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कलाओं का कोलाज है नाटक

नाट्य-कर्म कलाओं का कोलाज है। यहां संगीत, नृत्य, गायन, वादन, चित्र और काव्य का एक ऐसा मंडल बनता है जो दर्शकों को भाव-विभोर करने की क्षमता रखे। इसी लिए नाट्य-मंडली या रंग-मंडल जैसे शब्द प्रचलन में आए। एक ऐसा वातावरण जहां सभी कलाओं के ज्ञाता हों और एक दिशा में चलने के अभ्यस्त हों। ध्येय एक हो, नाटक खेलना। वस्तुत: यह खुद को साधने की कला होती है और समस्त कलाएं मंच के इस साधक को ऊर्जावान बनाए रखने के लिए होती है। इसीलिए नाटक को अभिनेता का माध्यम कहा गया है। अभिनेता नाटक का वह चेहरा होता है, जिसके बूते पूरा परिदृश्य अभिव्यक्त होता है और हम देखते हैं कि बहुत सारे नाटक अपने पात्रों की वजह से सदियों तक याद रखे जाते हैं। बहुत सारे नाटकों के निर्देशक तो क्या लेखकों के नाम भी याद नहीं रहते लेकिन उनके पात्रों का नाम याद रहता है। थैंक यू मिस्टर ग्लाड, अंधायुग, तुगलक, भोमा, कोर्ट मार्शल, सखाराम बाइंडर, अजातघर, खबसूरत बहू, बिन बाती के दीप, आत्मकथा, तीडोराव और ऐसे ही कई नाटक अपने पात्रों की वजह से, अभिनेता की वजह से पहचाने गए।


