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साहित्य समाज में भी है वर्ण-व्यवस्था

साहित्य में संभ्रांत या मुख्यधारा के साहित्यकार की श्रेणियों का आविष्कार वैसा ही है, जैसे समाज में वर्ण-व्यवस्था या साफ शब्दों में कहें तो ऊंच-नीच और इसी के चलते जब कुछ अनपढ़ या कम पढ़े हुए बहुत अच्छा लिख गए तो यहां तक कहा गया कि संभवतया इन्हें खुद को पता नहीं है कि इन्होंने कितना अच्छा लिख दिया है। यह व्यक्ति पर फब्ती थी। समझ पर संशय था। यह इस बात को जताने की चेष्टा थी कि सही तरीके से शिक्षा-दीक्षा या ज्ञानार्जन के बगैर साहित्य रचना संभव तो है लेकिन यह संदिग्ध है कि जो रचा जा रहा है, उसके प्रभाव और क्षमता से खुद रचनाकार भी परिचित भी है या नहीं। और इस तरह से साहित्य शिक्षाविदों, जानकारों और समझदारों का हो गया। 

यह बात स्थापित हो गई कि जो कहा जाए, उसके प्रभावों का ज्ञान होना चाहिए और जो पढ़ा जाए, उसे एक नए तरीके से समझने-समझाने की क्षमता भी रचनाकार में होनी चाहिए। उसकी बात में एक चमत्कृति होनी चाहिए। भले ही इस चमत्कार को समझने वाले बहुत कम हो लेकिन बात का वजन बढ़ा-चढ़ा होना चाहिए। इस वजह से एक तरफ जहां पांडित्यपूर्ण साहित्य की रचना होने लगी। गूढ़ार्थी कविताएं लिखी जाने लगी। लालित्यपूर्ण गद्य रचा जाने लगा और इसी आधार पर समालोचना और आलोचनाएं होने लगी। यही वह दौर था जब एक बड़ा हादसा यह हुआ कि आलोचना को बुराई माना जाने लगा। कोई शब्द किस तरह से कुछ भ्रांतियों की वजह से अपना अस्तित्व खो सकता है, आलोचना शब्द के साथ हुए हादसे से जाना-पहचाना जा सकता है।
आलोचना शब्द लोचन यानी आंखों से बना है, जिसका अर्थ समग्र दृष्टि से है। नए संदर्भ में बात करें तो तीन सौ साठ डिग्री पर कसा हुआ विवेचन। इस के तहत समीक्ष्य कृति की विधा के परिप्रेक्ष्य में जांच होती और समीक्षक अपनी बात कहता। यह बात जैसे-जैसे बुरी लगने लगी, आलोचना का अर्थ भी बुराई से लिया जाने लगा। हालांकि इसके लिए जिम्मेदार तत्कालीन वाद या विचार हैं। पंडितों ने विधा की अपनी दृष्टि से समीक्षा की जबकि समग्र दृष्टि से बात होनी चाहिए थी और यहीं से आलोचना शब्द का अर्थ बदलने लगा। बदले हुए अर्थ पर मुहर तब लग गई जब समीक्ष्य कृति को आम जन में तो स्वीकृति मिली लेकिन समीक्षकों से नहीं।
इसका बहुत बड़ा उदाहरण हमें रामचरित मानस लिखने वाले गोस्वामी तुलसीदास के प्रसंग से मिलता है कि एक बार वे ऐसे हताश हुए कि मानस की पांडुलिपि को पानी में बहाने का विचार तक कर लिया। तुलसीदास की पांडुलिपि तो बच गई लेकिन जाने कितनी पांडुलिपियां संभ्र्रांत और मुख्यधारा के साहित्य के काबिल नहीं होने की वजह से वक्त के प्रवाह में बह गई और बाद में कभी बरामद नहीं हो सकी।
हालांकि, इसका एक अच्छा प्रभाव यह पड़ा कि कुछ वाद और विचार के स्तर पर बड़ा काम हुआ। बहुत सारे पंडितों ने एकराय होकर वाद और विचारों पर बड़ा काम करते हुए सम्प्रदाय तक खड़ा किया। अपनी बात को रखने के लिए न सिर्फ वाद आधारित चिंतन हुआ बल्कि सृजन भी हुआ। एक कवि हुए मम्मट। उनके समय का एक किस्सा जो बहुत ही चाव से आज भी खराब-कविता को खराब नहीं कहने की एवज में सुनाया जाता है। यह किस्सा कुछ इस तरह है कि मम्मट के पास एक युवक अपनी कविताओं की पांडुलिपि लेकर पहुंचा और बोला कि इसमें आवश्यक सुधार बता दीजिए। मम्मट ने वह पांडुलिपि रख ली और कुछ दिन बाद आने के लिए कहा। कुछ दिन बाद युवक आया तो उसे देखते ही मम्मट उसकी ओर दौड़े और उसे अपनी बाहों में भरते हुए कहा कि जो काम मैं पिछले कई सालों में नहीं कर सका, वह तुमने इस पांडुलिपि में कर दिया। यह सुनकर युवक उत्साह में भरकर पूछा, 'वह कैसे आदरणीय?Ó
मम्मट ने कहा, 'मैं एक ऐसी कृति रचना चाहता था, जिसमें सभी तरह के काव्यदोष हों, तुमने यह पांडुलिपि ऐसी बनाई है कि अब मुझे काव्यदोष बताने के लिए किसी भी तरह के दूसरे उदाहरणों की जरूरत ही नहीं है!Ó
यह एक उदाहरण है, जिससे यह पता चलता है कि साहित्य के पंडित सृजन को लेकर कितने सजग रहते थे और सृजन कैसा होना चाहिए, इस पर निरंतर बात करते रहते थे। इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि कहने का अधिकार उसी को मिला जिसके पास समझ है और समझ का पैरामीटर भी श्रेष्ठ स्तर पर भाषा और व्याकरण की शिक्षा-दीक्षा स्थापित किया गया। ऐसे में वर्तनी को नहीं समझने वाले, शब्द के प्रभावों से अनभिज्ञ और अभिधा-व्यंजना की ताकत से बचकर मध्यममार्ग तलाशने वाले कभी भी संभ्रांत या मुख्यधारा के रचनाकार नहीं बन सके। बहुत हद तक यह सही भी था लेकिन धीरे-धीरे इन सभी का रूप-स्वरूप बिगडऩे लगा और कालांतर में हम देखते हैं कि वाद का पूरी तरह से राजनीतिकरण हो चुका है तो विमर्श के नाम पर नित-नए नाम सामने आ रहे हैं। इनका सबसे अधिक बिगड़ा हुआ स्वरूप लॉबियों से पहचाना जाता है, जिसके उदाहरण भारत भवन से लेकर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और साहित्य अकादमियों तो इधर लिटरेचर फेस्टीवल और जश्ने-रेखता तक बिखरे हैं।

