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साहित्य सरोकार (हरीश बी शर्मा) (4)

कलाओं का कोलाज है नाटक

नाट्य-कर्म कलाओं का कोलाज है। यहां संगीत, नृत्य, गायन, वादन, चित्र और काव्य का एक ऐसा मंडल बनता है जो दर्शकों को भाव-विभोर करने की क्षमता रखे। इसी लिए नाट्य-मंडली या रंग-मंडल जैसे शब्द प्रचलन में आए। एक ऐसा वातावरण जहां सभी कलाओं के ज्ञाता हों और एक दिशा में चलने के अभ्यस्त हों। ध्येय एक हो, नाटक खेलना। वस्तुत: यह खुद को साधने की कला होती है और समस्त कलाएं मंच के इस साधक को ऊर्जावान बनाए रखने के लिए होती है। इसीलिए नाटक को अभिनेता का माध्यम कहा गया है। अभिनेता नाटक का वह चेहरा होता है, जिसके बूते पूरा परिदृश्य अभिव्यक्त होता है और हम देखते हैं कि बहुत सारे नाटक अपने पात्रों की वजह से सदियों तक याद रखे जाते हैं। बहुत सारे नाटकों के निर्देशक तो क्या लेखकों के नाम भी याद नहीं रहते लेकिन उनके पात्रों का नाम याद रहता है। थैंक यू मिस्टर ग्लाड, अंधायुग, तुगलक, भोमा, कोर्ट मार्शल, सखाराम बाइंडर, अजातघर, खबसूरत बहू, बिन बाती के दीप, आत्मकथा, तीडोराव और ऐसे ही कई नाटक अपने पात्रों की वजह से, अभिनेता की वजह से पहचाने गए।

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अभिनेता का माध्यम है नाटक...

तीन दिन नई दिल्ली में नाट्य समारोह में शिरकत करके लौटे हरीश बता रहे हैं कि दौड़ती-भागती जिंदगी और दुष्कर्म के लिए बदनाम दिल्ली में सृजनात्मकता के आयाम आशा जगाते हैं। - सं


अभी नई दिल्ली के मंडी हाउस को एक बार फिर नये सिरे से देखने का मौका मिला। नई दिल्ली का यह इलाका कला-साहित्य के नाम आरक्षित है। इधर से आपको तानसेन मार्ग निकलता दिखाई देगा तो सफदर हाशमी की याद में भी एक रास्ता जाता है। कला-साहित्य के नाम पर होने वाली अधिकांश केंद्रीय गतिविधियों का यही संकुल है। साहित्य अकादेमी, एनएसडी, श्रीराम सेंटर और फिर एक पंगत में विभिन्न राज्यों के नाम से बने हुए भवन और वहां राज्यों की संस्कृति के साथ-साथ सुस्वादु भोजन का भी प्रबंध। दौड़ती-भागती जिंदगी के लिए बदनाम हो रही दिल्ली में यह जगह एक उदाहरण है कि दिल्ली में अभी भी सृजनात्मकता बाकी है और इससे भी आगे कि बात जब देश के दूसरे शहरों में कला-साहित्य संबंधी विषय अधेड़ से प्रौढ़ होती पीढ़ी के हो गए हैं तो यहां आपको औसत 25 से 30 साल के युवा मिलेंगे जो पेशेवर रंगकर्मी बन चुके हैं। छोटे-छोटे ग्रुप बना चुके हैं। नाटक करते हैं और यहां तक की अपना एक दर्शक वर्ग बना चुके हैं। वे दावा करते हैं कि हमारी अपनी ऑडियंस है।
श्रीराम सेंटर में शो शुरू होने से पहले टिकट के लिए लाइन लगती है और प्रवेश भी लाइन से होता है। मोहन राकेश सम्मान समारोह में चयनित चार नाटकों में से तीन को देखने का मौका मिला और जानकार आश्चर्य हुआ कि धनतेरस पर भी हॉल खचाखच भरा हुआ था। सीट नहीं मिली तो दर्शक जमीन पर बैठे थे। यह एक दिन की बात नहीं है। यह निरंतर और निराश हुए बगैर काम करने का नतीजा है और इससे भी अधिक सोचना चाहें तो यह किसी एक प्रस्तुति के असफल होने से अवसाद में आने की बजाय अगली प्रस्तुति को और अधिक बेहतर-प्रभावी बनाने का संकल्प है, जिसका आदि सूत्र 'शो मस्ट गो ऑनÓ में छिपा है।
और यह सब सेवा में नहीं है। स्वांत: सुखाय नहीं है। अर्थयुक्त है। पैसे से जुड़ा मसला है। अच्छे रंगकर्मी के लिए काम की कमी नहीं है। समयबद्ध तरीके से किसी प्रोजेक्ट पर काम शुरू होता है और रंगकर्मियों का उसी के आधार पर भुगतान भी होता है। लेखक को भी नाट्यमंचन की रॉयल्टी मिलती है। मुझे तब हैरानी हुई जब मैंने देखा कि श्रीराम सेंटर के बाहर जमीन पर किताब बेचने वाली महिला पोयट्री और कॉमेडी ड्रामा मांगने पर न सिर्फ नाट्यकृतियों की पूरी फेहरिस्त गिना रही थी बल्कि यह समझाने में भी सक्षम थी कि कौनसा नाटक कितनी बार हुआ है या अब तक एक भी मंचन नहीं हुआ है।

