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अभिनेता का माध्यम है नाटक...

तीन दिन नई दिल्ली में नाट्य समारोह में शिरकत करके लौटे हरीश बता रहे हैं कि दौड़ती-भागती जिंदगी और दुष्कर्म के लिए बदनाम दिल्ली में सृजनात्मकता के आयाम आशा जगाते हैं। - सं


अभी नई दिल्ली के मंडी हाउस को एक बार फिर नये सिरे से देखने का मौका मिला। नई दिल्ली का यह इलाका कला-साहित्य के नाम आरक्षित है। इधर से आपको तानसेन मार्ग निकलता दिखाई देगा तो सफदर हाशमी की याद में भी एक रास्ता जाता है। कला-साहित्य के नाम पर होने वाली अधिकांश केंद्रीय गतिविधियों का यही संकुल है। साहित्य अकादेमी, एनएसडी, श्रीराम सेंटर और फिर एक पंगत में विभिन्न राज्यों के नाम से बने हुए भवन और वहां राज्यों की संस्कृति के साथ-साथ सुस्वादु भोजन का भी प्रबंध। दौड़ती-भागती जिंदगी के लिए बदनाम हो रही दिल्ली में यह जगह एक उदाहरण है कि दिल्ली में अभी भी सृजनात्मकता बाकी है और इससे भी आगे कि बात जब देश के दूसरे शहरों में कला-साहित्य संबंधी विषय अधेड़ से प्रौढ़ होती पीढ़ी के हो गए हैं तो यहां आपको औसत 25 से 30 साल के युवा मिलेंगे जो पेशेवर रंगकर्मी बन चुके हैं। छोटे-छोटे ग्रुप बना चुके हैं। नाटक करते हैं और यहां तक की अपना एक दर्शक वर्ग बना चुके हैं। वे दावा करते हैं कि हमारी अपनी ऑडियंस है।
श्रीराम सेंटर में शो शुरू होने से पहले टिकट के लिए लाइन लगती है और प्रवेश भी लाइन से होता है। मोहन राकेश सम्मान समारोह में चयनित चार नाटकों में से तीन को देखने का मौका मिला और जानकार आश्चर्य हुआ कि धनतेरस पर भी हॉल खचाखच भरा हुआ था। सीट नहीं मिली तो दर्शक जमीन पर बैठे थे। यह एक दिन की बात नहीं है। यह निरंतर और निराश हुए बगैर काम करने का नतीजा है और इससे भी अधिक सोचना चाहें तो यह किसी एक प्रस्तुति के असफल होने से अवसाद में आने की बजाय अगली प्रस्तुति को और अधिक बेहतर-प्रभावी बनाने का संकल्प है, जिसका आदि सूत्र 'शो मस्ट गो ऑनÓ में छिपा है।
और यह सब सेवा में नहीं है। स्वांत: सुखाय नहीं है। अर्थयुक्त है। पैसे से जुड़ा मसला है। अच्छे रंगकर्मी के लिए काम की कमी नहीं है। समयबद्ध तरीके से किसी प्रोजेक्ट पर काम शुरू होता है और रंगकर्मियों का उसी के आधार पर भुगतान भी होता है। लेखक को भी नाट्यमंचन की रॉयल्टी मिलती है। मुझे तब हैरानी हुई जब मैंने देखा कि श्रीराम सेंटर के बाहर जमीन पर किताब बेचने वाली महिला पोयट्री और कॉमेडी ड्रामा मांगने पर न सिर्फ नाट्यकृतियों की पूरी फेहरिस्त गिना रही थी बल्कि यह समझाने में भी सक्षम थी कि कौनसा नाटक कितनी बार हुआ है या अब तक एक भी मंचन नहीं हुआ है।