दरबारों-हवेलियों से होते हुए...

समाज में सृजनधर्मियों का सम्मान सदैव होता रहा है। पहले राजदरबारों में कवियों-शायरों का सम्मान होता था। फिर यह जिम्मेदारी सेठ-साहूकारों ने उठा ली। बीकानेर में दसेक साल पहले ही रामपुरिया हवेली में साहित्यकार सम्मान की परंपरा बंद हुई है। सन् 2000 से पहले सक्रिय साहित्यकारों के पास आज भी हवेली से मिली स्वेटर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मिल जाएगी। शब्द-ऋषि सम्मान भी होता था। राजा-महाराजा गए और सेठ साहूकार भी थक गए तो संस्थाओं ने यह भार उठाया। लिहाजा, जाते साल तीन सम्मान समारोह की सूचना है, एक हो चुका। डूंगर कॉलेज में उर्दू विभागाध्यक्ष डॉ. मोहम्मद हुसैन की सरपरस्ती में एक संस्था बनी है-बज्में फिक्रो फन। इस संस्था की ओर से आनंद निकेतन में बीते रविवार पांच साहित्यकारों का सम्मान हुआ। टोंक के शायर डॉ.अरशद अब्दुल हमीद को गालिब अवार्ड दिया गया। आबिद हसन को शेख निसार अहमद निसार अवार्ड, अल्ला बख्श साहिल को शेख मोहम्मद इब्राहिम अवार्ड और अल्लाबख्श सर्वा तथा अमीनुद्दीन शौकजामी को बेदिल अवार्ड से नवाजा गया। अब प्रेरणा प्रतिष्ठान डॉ.उषाकिरण सोनी को सुंदर सुरभि सम्मान, राजेंद्र जोशी को राजरत्न सम्मान और डॉ.गौरव बिस्सा अमरकीर्ति सम्मान प्रदान करेगी। यह संस्था वरिष्ठ कवि भवानीशंकर व्यास 'विनोदÓ के निर्देशन में चल रही है। इस बीच कथाकार नदीम अहमद नदीम और शायर वली मोहम्मद गौरी के प्रयासों से प्रारंभ हुए शहीद अशफाकउल्ला खां सम्मान से विभूषित होने वाले साहित्यकारों की सूची भी जारी हो गई है। हिंदी साहित्य के लिए बुलाकी शर्मा, राजस्थानी साहित्य के लिए मोनिका गौड़ और उर्दू साहित्य के लिए जियाउलहसन कादरी सहित रंगकर्म हेतु सुरेश हिंदुस्तानी, समाजसेवा के क्षेत्र में हीरालाल हर्ष और पत्रकारिता के लिए इसरार हसन कादरी को सम्मानित किया जाएगा।

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