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कह दिया, जो कविता को कहना था...

मेरी बात कविता के एक बड़े पाठक की उस जिज्ञासा से शुरू होती है, जब वह अपनी पसंद के एक कवि को पढ़ते हुए उसमें रीपीटेशन की शिकायत एक अन्य कवि से करते हुए अपना सवाल रखते हैं। पाठक को जवाब मिलता है कि तुम ठीक कह रहे हो। फलां कवि खुद की कविताओं में अपने पहले कहे हुए को ही रीपीट कर रहा है, क्योंकि अब कविता के माध्यम से कुछ कहा जाना शेष नहीं रहा है। कविता के माध्यम से जो कुछ कहा जाना था, वह कह दिया गया है। अब तो सिर्फ तरीका है कि आप अपनी बात को कैसे कहते हैं। इन दो विद्वानों के बीच हुई बात मुझे तुरंत पांच हजार साल पहले रचे महाकाव्य 'जय संहिताÓ तक पहुंचा देती है। जय संहिता, जो बाद में महाभारत के नाम से लोकप्रिय हुई। इस गंं्रथ के रचयिता वेदव्यास ने पहले श्लोक में लिखा है कि जो जय में है, वह सृष्टि में है और जो सृष्टि में नहीं है, वह जय में भी नहीं है।

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लिखने वालों के लिए सृजन का प्रवेश-द्वार है लघुकथा