हम देखते हैं कि नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, स्मिता पाटिल, शबाना आजमी, फारुख शेख, अमरीश पुरी, इरफान खान, मनोज बाजपेयी, मुकेश तिवारी को प्रसिद्धि उनके द्वारा अभिनीत पात्रों ने ही दी। लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल भी नहीं है कि अभिनेता कोई आकाश से उतरा हुआ फरिश्ता है और उसे सब कुछ आता है। अभिनेता को अगर समझना चाहें तो कठपुतली से समझा जा सकता है जिसे खेल दिखाने वाले के इशारे पर नाचना पड़ता है। रंगमंच का भी अपना एक अनुशासन है। यहीं पर एक निर्देशक का वजूद सामने आता है। एक निर्देशक लेखक के लिखे हुए को भी हटा सकता है और चाहे तो संपादित कर या करवा सकता है। लिखे हुए को इम्प्रोवाइजेशन, माइम से या प्रॉपर्टी से भी बगैर संवाद कहलवाए व्यक्त कर सकता है।
एक अच्छा निर्देशक उसी को माना जाता है जो मंच पर प्रकाश-प्रभाव का भी उपयोग अभिनय की तरह ले सके। मंच पर लगी हुई तस्वीर भी निर्देशक का अपनी बात प्रकट करवाने का एक साधन है, एक ऐसा साधन जिसे वह पात्रों को उभारने के लिए करता है। इस रूप में हम देखते हैं कि जितने भी कला रूप हैं, उनका उपयोग पात्र को उभारने के लिए जब निर्देशक करता है तो वह बहुआयामी मंचों पर एक साथ सोचने की क्षमता रखता है। भले ही वह मंच पर नहीं, मंच परे का तो सबसे बड़ा अभिनेता वही है। ऐसा नहीं होने की स्थिति में बहुत सारे संसाधन होने के बावजूद भी अपनी छाप नहीं छोड़ पाते।
यह असंगतता बहुत सारे नाटकों की सफलता में आड़े आती है। अब यहीं पर एक घुमाव हमें देखने को मिलता है। नाटकों की बहुत सारी शैलियों में एक अब्सर्ड-शैली भी है। आधुनिकता के आग्रह में यह असंगत में संगत ढूंढऩे की कवायद है। कहानी, कविता, चित्रकला या संगीत में जिस तरह के प्रयोग हुए, नाटक भी कैसे बचता? बल्कि यहां तो यह कहना चाहिए कि नाटक में तो इनकी प्रचुर संभावनाएं हैं। क्योंकि यहां अधिकतम कला-रूपों का उपयोग होता रहा है। इसी वजह से अब्सर्ड हमारे सामने आया।
इस बीच नुक्कड़ शैली का प्रचलन में आई। नुक्कड़ की शैली हमारी लोक-नाट्य परंपरा के आधुनिक युगबोध के रूप देखी जा सकती है। हालांकि इसका उपयोग राजनीतिक पुनर्जागरण के लिए बहुत हुआ और आम जन पर इसका कितना गहरा प्रभाव पड़ा, इस विषय पर अभी तक शोध बाकी है लेकिन नुक्कड़ नाटकों को आज भी पसंद किया जाता है। जन-रंजन के साथ-साथ लोक-जागरण का जो विचार हमारी लोक-नाट्य परंपरा में देखने को मिलता है, वैसा ही नुक्कड़ नाटकों ने किया। हालांकि इसके साथ राजनीतिक आग्रह जुड़े होने के कारण सरकारों के बदलने का इनकी प्रस्तुति पर असर पडऩे लगा और धीरे-धीरे नुक्कड़ नाटकों को एक विचारधारा की बपौती मानकर कुछ लोगों ने इस शैली से किनारा कर लिया। जबकि नुक्कड़ ही आज के युग की एकमात्र ऐसी शैली है जो नाटक को अनाप-शनाप खर्च से बचाते हुए अधिकतम दर्शकों तक ले जा सकती है। दर्शकों को नाटकों तक खींचने में आज के समय में नुक्कड़ नाटक सबसे सार्थक नाट्य-शैली साबित हो सकती है।
यह सही भी है कि एक नाटक के प्रोडक्शन पर कम से कम एक लाख रुपए का खर्च आता है और इतनी राशि सरकार की ओर से आयोजित प्रस्तुतियों पर दी भी जाती है। यह पैसा निर्देशक की जेब में नहीं जाता। प्रस्तुति पर ही खर्च होता है लेकिन एक दिन दो घंटे की प्रस्तुति के लिए इतनी मेहनत के बाद सब कुछ नये सिरे से करने और इस नए सिरे से करने में भी उतना ही पैसा और श्रम लगने की वजह से रंगकर्म महंगा शौक माना जाने लगा है। इस वजह से राजधानी की बात छोड़ दें तो नाटक कम होते हैं। अगर नाटक को जिंदा रखना है तो लोक और नुक्कड़ शैली के नाटकों को प्रोत्साहित करना होगा।
जहां लोक-शैली से जुड़कर थिएटर हो रहा है, वहां हम देखते हैं कि आधुनिक रंगमंच भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। बांगला और मराठी रंगमंच इसके बड़े उदाहरण है। वहां समानांतर रूप से दोनों गतिविधियां चल रही है और कई बार तो बहुत ही दोनों के समावेश से बहुत ही सुंदर प्रयोग सामने आए हैं। हमारे यहां का राजस्थानी लोक रंगमंच इतना समृद्ध नहीं है। लोक रंगमंच की समृद्धि के लिए लेखकों और निर्देशकों को साथ मिलकर काम करना होगा ताकि अच्छे नाटक तैयार हो सकें और हां, सबसे बड़ी जरूरत इस बात की है कि अच्छी राजस्थानी जानने, समझने और बोल सकने वाले रंगकर्मियों को जुटाना पड़ेगा। जरूरत पडऩे पर उन्हें राजस्थानी सिखानी पड़ेगी। क्योंकि भले ही निर्देशक और लेखक राजस्थानी लोक मंच का कितना भी भला क्यों न करना चाहें अगर अभिनेता ही नहीं होंगे तो नाटक खेेलेंगे किसके बूते?
रोटरी की हदबंदी
रोटरी क्लब की ओर से राजस्थानी भाषा के लिए शुरू किए गए पुरस्कारों का वितरण 29 को हुआ। इस क्लब ने जाने क्यों पुरस्कारों में एक हदबंदी तय कर रखी है कि साहित्य अकादमी का राजस्थानी पुरस्कार जिसे मिला है, वे साहित्यकार क्लब के पुरस्कारों के आवेदक नहीं हो सकते। ऐसे में तो आने वाले दिनों में साहित्यकारों का संकट आ सकता है। बेहतर होता कि क्लब के नीति-निर्माता इस तरह सोचते कि जिस कृति को अकादमी ने पुरस्कृत कर रखा है, उसे योजना से बाहर रखा जायेगा।
कोलकाता में दो दिन
कोलकाता में साहित्य अकादमी की ओर से बीकानेर के वरिष्ठ रंगकर्मी, पत्रकार, साहित्यकार मधु आचार्य पर केंद्रित 'लेखक से मिलिएÓ कार्यक्रम हुआ। अकादमी का यह एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है, जिसमे बहुत कम साहित्यकारों को अवसर मिला है। इस मौके पर मधु आचार्य ने बंगाल और बीकानेर के बीच सांस्कृतिक सम्बन्धों को जोडऩे वाले कई संदर्भ और संस्मरण साझा किया। एक बार फिर राजस्थानी भाषा की बात उठी और बंगाल के साहित्यकार अरबिंदो रॉय और ज्योतिर्मय दास ने यह सुनकर हैरानी जताई कि सरकारों की अनदेखी के चलते राजस्थानी लिपि अब अस्तित्व में ही नहीं रही। मधु आचार्य ने जब बताया कि समृद्ध शब्दकोश इस बात का प्रमाण है कि राजस्थानी का व्याकरण बहुत पुराना और प्रामाणिक है तो साहित्यकारों ने कहा कि राजस्थानी के विद्वानों को लिपि को फिर से प्रकाश में लाने का काम करना चाहिए।
इस कार्यक्रम के अगले दिन विप्र फाउंडेशन की ओर से आयोजित समारोह में आचार्य का नागरिक अभिनंदन हुआ और सात कृतियों का लोकार्पण भी। यह आचार्य का चौथा नागरिक अभिनंदन था। इस मौके पर आचार्य ने लेखकों के सम्मान का स्वागत करते हुए कहा कि समाज उनके कहे पर चले तो सम्मान सार्थक हो।

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