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चाहने भर से नहीं बन जाता कोई कवि

सृजनशील व्यक्तिके लिए जरूरी है कि 'चांदमारी' की बजाय ठोस और सार्थक लिखे। ऐसा लिखे, जिसे कालजयी कहा जा सके। काव्य-रचना बहुत ही कठिन विधा है। कलारूपों में काव्य को बहुत ही सम्मान से देखा जाता है। कला का उत्कृष्ट रूप काव्य और उत्कृष्टतम रूप नाटक को माना गया है।

भारतीय साहित्य के इतिहास के प्रारंभिक दौर में जहां कवित्त ही बरामद होता है, उसी देश में आज कविता को सबसे उपेक्षित विधा करार दे दिया गया है। प्रकाशक काव्य-संग्रहों के प्रकाशन को मांग और आपूर्ति के सिद्धांत विपरीत मानते हैं तो मंचों पर चोरी और चुटकले बाजी से आगे बढ़ते हुए मजमेबाजी तक के आरोप कवियों पर लगने लगे हैं। इस दौर में कविता पर आलोचना की जगह व्यंग्य होने लगा है। यहां तक कहा जाने लगा है कि आकाश में कंकर फेंको, नीचे जिस पर भी गिरेगा-कवि होगा। अशोक चक्रधर और कुमार विश्वास के सेलिब्रिटी बन जाने से परेशान लोग भले ही आदर्श के रूप में तुलसी, सूर, मीरा, रसखान, निराला, गुप्त, दिनकर के नाम गिनाएं लेकिन कवि सम्मेलनों में आधे से अधिक कवि अशोक चक्रधर और कुमार विश्वास की शैली की नकल करने वाले फॉलोअर ही मिलते है। कुछ लोग जो कविता के माध्यम से कुछ संजीदा करने की कोशिश कर रहे हैं, उनसे किसी को कोई सरोकार नहीं है और यही वजह है कि कवियों के भी जन-सरोकार खत्म होते जा रहे हैं। इस बढ़ती हुई खाई में कुछ ऐसे लोगों की बन आई है, जो ऑन-लाइन कविता सिखा सकते हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से ऐसे गुरुओं ने कविता की कुछ 'झटपट-विधियोंÓ का आविष्कार किया है, जो रातोंरात कवि बनाने का सामथ्र्य पैदा कर सकती है। रोचक तथ्य यह है कि ऐसे लोगों को धन और समर्थन भी खूब मिल रहा है। नव-रचनाकार इनके ईजाद किए हुए फार्मूलों से कविताएं रच रहे हैं, छप रहे हैं और सराहे जा रहे हैं। दावा यह है कि इस इंस्टेट-फार्मूले से तैयार अठारह हजार कवियों के बूते जल्द ही एक युग का प्रवत्र्तन होने वाला है! यह ये समकालीन कविता का परिदृश्य। भले ही इसे इस रूप में निराशाजनक नहीं कहा जा सकता कि कविता कर रहे समाज में संवेदना होती है, लेकिन उस आरोप का क्या जब कविता समाज में अपनी उपस्थिति दिखाने के लिए की जाए। गोया कविता करना सामाजिक प्रतिबद्धता नहीं होकर ग्लैमर हो गई। लोक-कल्याण की बजाय लोकप्रियता का माध्यम बन गई। किसी युग में युवकों द्वारा शरीर-सौष्ठव का प्रदर्शन इसीलिए किया जा सकता था कि भीड़ से अलग दिखाई दे। इसी तरह एक-दो किताबें प्रकाशित होते ही विद्वान और बुद्धिजीवी का तमगा मिल जाता है। सच तो यह है कि विद्वता और रचनाशीलता का आपस में कोई सीधा ताल्लुक नहीं है। बहुत सारे विद्वान रचनात्मकता के पेेटे सिफर साबित हुए हैं। रचनाशीलता के लिए पढ़ा-लिखा होना जरूरी नहीं है। वाल्मीकी और रामायण के बीच संबंधों की भविष्यवाणी कोई कर सकता था? कबीर कहां पढऩे गए थे? सूर ने कौनसे कृष्ण को देखा था? लेकिन इनके जीवन में रचनाशीलता ने निर्णायक भूमिका निभाई। कहा जा सकता है कि इस रचनाशीलता ने इनके जीवन को कविता बना दिया। कविता के रूप में इन्हें जीवन मिल गया। अनुभूति के जिस स्तर पर इन कवियों ने यात्रा की, सच तो यह है कि उसे भी पूरा व्यक्त नहीं कर पाए। क्योंकि, अन्वेषण और अभिव्यक्ति अदृश्य और अनिवर्चनीय है। यह पूर्णत: व्यक्तिगत है और कोई भी दूसरा व्यक्ति यह नहीं बता सकता कि फलां व्यक्ति ने इतना पाया और उसमें से इतना ही दे पाया। यहां तो पात्रता स्वयं की है। हां, स्वयं को यह अच्छे से पता चलता रहता है कि उसकी अनुभूतियों और अभिव्यक्तियों के बीच कितना झोल है। यह कसमसाहट स्तरहीनता के एहसास से जुड़ी होती है। सच्चा रचनाकार इस तरह से अपनी सीमाएं पहचानता है और अपनी रचनात्मकता के जरिये, फिर मैं फिर से फिरकर आता कि तर्ज पर खुद को अभिव्यक्त करता है। इसी को सीमा तोडऩा कहते हैं। इसी को बार-बार एक नए सत्य के साक्षात्कार की प्रक्रिया कहते हैं और इस तरह एक से दूसरे सत्य की टोह लेते हुए रचनाकार कई बार खुद को खारिज करता है तो कई बार अब तक के अनुभव को। इसलिए अनुभवों का परिमार्जन जारी रहना चाहिए। अनुभव का फलक जितना व्यापक होगा, अभिव्यक्त नहीं हो पाने का असंतोष उतना ही बढ़ेगा। यह असंतोष अगर रचनात्मक हो जाए तो फिर क्या तो कविता और क्या कहानी। साहित्य की किसी भी विधा में रचे हुए साहित्य को सराहना मिल सकती है। यह जो एक निराशाजनक माहौल है, उसमें आशा का संचार हो सकता है। बस, यह जान लेना जरूरी है कि रचनात्मक होने का कोई शॉर्ट-कट नहीं है। सच तो यह है कि इसका कोई निर्धारित-पैमाना भी नहीं है। यही वजह है कि सिर्फ चाहने भर से कोई कवि-साहित्यकार बन भी नहीं सकता। सबसे अच्छी बात यह है कि कवि-साहित्यकार होने का दम भरने वाले भी इस सत्य को स्वीकार करते हैं और नैतिक रहते हैं। हम देखते हैं कि भले ही कवियों की संख्या के बारे में कुछ भी कहा जाता रहा हो, लेकिन इन सभी कवियों को यह पता है कि कविता के क्षेत्र में उनकी उड़ान कितनी है।
यहां विज्ञान का शोध पूरी तरह से लागू होता है, जिसमें कहा गया है जैसे-जैसे हम ऊपर जाते हैं, हवा का दबाव कम होने लगता है और एक स्थान तो ऐसा आ जाता है, जहां हम स्थिर हो जाते हैं। न ऊपर जा सकते हैं और न नीचे आ सकते हैं। साहित्य में भी ऐसा ही होता है। सामान्य अनुभवों से भले ही हम धरती पर कूद-फांद कर लें। लिख-छप लें, लेकिन अनुभवों का अन्वेषण हमें जिस यात्रा पर ले जाएगा, वहां जाने के बाद स्पेस जैसे हालात पेश आएंगे। यहीं से निकलना बड़ी चुनौती है। इस चुनौती को पार करने वाले की प्रतीक्षा विस्तृत आकाश करता है। इसलिए हर सृजनशील व्यक्ति के लिए जरूरी है कि 'चांदमारीÓ की बजाय ठोस और सार्थक लिखे। ऐसा लिखे, जिसे कालजयी कहा जा सके। काव्य-रचना बहुत ही कठिन विधा है। कलारूपों में काव्य को बहुत ही सम्मान से देखा जाता है। कला का उत्कृष्ट रूप काव्य और उत्कृष्टतम रूप नाटक को माना गया है। नाटक- संगीत, नृत्य, शिल्प तथा अन्य ललित कलाओं का भी कोष है, लेकिन काव्य में अनुभूतियों में पिरोए हुए शब्द जन-मन तक पहुंचते हैं।