सोशल मीडिया के दौर में लघुकथा साहित्य की सबसे अधिक उपयोग में आने वाली विधा बन गई है। हर व्यक्ति जो कुछ लिखना चाहता है लेकिन सीधे तौर पर बात नहीं करना चाहता, वह लघुकथा के माध्यम को अपनाता है। अप्रत्यक्ष रूप से किसी प्रवृत्ति या घटना पर अपनी दृष्टि रखने का एक सशक्त माध्यम बनती जा रही है लघुकथा। देखा जाए तो इसकी सहजता, सम्पे्रषणीयता और संक्षिप्तता ही ऐसे तीन कारण हैं कि नवोदित का ध्यान भी अपनी ओर खींचते हैं तो प्रौढ़ रचनाकार के लिए भी एक चुनौती बन जाते हैं। चुनौती बनने के दो कारण हैं। पहला तो यह कि लघुकथा कभी भी व्यंग्य या विश्लेषण से निकलते हुए हास्य पैदा करने का कारण बनकर चुटुकले की श्रेणी में आ सकती है। इसके लिए लेखक और खासतौर से प्रतिष्ठित लेखकों से अतिरिक्त श्रम का आग्रह हो जाता है तो दूसरी ओर लघुकथा भले ही भारतेंदु युग से चली आ रही हो, इसके शास्त्रीय स्वरूप या मानकीकरण का काम अभी तक नहीं हुआ है। अभी भी यह व्यंग्य की तरह प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए मशक्कत कर रही है। तो दूसरी ओर कई बार संस्मरण, रेखाचित्र आदि के बीच के फर्क की तरह इसे भी दूसरी विधाओं में शामिल कर लिया जाता है। व्यंग्य के मुकाबले नियमित रूप से लघुकथा लिखने वाले रचनाकारों की संख्या बहुत कम है, इस वजह से इस विधा को अभी भी साहित्य की जाजम पर चर्चा के लिहाज से तीजे-चौथे पायदान पर ही माना जाता है।
सोशल मीडिया ने जरूर इसे मुख्यधारा में लाने की कोशिश की है और यह कोशिश इस रूप में सार्थक भी हुई है कि यह लिखने वालों के लिए साहित्य का प्रवेश द्वार बन गया है, लेकिन यहां यह स्पष्ट करना बहुत जरूरी है कि बात लिखने वालों की हो रही है, लिखना सीखने वालों की नहीं। जिन्हें लिखना आता है, वे छोटी-छोटी घटना और समय को उकेरते हुए अपनी बात को कहने के लिए लघुकथा विधा का उपयोग करते देखें भी जा सकते हैं। क्योंकि हर व्यक्ति के पास पर्याप्त तर्क, तथ्य और भाषा शक्ति नहीं होती, इसलिए वह अपने आसपास और परिवेश में होने वाले घटनाक्रमों पर लिख नहीं पाता, लेकिन जो भी अपने आसपास होते हुए देखता है और इन सभी को देखते हुए जो झंझावात उभरता है, उसे कहने की गुंजाइश भर से एक लघुकथा बना लेता है। अपने भाव, दृष्टि और सामान्य बुनावट के साथ बात कहने का सलीका ही लघुकथा के क्षेत्र में प्रवेश के लिए उर्वर जमीन का कारण बनता है।
सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें न तो घटनाओं की भरमार होती है और न किरदारों की भीड़। थोड़े-से शब्दों में भी अपनी बात कही जा सकती है। हालांकि इन थोड़े-से शब्दों की अधिकतम शब्द-सीमा का अभी तक कहीं निर्धारण नहीं हो सका है। हाल ही में प्रकाशित कथारंग-3 के ‘लघुकथा अंक’ में सबसे छोटी लघुकथा मुकेश व्यास की मिलती है, जो 29 शब्दों की है और अपनी बात कहने में सफल भी, लेकिन कई बार लघुकथा के नाम पर कहानी के शब्दों को कम करने की कोशिशें हास्यास्पद स्थितियां पैदा करती है और ‘कहन’ कमजोर हो जाता है। इसलिए लघुकथा को बजाय शब्दों के एक घटना, एक समय के इर्दगिर्द बुने कथानक से लिया जाता है। जैसे ही लेखक फ्लैशबैक में गया, किरदार रचने शुरू किए या अगले समय में छलांग लगाई वह लघुकथा से दूर होने लगता है। नव-लेखकों की यह बड़ी समस्या होती है कि वे एक समय से