Menu

top banner

लिखने वालों के लिए सृजन का प्रवेश-द्वार है लघुकथा Featured

सोशल मीडिया के दौर में लघुकथा साहित्य की सबसे अधिक उपयोग में आने वाली विधा बन गई है। हर व्यक्ति जो कुछ लिखना चाहता है लेकिन सीधे तौर पर बात नहीं करना चाहता, वह लघुकथा के माध्यम को अपनाता है। अप्रत्यक्ष रूप से किसी प्रवृत्ति या घटना पर अपनी दृष्टि रखने का एक सशक्त माध्यम बनती जा रही है लघुकथा। देखा जाए तो इसकी सहजता, सम्पे्रषणीयता और संक्षिप्तता ही ऐसे तीन कारण हैं कि नवोदित का ध्यान भी अपनी ओर खींचते हैं तो प्रौढ़ रचनाकार के लिए भी एक चुनौती बन जाते हैं। चुनौती बनने के दो कारण हैं। पहला तो यह कि लघुकथा कभी भी व्यंग्य या विश्लेषण से निकलते हुए हास्य पैदा करने का कारण बनकर चुटुकले की श्रेणी में आ सकती है। इसके लिए लेखक और खासतौर से प्रतिष्ठित लेखकों से अतिरिक्त श्रम का आग्रह हो जाता है तो दूसरी ओर लघुकथा भले ही भारतेंदु युग से चली आ रही हो, इसके शास्त्रीय स्वरूप या मानकीकरण का काम अभी तक नहीं हुआ है। अभी भी यह व्यंग्य की तरह प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए मशक्कत कर रही है। तो दूसरी ओर कई बार संस्मरण, रेखाचित्र आदि के बीच के फर्क की तरह इसे भी दूसरी विधाओं में शामिल कर लिया जाता है। व्यंग्य के मुकाबले नियमित रूप से लघुकथा लिखने वाले रचनाकारों की संख्या बहुत कम है, इस वजह से इस विधा को अभी भी साहित्य की जाजम पर चर्चा के लिहाज से तीजे-चौथे पायदान पर ही माना जाता है।
सोशल मीडिया ने जरूर इसे मुख्यधारा में लाने की कोशिश की है और यह कोशिश इस रूप में सार्थक भी हुई है कि यह लिखने वालों के लिए साहित्य का प्रवेश द्वार बन गया है, लेकिन यहां यह स्पष्ट करना बहुत जरूरी है कि बात लिखने वालों की हो रही है, लिखना सीखने वालों की नहीं। जिन्हें लिखना आता है, वे छोटी-छोटी घटना और समय को उकेरते हुए अपनी बात को कहने के लिए लघुकथा विधा का उपयोग करते देखें भी जा सकते हैं। क्योंकि हर व्यक्ति के पास पर्याप्त तर्क, तथ्य और भाषा शक्ति नहीं होती, इसलिए वह अपने आसपास और परिवेश में होने वाले घटनाक्रमों पर लिख नहीं पाता, लेकिन जो भी अपने आसपास होते हुए देखता है और इन सभी को देखते हुए जो झंझावात उभरता है, उसे कहने की गुंजाइश भर से एक लघुकथा बना लेता है। अपने भाव, दृष्टि और सामान्य बुनावट के साथ बात कहने का सलीका ही लघुकथा के क्षेत्र में प्रवेश के लिए उर्वर जमीन का कारण बनता है।
सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें न तो घटनाओं की भरमार होती है और न किरदारों की भीड़। थोड़े-से शब्दों में भी अपनी बात कही जा सकती है। हालांकि इन थोड़े-से शब्दों की अधिकतम शब्द-सीमा का अभी तक कहीं निर्धारण नहीं हो सका है। हाल ही में प्रकाशित कथारंग-3 के ‘लघुकथा अंक’ में सबसे छोटी लघुकथा मुकेश व्यास की मिलती है, जो 29 शब्दों की है और अपनी बात कहने में सफल भी, लेकिन कई बार लघुकथा के नाम पर कहानी के शब्दों को कम करने की कोशिशें हास्यास्पद स्थितियां पैदा करती है और ‘कहन’ कमजोर हो जाता है। इसलिए लघुकथा को बजाय शब्दों के एक घटना, एक समय के इर्दगिर्द बुने कथानक से लिया जाता है। जैसे ही लेखक फ्लैशबैक में गया, किरदार रचने शुरू किए या अगले समय में छलांग लगाई वह लघुकथा से दूर होने लगता है। नव-लेखकों की यह बड़ी समस्या होती है कि वे एक समय से दूसरे समय में जाते समय भाषा के मामले में चूक जाते हैं। किरदार रच नहीं