कविता शब्दों का गुम्फन नहीं

कविता वस्तुत: शब्दों का गुम्फन नहीं है। कुछ अक्षरों का समूह नहीं है, जिसे विराम चिह्नों ने अधिक सुंदर बना दिया हो। कविता को समझने वाले शब्द से शब्द के बीच में बचे हुए खाली स्थान (स्पेस) मेंं से कविता का अर्थ बरामद करते हैं। व्यक्ति के मन में यह खाली स्थान उनका एकांत होता है। यहीं पर प्रकट होता है कि अपनी बात को कहने के लिए कवि कितना उत्साही लेकिन सजग है। समय की अनुगूंज के बीच कवि बहुत सारे रहस्यों पर से भी पर्दा उठाता है। इस दृष्टि को समझना ही विषय की गहराई को समझना है। तेजी से बदलती घटनाओं को कोई कवि जिस तरह से संबद्ध करता है, उसे समझना जरूरी है। वेद-पुराणों के आख्यानों, कला-संगीत के प्रतीकों, बातों-मुहावरों की रोचकता से अपनी बात को रखने वाला कवि अपने साथ इस रूप में एक परंपरा का संवाहक होता है।

कविता मन की तृप्ति का साधन

इन सब में वह एक समूचा जीवन अभिव्यक्ति करता है। कला, संस्कृति, सभ्यता के पुनरावलोकन का अवसर देता है। वह जब किसी घटना या व्यक्ति का उल्लेख करता है तो वह उल्लेख भर नहीं होकर एक पूरा संदर्भ होता है। ये छोटे-छोटे संदर्भ विराट फलक की रचना करते हैं। यहां एक बात और उल्लेखनीय है कि कई बार कवियों को जागरण का अग्रदूत भी बता दिया जाता है।
कवि अपने मौलिक रूप में ऐसा कुछ भी नहीं होता है। हां, यह संभव है कि बाजार उसका इस रूप में उपयोग कर ले, लेकिन वस्तुत: एक कवि जन-मन के स्पंदन का कारण सिर्फ उसी अर्थ में बनता है, जब उसे पढ़ा या सुना जाए। कवि किसी के कान में अपनी कविता तो फूंकने से रहा। कवि घर-घर जाकर दूधवाले की बंधी की तरह तो कविताएं बांटने से रहा। कविता तो मन की तृप्ति का साधन है। यह समय जब लोग मन को मारकर बैठे हैं, कविता उन्हें क्या दे सकती है? कविता में तो आदमी स्वयं को ढूंढ़े तो बात बने। जिसने कविता में खुद को पा लिया, उसे जीवन मिल गया। इसलिए हर रचनाकार के लिए जरूरी है कि वह राजनीति की बजाय रचने पर केंद्रित हो। यह दिखाने करने की बजाय कि वह अच्छा लेखक है, अच्छा लिखने की ओर प्रवृत्त हो।

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