दूसरे समय में जाते समय भाषा के मामले में चूक जाते हैं। किरदार रच नहीं पाते और कथानक को सम्पे्रषणीय बनाने के लिए स्मृतियों तथा संयोगों का सही तरीके से आश्रय नहीं ले पाते। इसलिए बड़ी कहानियों की बुनावट करना उनके वश में नहीं होता लेकिन लघुकथा के माध्यम से अपनी बात बहुत ही आसानी से कह सकते हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया के दौर में लघुकथा साहित्य में प्रवेश का वह द्वार है जो आपको एक रचनाकार के रूप में पहचना तो दिला सकता है, लेकिन यह पहचान ठीक उसी तरह की होती है जैसे लघुकथा होती है। बहुत सारे लेखकों ने पहले लघुकथा लिखी और फिर उसी के विस्तार से बेहतर कहानियां भी रच पाए। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि लघुकथाएं करते हुए लिखने वाला सृजन के रास्ते पर आगे बढ़ सकता है, बशर्ते कि उसे लघुकथा के छोटे-छोटे ‘रिस्क-फैक्टर्स’ का पता हो। इन सभी के बीच में लघुकथा-विधा की प्रतिष्ठा का सवाल अभी भी खड़ा है और यह प्रतिष्ठा तब ही संभव है जब परिपक्व और प्रतिबद्ध रचनाकार स्वयं को अभिव्यक्त करने का माध्यम लघुकथा को चुनेंगे।
आयोजनों की धूम
बीकानेर में साहित्य-कला-संस्कृति के आयोजनों की संख्या इन दिनों बढ़ी-चढ़ी रही है। बीकानेर में लंबे समय बाद टीएम ऑडिटोरियम में विरासत संवद्र्धन संस्थान की ओर से मुशायरा आयोजित किया गया तो बरबस ही सवाल खड़ा हुआ कि क्या मुशायरा अब दो-ढाई सौ की तादाद तक सीमित हो चुका है? शहर में सुनने वाले कम हो गए हैं कि बुलाने वालों ने ही कुछ सरहदें या अर्हताएं तय कर दी हैं? मुशायरा और कवि-सम्मेलन का तो मतलब ही खुला आसमान और सामने बैठा हर खासोआम हुआ करता था। ये सारे परिवर्तन के लक्षण हैं तो यही सही। दूसरी ओर कथारंग के दोनों अंकों का लोकार्पण बीकानेर में होने के बाद इस बार हनुमानगढ़ में लघुकथा अंक का लोकार्पण करवाया गया और इसे साहित्य को बंद कमरों से आम जन के बीच ले जाने की कवायद बताया गया। ‘जन तक सृजन’ अभियान के तहत जहां बीकानेर से बाहर भी साहित्यिक माहौल बनाने की बात हुई तो यह भी एक बड़ी खबर है कि जल्द ही एक लघुकथा सम्मेलन के लिए बीकानेर में लेखक जुट रहे हैं। डेजर्ट फेस्टिवल भी हुआ लेकिन कुछ सूना-सा लगा। कुछ चेहरे गायब मिले। आयोजनों में यह होना कोई नई बात नहीं है। दो अक्टूबर को जनकवि हरीश भादाणी का जन्मदिन था। कृतज्ञ शहर उन्हें नहीं भूला।
खामोश हुआ एक समय
सीपी माथुर नहीं रहे। बीकानेर रंग-जगत में वे एक हलचल की तरह थे। जहां जाते एक हलचल मचा देते। उनकी दमदार आवाज और उस पर जिंदादिली। जहां खड़े होते अपना ध्यान खींचते। पूरा जीवन संघर्ष में बीता लेकिन हार नहीं मानीं। घर बनाने का सपना पूरा होने वाला ही था। निमंत्रण-पत्र बांट रहे थे कि एक एक्सीडेंट हुआ और मेजर आपरेशन के बाद लंबा समय शून्य में बीता। फिर कैंसर ने जकड़ लिया। हार्ट-पेशेंट भी थे। बावजूद इसके ‘खामोश अदालत जारी है’, ‘गुलाम बादशाह’, ‘पंछी ऐसे आते हैं’ जैसे कितने ही नाटकों में अपने किरदार से लोकप्रिय हुए सीपी माथुर को भुला पाना इतना आसान नहीं होगा। वास्तव में वे ऐसे रंगकर्मी थे, जिन्होंने बीकानेर के रंगजगत को अपने खून-पसीने से सींचा। एक ऐसी आवाज को खामोश होना भला किसे नहीं अखरेगा।

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