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कह दिया, जो कविता को कहना था...

मेरी बात कविता के एक बड़े पाठक की उस जिज्ञासा से शुरू होती है, जब वह अपनी पसंद के एक कवि को पढ़ते हुए उसमें रीपीटेशन की शिकायत एक अन्य कवि से करते हुए अपना सवाल रखते हैं। पाठक को जवाब मिलता है कि तुम ठीक कह रहे हो। फलां कवि खुद की कविताओं में अपने पहले कहे हुए को ही रीपीट कर रहा है, क्योंकि अब कविता के माध्यम से कुछ कहा जाना शेष नहीं रहा है। कविता के माध्यम से जो कुछ कहा जाना था, वह कह दिया गया है। अब तो सिर्फ तरीका है कि आप अपनी बात को कैसे कहते हैं। इन दो विद्वानों के बीच हुई बात मुझे तुरंत पांच हजार साल पहले रचे महाकाव्य 'जय संहिताÓ तक पहुंचा देती है। जय संहिता, जो बाद में महाभारत के नाम से लोकप्रिय हुई। इस गंं्रथ के रचयिता वेदव्यास ने पहले श्लोक में लिखा है कि जो जय में है, वह सृष्टि में है और जो सृष्टि में नहीं है, वह जय में भी नहीं है।


