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रचना के पीछे चलती है आलोचना Featured

अगर कोई आलोचक किसी विधा में रचना भी करता है तो क्या वह इस बात की घोषणा कर सकता है कि उसने जो रचा है, वह उस विधा का आदर्श और कालजयी स्वरूप है। समीक्षा, आलोचना, समालोचना थोड़े-बहुत अंतरों के साथ लगभग एक ही जगह पर आकर खड़े हो जाते हैं। आलोचना वस्तुत: रचना पर आश्रित विधा है। रचना के बगैर आलोचना का अस्तित्व ही नहीं। साहित्य में इस विधा की सृष्टि उन लोगों के लिए हुई जो नीर-क्षीर विवेक के साथ, तटस्थ रहते हुए शास्त्रीय आधार पर अपनी बात को रखना जानते हैं। परंपरा का ज्ञान हो, प्रयोगों की पहचान हो और जिस विधा में आलोचना करे, उसके शास्त्रीय पक्ष से जान-पहचान हों। भाषा की दक्षता के साथ-साथ वर्तनी की शुद्धता का पता हो और सबसे महत्वपूर्ण बात नवाचारों को समझने की सकारात्मक दृष्टि हो। 

इन सब के अभाव में आलोचना, समीक्षा और समालोचना के नाम पर जो भी हो रहा है, वह पत्रवाचन की सीमा से बाहर नहीं निकल पाता। आलोचना वही कर सकता है, जो निर्भय लेकिन न्यायसंगत हो। ऐसा विद्वान जिसे अपनी बात विनम्रता से कहनी आती हो, आलोचना के क्षेत्र में प्रिय हो जाता है। ऐसा नहीं होने की स्थिति में भले ही कोई आलोचक स्वयं को खारा या क्रूर साबित करने की कोशिश करता रहे, उसे जन-मन में मान्यता नहीं मिलती। एक आलोचक के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती होती है कि वह जन-मन की मान्यता को साथ लेकर अपनी बात कहे।
जैसे ही कोई आलोचक जन-मन को अल्पज्ञ या नासमझ मानकर अपनी बात के साथ हावी होने की कोशिश करता है, उसका जलवा बिखरने लगता है। यहां जन-कवि भीम पांडिया की एक बात बड़ी गहरी लेकिन समीचीन मालूम होती है। वे अपनी बात को रोचक अंदाज में ऐसे कहते थे कि रवि का प्रकाश लेने वाले सारे कवि हैं। जैसे ही कोई यह सुनता, दो प्रतिक्रियाएं होती। पहली बात में उसे लगता कि यह तुकबंदी के अलावा कुछ नहीं है, दूसरा इस बात पर मंथन होता कि एक जिम्मेदार कवि अगर यह कह रहा है तो कुछ न कुछ तो बात होगी है।
भीम पांडिया समझाते कि जो जीव है, प्राणी है उसमें कवित्व इस रूप में है कि वह बात को समझ सकता है, कहने की कला भले ही नहीं आए लेकिन कवि सम्मेलन में अंतिम-छोर पर बैठा कोई सामान्य सा श्रोता अगर किसी कवि की कविता पर वाह-वाह करता है तो यह अकारण नहीं है। इसका कारण यह है कि उसके पास समझ है, संवेदना है, अनुभूति है लेकिन अभिव्यक्ति के मामले में वह मंच पर बैठे कवि से कमजोर है। इस रूप में रवि का प्रकाश लेने वाले सारे कवि हुए।
भीम पांडिया से असहमत होने का अधिकार ठीक वैसा ही है, जैसा कोई उनसे सहमत होने में अपना अधिकार माने, लेकिन उनकी बात को खारिज नहीं किया जा सकता। समझदार होने का हक सभी को है। सहमत-असहमत होने का अधिकार सभी के पास है। ऐसे में एक आलोचक के सामने यह चुनौती होती है कि वह किस तरह सभी लोगों के ग्रहण करने के तरीके को समझते हुए अपनी बात को रखे। इसके लिए ्रएक तरफ जहां आलोचक को जन-मन की बात को समझने के लिए एक दृष्टिबोध चाहिए होता है तो दूसरी ओर, जिस विधा में वह अपनी बात कह रहा है, उसमें अब तक हुए प्रतिनिधि रचनाकारों से भी परिचित होना जरूरी होता है। यहां यह उल्लेखनीय है कि अधिकांश वाद-विचार या सम्प्रदायों की स्थापना में आलोचकों का ही बड़ा योगदान रहा है। रचनाकार ने तो अपनी बात कह दी। उसे एक दृष्टिबोध के साथ समझते हुए उसे श्रेणियों में समझाने का काम आलोचक ने ही किया। कोई भी रचनाकार अव्वल तो किसी वाद-विचार या विमर्श के खाके खड़े करके रचना कर ही नहीं सकता। अगर वह करता भी है तो वह रचनाकार के नाते सबसे पहले खारिज होता है और राजनीति का हथियार भर बनकर रह जाता है।
फिर रचनाकार तो यह घोषणा भी कर सकता है कि उसकी कोई रचना किस वाद-विचार या विमर्श से प्रेरित है, उसे नहीं पता लेकिन आलोचक यह नहीं कह सकता कि उसे किसी रचना-विधान के मूल-सूत्रों की जानकारी नहीं है। वह किसी भी रचनाकार को इस तरह खारिज नहीं कर सकता कि फलां रचनाएं अच्छी है और फलां बेकार। यह तो सामान्य समझ वाला श्रोता भी कर सकता है। आलोचक के सामने अच्छी को अच्छी साबित करने की चुनौती होती है तो खराब को खराब साबित करने का साहस। बहुत सारे आलोचकों ने ऐसा किया भी है और उन्हें मान्यता भी मिली है, लेकिन कमी के कारण यहां भी पक्षपात होने लगा है।
अपनों को प्रतिष्ठा दिलाने और जानबूझकर आंखें बंद करके किसी और को समानांतर खड़ा करने की कोशिश की जाने लगी। यही वजह है कि आलोचना अस्वीकार होने लगी है। इससे जो प्रतिरोध का स्वर उभर रहा है, उसका हासिल यह है कि ऐसे आलोचकों को तो पूरी तरह से खारिज किया जाने लगा है जो खुद भी उसी विधा में सृजनरत हैं। वस्तुत: आलोचना का काम रचनाकारों का कभी रहा ही नहीं। आलोचना का अपना एक शास्त्र है, सिद्धांत है। रचनाकर्म से बहुत बाद की बल्कि रचना पर आश्रित विधा है आलोचना।

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