आशय यह कि वहां पूरी तरह से प्रोफेनलिज्म छाया है। पेड़ की छाया मेें गट्टों पर रिहर्सल चल रही है। चाय-नाश्ता और खाने का प्रबंध भी जेब की क्षमताओं के अनुसार है। इस तरह का पेशवराना अंदाज ही रंगकर्म को जिंदा रख सकता है। ऐसा नहीं है कि वहां पर भी सरकारी प्रोजेक्ट का आकर्षण नहीं है। खूब है और उतने ही अवसर हैं लेकिन वहां खुद भी नाटक करने की एक ललक है। और ललक ऐसी कि युवा जुड़ रहे हैं। हो सकता है कि इन युवाओं में से अधिकांश का सपना टीवी-फिल्मों में जाने का हो लेकिन प्रकारांतर से यह रंगकर्म को समृद्ध करना ही है।
नाटक वस्तुत: साहित्य और कला का मिश्रण है। नाटक में कलात्मकता होती है और साहित्यिकता नहीं हो तो इसका कोई महत्व नहीं है। हमारे देश में नाटकों की उत्पत्ति का शास्त्रीय कालखंड भरतमुनि के साथ स्वरूप प्राप्त करता है। तब हमारे यहां गद्य या पद्य रचनाओं का कोई विधान नहीं था। पद्य ही हुआ करता था और हम देखते हैं कि बहुत सारी नाट्य-रचनाएं पद्यात्मक ही हैं। अगर संवाद भी होंगे तो उसमें एक प्रवाह रहता है। फिर जब पाश्चात्य प्रभाव से दो श्रेणी बनी तो नाटक भले ही गद्य के खाते में चला गया हो लेकिन संवादों में जिस तरह के प्रवाह और दृष्टि की मांग होती है, वह नाटककार में एक कवि का आग्रह रखती है।
अगर कोई लेखक यह कर देता है तो रंगभाषा, रंगयुति या रंगध्वनि की मांग को पूरी करते हुए वह आधुनिक स्क्रिप्ट-राइटर बनने की अर्हता को पूरा कर लेता है, जिसकी आज के समय में सर्वाधिक मांग है।
एक स्क्रिप्ट राइटर को यह नहीं भूलना चाहिए कि नाटक को खेला जाता है और इसलिए जरूरी है कि वह जनभाषा में लिखे हों। सहज सम्पे्रषणीय हो। देश, काल और परिस्थितियों से तादात्म्य रखते हों। हालांकि प्रारंभिक काल में हम देखते हैं कि संस्कृत नाटकों का ही बोलबाला रहा और अधिकांश नाटक राजप्रासादों की विषय-वस्तु ही रहे लेकिन उस समय भी संदर्भ मिलता है कि नाटकों के लिए एक बड़ा अनुष्ठान होता था। राजा और प्रजा दोनों की उपस्थिति में नाटक शुरू होता था। उस समय भी नाटक लोक-रंजन का माध्यम भी था और सार्वजनिक स्थानों पर भी नाटक खेले जाते थे। राजस्थानी नाटकों की परंपरा भी 14वीं शताब्दी के बीच बहुत ही समृद्ध रूप से सामने आती है। बीकानेर में होने वाली रम्मत का स्वरूप इस बात की गवाही के लिए प्रचुर है।
फिर नाटक एक समूह कला है। यह लेखक या निर्देशक का माध्यम रहा ही नहीं। यह तो अभिनेता का माध्यम है। लेखक का माध्यम कविता, कहानी, उपन्यास आदि हो सकते हैं और निर्देशक का माध्यम फिल्म। नाटक को शुद्ध रूप से अभिनेता का माध्यम है। अभिनेता के लिए लिखना है और अभिनेता को परकाया प्रवेश करवाना है।
और तब से ही यह मांग रही कि नाटक लिखने वाला कोरा लेखक ही नहीं हो, उसे मंच का ज्ञान होना चाहिए। पता होना चाहिए कि नाट्य मंचन के दौरान किस तरह की परेशानियां आ खड़ी हो सकती है। अब अगर कोई लेखक मंच पर समंदर, आग या जानवरों की रेलमपेल, महलों की शानोशौकत और इसी तरह की चीजें जिसमें अधिक महिला पात्र तक की बात शामिल है, दिखाने का आग्रह रखेगा तो निर्देशक को विकल्पों पर जाना ही होगा। यही वजह है कि जयशंकर प्रसाद के नाटकों को मंच मिलने में परेशानी हुई और बहुत सारे लेखक जो या तो रंगकर्मी रहे या जिनकी मित्र-मंडलियों में रंगकर्मियों का बहुतायत रही, उनके नाटक खूब खेले गए। अगर रंगकर्म से जुडऩा है तो समूह में रहने की भावना का विकास करना होगा।
एक लेखक को यह जान लेना होगा कि नाटक के माध्यम से अपना विचार दे रहा है कि दृश्य। अगर दृश्य देने का आग्रह है तो संभव है कि निर्देशक उन्हें मंच पर नहीं दे पाए और अगर कोई विचार दे रहा है तो संभव है कि लेखक-निर्देशक की जुगलबंदी बेहतरीन दृश्यों की परिकल्पना करते हुए दर्शक के मन में अपना स्थान बना ले।

कबीर यात्रा
लोकायन संस्थान ने एक बार फिर से कबीर यात्रा शुरू की है। इस बार बाड़मेर में इसके पड़ाव रहेंगे। यह गोपालसिंह की एक महत्वाकांक्षी परियोजना है और बड़ी शिद्दत से जुटे हैं। गोपालसिंह का काम करने का तरीका बहुत ही विश्वसनीय है और उनके संपर्क भी इतने फैले हुए हैं कि वे जैसा तय करते हैं, उसे क्रियान्वित भी कर देते हैं। हम जिस दौर से निकल रहे हैं, वहां एक बार फिर कबीर को समझना जरूरी है, कबीर यात्रा के बहाने ही सही।

धरणीधर रंगमंच पर नाटक
टाउन हॉल को रंग-गतिविधियों के लिए फिलहाल बंद कर दिया गया है। यहां रिनोवेशन का काम चल रहा है। इस बीच मंजूलता रांकावत ने शंकर शेष का नाटक 'आधी रात के बादÓ तैयार कर लिया है। राजस्थान संगीत नाटक अकादमी की मासिक प्रदर्शन योजना के तहत इस नाटक का मंचन 25 अक्टूबर को शाम सात बजे धरणीधर रंगमंच पर होगा। नाट्य मंचन के दौरान विघ्न आना कोई नई बात नहीं है। मंजू ने भी खूब अनुभव लिए हैं लेकिन यह भी देखा गया है कि अंतत: उनकी नाट्य प्रस्तुतियां बेहतरीन रहती हैं।

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