पांच हजार साल पहले एक कवि ऐसी घोषणा करता है और आधुनिक काल में जब कविता अपने पारंपरिक स्वरूप से विकास करते हुए कई रूप-स्वरूप में सामने आती है। यहां तक कि कविता की अ-कविता वाली फार्म भी मान्यता प्राप्त कर लेती है। फिर भी बात वही पर आकर रुकती है कि कविता के माध्यम से जो कुछ कहना था, कह दिया गया है। महाकाव्य महाभारत के रचयिता के उस श्लोक में और आधुनिक कवि के कथन में प्रकारांतर का ही फर्क रहता है। यहां यह जान लेना बहुत जरूरी है कि कविता का प्रारंभिक उद्देश्य क्या था। कुछ ऐसा कहना जो सीधा न हो, अर्थ भरा हो। भाषा की क्लिष्टता और संश्लिष्टता के बीच से निकलते प्रवाह से रचे ऐसे वाक्यांश जो सिर्फ अपने अर्थ ही नहीं बल्कि अभिव्यक्ति मात्र से भी बांधने की ताकत रखते हों, कवित्त कहलाए गए। यहां जन-रंजन तो जरूरी था, उसमें ज्ञान और संचेतना का पुट हो तो और अधिक वरेण्य माना गया। इसका सबसे बड़ा तत्व छंद था और यहां से चलते हुए आज हम जिसकी कविता के रूप में पहचान करते हैं, छंदमुक्त भी हो गई। बीच में एक समय ऐसा आया जब छंद होना या न होना, कविता का आधार नहीं रहा बल्कि इस रूप में एक अंत:प्रवाह की खोज की गई और फिर यही कविता हो गई।
इस तरह कई बार, बार-बार विद्वानों ने अपने तरीके से कविता को बांधने का प्रयास किया लेकिन कविता किसी के वश की बात नहीं हुई और बहुत सारे कवि जो किशोरावस्था और जवानी के दिनों में 'मैं जो करता हूं, वही कविता हैÓ जैसी उद्घोषणाएं करते मिले, ढलती उम्र में यह कहते हुए दिखाई दिए कि जैसे-जैसे समझ बढ़ती गई कविता रचना दुरूह हो गया। अब वे कहते हैं कविता आती है। यही वह जगह है जहां कविता एक पहेली के रूप में सामने आ जाती है। सवाल आता है कि क्या हम कुछ भी कविता के माध्यम से कह सकते हैं। यह सवाल तब आता है जब हम लंबी-कविता और गद्य-कविताओं से जैसे प्रयोग से भी निकलते हैं। प्रयोग के पेटे तो कुछ भी चल सकता है क्योंकि प्रयोग और परिवर्तन, दो ही ऐसे शब्द हैं जिनका तिलस्म कभी खत्म नहीं होगा और इनके नाम पर हम देर तक, दूर तक अपनी सुविधाओं के नगर बसाते रहेंगे।
सुविधाओं के नगर बसाना अलग बात है और किसी बसे-बसाये नगर में रहना दूसरी बात। बसे हुए नगर के अपने रिवाज होते हैं और इन्हें मानना ही होता है। कविता के साथ भी ऐसा ही है। कविता का एक पारंपरिक स्वरूप है और भले ही इससे कितना भी दूर जाने की कोशिश की जाए, कविता जन-रंजन की एक विधा के रूप में ही पहचानी जाती रही है और कवि से यही उम्मीद की जाएगी कि वह कविता सुनाए। यह कवि पर निर्भर करता है कि वह कविता को हथियार बनाकर अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति करे, औजार बनाकर पैसे कमाने की मशीन बनाए या कुछ लोगों में बैठकर अपनी अनुभूतियों पर वाह-वाही पाए।
कविता के माध्यम से कुछ कहे जाने की कोशिश की बजाय, इन दिनों यही हो रहा है। कविता राजनीतिक मंचों पर 'घोषणा-पत्रोंÓ को समझाने में पढ़ी जा रही है। आंदोलनों में इस्तेमाल की जा रही है। विज्ञापन फिल्मों में काम आ रही है और कवि सम्मेलनों में बिक रही है। इसके अलावा अगर कहीं पर कविता बरामद होती है तो वह बहुत ही कम लोगों के बीच। ऐसे लोग जो संवेदनशील हैं लेकिन इस बात से सहमे हुए भी कि उनकी बात आम लोगों को तक पहुंच नहीं पाएगी। ऐसी सघन अनुभूतियों वाले कवि न सिर्फ कम हैं बल्कि लगभग एकांतवासी भी हो चुके हैं। हालांकि इसके लिए कविता के साथ बार-बार हुए प्रयोग उत्तरदायी है और इन प्रयोगों को सख्ती से रोकने में नाकामयाब रही अग्रज-पीढ़ी भी। अगर कविता का विधान गजल जैसा होता और इससे छेड़छाड़ की किसी को छूट नहीं होती तो न सिर्फ कविता का अस्तित्व बचा हुआ रहता बल्कि कविता की उच्चता भी बरकरार रहती। न तो कविता के नाम पर मंचों पर चुटुकले पढ़े जाते और न बोझिल प्रयोगों की वजह से पिछड़ते हुए कविता नेपथ्य में चली जाती।
संगीतोत्सव में जुटे संगीत प्रेमी
संगीत के क्षेत्र में डॉ.जयचंद्र शर्मा का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। उन्होंने संगीत को जन-साधारण तक पहुंचाने के लिए कई प्रयोग किए। जयचंद्र शर्मा की स्मृति में लगातार संगीतोत्सव का आयोजन संगीत भारती के माध्यम से हो रहा है। लगातार होने वाले इस आयोजन के लिए देश-प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से नर्तक और संगीतकार जुटते हैं। इस बार यह आयोजन सात से नौ अक्टूबर तक चला जिसमें लोकनृत्य, भजन, भाव नृत्य के अलावा निबंध व चित्रकला प्रतियोगिताएं भी हुई। गायन और वादन के भी अभिनव कार्यक्रम रखे गए तो संगीत के आधुनिक स्वरूप पर चर्चा रखी गई। इस त्रि-दिवसीय बहुआयामी संगीत व कला अनुष्ठान को आयोजित करवाने में डॉ.मुरारी शर्मा की बड़ी भूमिका रही है। अपने पिता के काम को आगे बढ़ानेे के शुरू किया गया यह कार्यक्रम अपनी निरंतरता के लिए भी पहचान बनाता जा रहा है। इस बीच अच्छी खबर यह है कि रवींद्र रंगमंच पर 13 अक्टूबर की शाम एक नाटक खेला जाएगा। यह इस मंच पर पहला नाटक होगा। गंधर्व थिएटर, जयपुर द्वारा प्रस्तुत नाटक 'आत्मकथाÓ के लेखक महेश एलकुंचवार और निर्देशक सौरभ श्रीवास्तव हैं।
पाठकों तक किताबों
बीकानेर शहर में लिखने वालों की संख्या ही कम नहीं बल्कि पढऩे वाले भी काफी हैं। बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो पढऩा तो चाहते हैं, उन तक अच्छा साहित्य पहुंचाने का दायित्व समाजसेवी नेमचंद गहलोत ने उठाया है। रविवार को होने वाली काव्यगोष्ठी में नेमचंद गहलोत बीकानेर में लोकार्पित होने वाली कृतियों की 20-30 प्रतियां खरीदकर पहुंचते हैं और पाठकों को ससम्मान भेंट करते हैं। गहलोत कहते हैं कि वे ज्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं लेकिन ऐसा करते हैं तो उन्हें सुकून मिलता है। एक लेखक का सम्मान भी यही है कि उसके लिखे हुए को खरीदकर पढ़ा जाए और पाठक भी इससे खुश होते हैं कि उन्हें पढऩे के लिए एक बेहतर कृति मिल रही है।

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