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एक अक्षर भी बन जाता है कई बार विकराल

शब्द का निर्माण अक्षरों के जोड़ का परिणाम है। यह जोड़ 'कहीं की ईंट कहीं का रोड़ाÓ जैसे मुहावरे से बहुत दूर पूर्णतया शास्त्रीय होते हैं बल्कि भाषा विज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो वैज्ञानिक भी। शब्दों से वाक्य बनते हैं, जिनका भी अपना विधान है। किसी भी वाक्य की गुणवत्ता की बेहतर लेखन की कसौटी है। हम सामान्य बातचीत में शब्द की सत्ता की बात करते हैं, लेकिन कभी इस सत्ता को शक्तिशाली बनाने वाले शब्दों में नहीं उतरते। अगर इस दृष्टि से देखने की कोशिश करें तो हर अक्षर अपने आप में एक शब्द जितनी सामथ्र्य रखता है और जब इस शब्द में किसी मात्रा का लगा दिया जाता है वह सूक्ष्म-स्तर पर एक वाक्य जितना व्यापक होता है। एक शब्द क पर छोटी ई और बड़ी ई की मात्रा लगाने भर से वाक्य में बड़ा परिवर्तन हो जाता है। कई बार तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है। इसी वजह से सृजन करने वालों से वर्तनी, भाषा और व्याकरण के ज्ञान की अपेक्षा की जाती है। इन सभी का ज्ञान होने के बावजूद सोच-समझकर जो किसी अक्षर या शब्द को अपने रचना-संसार में इस्तेमाल करता है, उसी का शब्द कालांतर में शब्दकोश में समाहित किया जाता है। शब्दकोश निर्माण की यही प्रक्रिया प्रकारांतर से समाज में शब्द को स्वीकारने की है। समाज भी इसी तरह शब्द को स्वीकार करता है और इसी तरह से समाज से कई शब्द गुम भी हो जाते हैं। बहुत सारी आंचलिक भाषाएं इसी प्रक्रिया में गुम हो चुकी है। लिपियों के भी यही हाल है। नई भाषा बनने की भी यही प्रक्रिया है। सोशल मीडिया के इस दौर में हिंग्लिश इसी का रूप है। नहीं चाहते हुए भी हमारे आम जीवन में शॉर्ट-फार्म इस कदर प्रचलित हो चुकी है कि भले ही कुछ लोग इसे स्वीकारें नहीं, लेकिन अधिसंख्य समाज द्वारा स्वीकार कर लिए जाने के कारण इसका ज्ञान बहुत जरूरी हो गया है। अगर इनका ज्ञान नहीं हुआ तो हमारी समझ पर भी सवालिया निशान लग चुका है। सिर्फ शॉर्ट-फार्म ही नहीं इमोजी भी ऐसे-ऐसे रच दिए गए हैं, जिससे मन के भावों को अभिव्यक्त किया जा सके। लोग धड़ाधड़ इनका उपयोग कर रहे हैं, जो नहीं समझ पा रहे हैं-उनके पिछडऩे की आशंका जताई जा रही है। 