पाते और कथानक को सम्पे्रषणीय बनाने के लिए स्मृतियों तथा संयोगों का सही तरीके से आश्रय नहीं ले पाते। इसलिए बड़ी कहानियों की बुनावट करना उनके वश में नहीं होता लेकिन लघुकथा के माध्यम से अपनी बात बहुत ही आसानी से कह सकते हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया के दौर में लघुकथा साहित्य में प्रवेश का वह द्वार है जो आपको एक रचनाकार के रूप में पहचना तो दिला सकता है, लेकिन यह पहचान ठीक उसी तरह की होती है जैसे लघुकथा होती है। बहुत सारे लेखकों ने पहले लघुकथा लिखी और फिर उसी के विस्तार से बेहतर कहानियां भी रच पाए। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि लघुकथाएं करते हुए लिखने वाला सृजन के रास्ते पर आगे बढ़ सकता है, बशर्ते कि उसे लघुकथा के छोटे-छोटे ‘रिस्क-फैक्टर्स’ का पता हो। इन सभी के बीच में लघुकथा-विधा की प्रतिष्ठा का सवाल अभी भी खड़ा है और यह प्रतिष्ठा तब ही संभव है जब परिपक्व और प्रतिबद्ध रचनाकार स्वयं को अभिव्यक्त करने का माध्यम लघुकथा को चुनेंगे।
आयोजनों की धूम
बीकानेर में साहित्य-कला-संस्कृति के आयोजनों की संख्या इन दिनों बढ़ी-चढ़ी रही है। बीकानेर में लंबे समय बाद टीएम ऑडिटोरियम में विरासत संवद्र्धन संस्थान की ओर से मुशायरा आयोजित किया गया तो बरबस ही सवाल खड़ा हुआ कि क्या मुशायरा अब दो-ढाई सौ की तादाद तक सीमित हो चुका है? शहर में सुनने वाले कम हो गए हैं कि बुलाने वालों ने ही कुछ सरहदें या अर्हताएं तय कर दी हैं? मुशायरा और कवि-सम्मेलन का तो मतलब ही खुला आसमान और सामने बैठा हर खासोआम हुआ करता था। ये सारे परिवर्तन के लक्षण हैं तो यही सही। दूसरी ओर कथारंग के दोनों अंकों का लोकार्पण बीकानेर में होने के बाद इस बार हनुमानगढ़ में लघुकथा अंक का लोकार्पण करवाया गया और इसे साहित्य को बंद कमरों से आम जन के बीच ले जाने की कवायद बताया गया। ‘जन तक सृजन’ अभियान के तहत जहां बीकानेर से बाहर भी साहित्यिक माहौल बनाने की बात हुई तो यह भी एक बड़ी खबर है कि जल्द ही एक लघुकथा सम्मेलन के लिए बीकानेर में लेखक जुट रहे हैं। डेजर्ट फेस्टिवल भी हुआ लेकिन कुछ सूना-सा लगा। कुछ चेहरे गायब मिले। आयोजनों में यह होना कोई नई बात नहीं है। दो अक्टूबर को जनकवि हरीश भादाणी का जन्मदिन था। कृतज्ञ शहर उन्हें नहीं भूला।
खामोश हुआ एक समय
सीपी माथुर नहीं रहे। बीकानेर रंग-जगत में वे एक हलचल की तरह थे। जहां जाते एक हलचल मचा देते। उनकी दमदार आवाज और उस पर जिंदादिली। जहां खड़े होते अपना ध्यान खींचते। पूरा जीवन संघर्ष में बीता लेकिन हार नहीं मानीं। घर बनाने का सपना पूरा होने वाला ही था। निमंत्रण-पत्र बांट रहे थे कि एक एक्सीडेंट हुआ और मेजर आपरेशन के बाद लंबा समय शून्य में बीता। फिर कैंसर ने जकड़ लिया। हार्ट-पेशेंट भी थे। बावजूद इसके ‘खामोश अदालत जारी है’, ‘गुलाम बादशाह’, ‘पंछी ऐसे आते हैं’ जैसे कितने ही नाटकों में अपने किरदार से लोकप्रिय हुए सीपी माथुर को भुला पाना इतना आसान नहीं होगा। वास्तव में वे ऐसे रंगकर्मी थे, जिन्होंने बीकानेर के रंगजगत को अपने खून-पसीने से सींचा। एक ऐसी आवाज को खामोश होना भला किसे नहीं अखरेगा।

DNR Reporter

DNR desk

Leave a comment

Make sure you enter the (*) required information where indicated. HTML code is not allowed.

back to top

Bikaner Trusted News Portal

  • Bikaner Local News
  • National News
  • Sports News
  • Bikaner Events
  • Rajasthan News