। यह निरंतर और निराश हुए बगैर काम करने का नतीजा है और इससे भी अधिक सोचना चाहें तो यह किसी एक प्रस्तुति के असफल होने से अवसाद में आने की बजाय अगली प्रस्तुति को और अधिक बेहतर-प्रभावी बनाने का संकल्प है, जिसका आदि सूत्र 'शो मस्ट गो ऑनÓ में छिपा है।
और यह सब सेवा में नहीं है। स्वांत: सुखाय नहीं है। अर्थयुक्त है। पैसे से जुड़ा मसला है। अच्छे रंगकर्मी के लिए काम की कमी नहीं है। समयबद्ध तरीके से किसी प्रोजेक्ट पर काम शुरू होता है और रंगकर्मियों का उसी के आधार पर भुगतान भी होता है। लेखक को भी नाट्यमंचन की रॉयल्टी मिलती है। मुझे तब हैरानी हुई जब मैंने देखा कि श्रीराम सेंटर के बाहर जमीन पर किताब बेचने वाली महिला पोयट्री और कॉमेडी ड्रामा मांगने पर न सिर्फ नाट्यकृतियों की पूरी फेहरिस्त गिना रही थी बल्कि यह समझाने में भी सक्षम थी कि कौनसा नाटक कितनी बार हुआ है या अब तक एक भी मंचन नहीं हुआ है।

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कह दिया, जो कविता को कहना था...

मेरी बात कविता के एक बड़े पाठक की उस जिज्ञासा से शुरू होती है, जब वह अपनी पसंद के एक कवि को पढ़ते हुए उसमें रीपीटेशन की शिकायत एक अन्य कवि से करते हुए अपना सवाल रखते हैं। पाठक को जवाब मिलता है कि तुम ठीक कह रहे हो। फलां कवि खुद की कविताओं में अपने पहले कहे हुए को ही रीपीट कर रहा है, क्योंकि अब कविता के माध्यम से कुछ कहा जाना शेष नहीं रहा है। कविता के माध्यम से जो कुछ कहा जाना था, वह कह दिया गया है। अब तो सिर्फ तरीका है कि आप अपनी बात को कैसे कहते हैं। इन दो विद्वानों के बीच हुई बात मुझे तुरंत पांच हजार साल पहले रचे महाकाव्य 'जय संहिताÓ तक पहुंचा देती है। जय संहिता, जो बाद में महाभारत के नाम से लोकप्रिय हुई। इस गंं्रथ के रचयिता वेदव्यास ने पहले श्लोक में लिखा है कि जो जय में है, वह सृष्टि में है और जो सृष्टि में नहीं है, वह जय में भी नहीं है।

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