देखा जाए तो इसमें नया कुछ भी नहीं है। चित्रलिपियां प्राचीन समय में भी प्रचलित रही है। कूट-भाषाओं का अपना महत्व रहा है। राजकाज की भाषा और लोकभाषा हमेशा अलग-अलग रही है। इन दोनों को जो ज्ञान रखता वही विद्वान माना जाता। यही अपेक्षा आज भी है। मूल बात यह है कि परिवर्तन भले ही स्वीकार नहीं करें, लेकिन परिवर्तनों पर नजर तो रखनी ही पड़ेगी। परिवर्तन स्वीकार नहीं करने का साहस भी तब ही आएगा, जब पूर्व की गुणवत्ता और उसकी सम-सामयिकता को स्थापित करने के लिए तथ्य और तर्क होंगे। तर्क और तथ्य की जानकारी के लिए अक्षरों को जानना होगा, उनकी ध्वनि को पहचानना पड़ेगा। अक्षरों से बने हुए शब्दों को समझना होगा। समझने के लिए जहां दो अक्षरों के मेल के सवाल से निकलना होगा तो इस मेल से बनी हुई चित्रात्मकता को भी उकेरना होगा। इतने भर से ही बहुत सारे शब्दों का अर्थ सामने आ जाएगा। अगर सही-सही तरीके से हमें अपनी भाषा, वर्तनी और व्याकरण का ज्ञान है तो यह ज्यादा मुश्किल काम नहीं है, लेकिन नहीं होने की स्थिति में शब्द तो क्या एक अक्षर का विकराल बन सकता है। इस चुनौती को स्वीकार करने वाला ही कालांतर में अच्छा रचनाकार बन सकता है।
एक बेहतर रचनाकार शब्द की सत्ता को समझता है और उसके अर्थ में से अर्थ निकालने के प्रयास में सदा लगा रहता है। उसे पता होता है कि अपनी बात को कहने में शब्द ही उसके शस्त्र है, जिसका जितना निपुणता से उपयोग करेगा, वांछित परिणाम को प्राप्त करेगा। अगर किसी रचनाकार को अक्षर और शब्द के मेल से निकलने वाली ध्वनि और दृश्यात्मकता का एहसास होना शुरू हो जाए तो फिर अर्थ स्वत: ही प्रकट हो जाता है। किसी भी शब्द से उसका अर्थ लेने की यही एक प्रक्रिया है, क्योंकि इसी प्रक्रिया से शब्द बनते हैं।
शब्द को समझे बगैर किया गया कोई भी प्रयोग रचना को न सिर्फ संदिग्ध बनाता है बल्कि रचनाकार को भी कठघरे में खड़ा करता है, क्योंकि सृजन का उद्देश्य समाज को दिशा देना होता है और गलत शब्द का उपयोग समाज को भ्रमित कर सकता है। रचनाकार से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने शब्द या वाक्य से निकलने वाले तमाम तरह के अर्थों से भिज्ञ हो। उसे पता होना चाहिए कि उसके द्वारा लिखे गए वाक्य की उस भाषा में कितनी-कितनी व्यंजना हो सकती है। अगर वह अपने लिखे हुए वाक्य की व्यंजना से अनभिज्ञ है तो यह रचना का बड़ा दोष हो सकती है। यह तब ही संभव है कि रचनाकार को अपने शब्द की शक्ति का ज्ञान हो।
इस संदर्भ में जब हम हिंदी की बात करते हैं तो इसका सबसे बड़ा सुख यह है कि यह जैसे बोली जाती है, वैसी ही लिखी जाती है। यही वजह है कि इसे वैज्ञानिक दृष्टि से भी मान्यता मिली हुई है। अब किसी का उच्चारण दोष हो तो संभव है कि लिखते समय भी दोष सामने आए, लेकिन अगर कोई शुद्ध हिंदी बोलना जानता है तो उसे लिखने में दिक्कत नहीं आएगी। फिर हिंदी ही क्यों, किसी भी भाषा की बात करें, पहला काम तो बोलना ही है। अगर इस मोर्चे पर ही कोई असफल है तो फिर वह लेखन के स्तर पर तो फिसड्डी रहना ही है। जरूरत इस बात की है कि निरंतर रियाज करते रहें।

नौ कृतियों का लोकार्पण

बीता रविवार पुस्तकों के लोकार्पण की दृष्टि से ऐतिहासिक रहा। एक ही दिन में नौ किताबों का लोकार्पण हुआ। धरणीधर रंगमंच पर मधु आचार्य 'आशावादीÓ का व्यंग्य कथा संग्रह 'साहित्य की सीआरपीसीÓ, प्रितपाल कौर द्वारा संपादित कहानी संग्रह 'परिवेश के स्वरÓ और डॉ.ब्रजरतन जोशी द्वारा संपादित कहानी संग्रह 'हिंदी कहानी : नया स्वरÓ का लोकार्पण हुआ। संस्कार सदन में नारायण सिंह गाडण जन्म शताब्दी समारोह में कवि केसादास गाडण की 'नीसाणी विवेकवारÓ, गिरधारीदान रतनू की दो कृतियां 'चारण चंद्रिकाÓ और ढलगी रातां, बहगी बातां-2, सुरेश सोनी की 'तोगा री तरवारÓ, मनोज गाडण की कृति 'मणिधर माणमरदनÓ और चारण समाज निर्देशिक का लोकार्पण हुआ।

महिला रचनाकारों का संवाद
अपने कहानी संकलन के लोकार्पण समारोह में बीकानेर आईं प्रख्यात लेखिका प्रितपाल कौर के साथ महिला रचनाकारों का संवाद भी काफी उपलब्धिपरक माना गया। इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि दो घंटे के इस संवाद के कार्यक्रम में एक भी पुरुष शामिल नहीं हुआ। सिर्फ महिला रचनाकारों ने समसामयिक लेखन, स्त्रियों के लिए वर्जनाएं, सवाल और परिस्थितियों पर बात की। इस संवाद से यह भी उभर कर आया कि महिला रचनाकारों को समय-समय पर इस तरह मिलते रहना चाहिए।

महिला रचनाकारों का संवाद

अपने कहानी संकलन के लोकार्पण समारोह में बीकानेर आई लेखिका प्रितपाल कौर के साथ महिला रचनाकारों का संवाद भी काफी उपलब्धिपरक माना गया। इस कार्यक्रम की विशेषता यह रही कि दो घंटे के इस संवाद के कार्यक्रम में एक भी पुरुष शामिल नहीं हुआ। सिर्फ महिला रचनाकारों ने समसामयिक लेखन, स्त्रियों के लिए वर्जनाएं, सवाल और परिस्थितियों पर बात की। इस संवाद से यह भी उभर कर आया कि महिला रचनाकारों को समय-समय पर इस तरह मिलते रहना चाहिए।

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