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सहा क्या नहीं, महत्वपूर्ण है कहा क्या...

सामान्य भाषा में सृजन को प्रसव-वेदना से परिभाषित किया जाता है। कुछ लोग ऐसा कह भी देते हैं, लेकिन सृजन का निर्णायक-पक्ष कभी भी वेदना नहीं बल्कि संवेदना रही है। वेदना तो सभी सहते हैं, अभिव्यक्त वही कर सकता है, जिसमें संवेदना हो। कदाचित सृजन को प्रसव-वेदना से इसलिए जोड़ दिया गया हो कि प्रसव-वेदना को पीड़ा का चरम माना गया है और इससे मिलने वाले परिणाम को सृजन का सुख। इसलिए एक साधारणीकरण करने के लिए यह परिभाषा दी गई और मोटी-मोटी बात समझ में आ गई तो फिर इस पर बहस भी नहीं हुई। अगर यह परीक्षा के सवालों को हल करने और नंबर लेने तक सीमित है तो ठीक, लेकिन एक रचनाकार को अपना आंकलन करने की शर्त से जुड़ा मसला है तो पुनरावलोकन की मांग करता है। जैसे ही हम प्रसव-वेदना के निहितार्थ पर जाते हैं तो पता चलता है कि यहां सिर्फ वेदना की बात है और थोड़ा-सा खींचतान करते हुए इसे पीड़ा से उपजे क्रंदन से जोड़ सकते हैं। सनद रहे! यह क्र्रंदन अभिव्यक्ति नहीं है। यह दर्द से निजात पाने की एक अवैज्ञानिक विधि भर है। कहीं यह प्रमाणित नहीं हुआ है कि रोने से दर्द कम हुआ है। असली बात तो उसे अभिव्यक्त करना है, जो सहा। यह सभी के वश में नहीं है। यह सच है कि प्रसव-वेदना अनिर्वचनीय होती है। लेकिन सृजन में अभिव्यक्ति ही प्राण-तत्त्व है। अभिव्यक्ति जितनी सघन होगी, संवेदनायुक्त होगी, समष्टि का भाव लिए होगी उतना ही विस्तृत उसका आकाश होगा। 

इस बात की बहुत अधिक संभावना रहती है कि पीड़ा की अभिव्यक्ति के लिए रचना में कल्पना का सहारा भी लिया जाए। भले ही इस वजह से साहित्य में विज्ञान जैसी विश्वसनीयता नहीं आ पाती, लेकिन साहित्य की यही कमी उसकी सुंदरता है। मौलिकता है। वरना साहित्य भी विज्ञान हो जाता। विज्ञान व्यक्तिगत स्तर पर परिणाम देता है, लेकिन साहित्य तो हर पढऩे वाले के मन में उतरकर उसकी थाह लेता है। एक पुस्तक न जाने कितने-कितनों की अंतर्कथाओं को स्पर्श करते हुए आगे बढ़ती है। विज्ञान में जो काम तर्क और यथार्थ करता है, साहित्य में अनुभूतियां करती हैं। अनुभूतियां जितनी सघन होंगी, अभिव्यक्ति उतनी ही व्यापक होगी। सारी बात को समझने के लिए एक बार फिर हमें प्रसव वेदना को समझना होगा। प्रसव-वेदना यथार्थ है, लेकिन इस वेदना के बाद उत्पन्न सारे बच्चों के प्रति समाज का एक जैसा नजरिया नहीं होता। जैसे, प्रसव-वेदना के बाद भी उत्पन्न बच्चे का लिंग, वर्ण और शारीरिक संरचनागत विशेषताओं के आधार पर सामान्य लोग खुशियों के अवसर ढूंढते हुए देखे जा सकते हैं। सभी परिणाम एक जैसे नहीं होते, लेकिन प्रसव-वेदना तो लगभग समान ही होती है। ऐसे में प्रसव-वेदना को सृजन से जोडऩे पर एक सनसनी तो पैदा की जा सकती है, लेकिन यह अंतिम नहीं है। निर्णायक नहीं है। सृजन प्रसव-वेदना नहीं है। सिवाय इसके कि प्रसव-वेदना जैसी पीड़ा का कोई भी स्तर सृजन का कारक माना जा सकता है। वास्तव में इन दोनों का कोई लंबी दूरी का रिश्ता नहीं है। सिवाय इसके कि जैसे हर प्रसव वेदना के बाद मिलने वाला परिणाम खुशियों की गारंटी नहीं होता, उसी तरह हर लिखा हुआ जनप्रिय होने की गारंटी नहीं होता। यह दूसरा अर्थ तो फिर भी सम्प्रेषित होता है, लेकिन सृजन और पीड़ का कोई सीधा संबंध स्थापित नहीं करता। इसमें कोई दो राय नहीं है कि पीड़ा से अभिव्यक्ति का एक मार्ग बनता है। यह अभिव्यक्ति आंसू, कराह, क्रंदन से भी हो सकती है और समझे या सहे दर्द को दुनिया का दर्द बना देने से भी। फिर जरूरी नहीं है कि पीडि़त ही सृजक हो। रामायण काल से जुड़े एक पौराणिक आख्यान में शिकारी द्वारा क्रौंच-वध करना और फिर मादा क्रौंच के विलाप की प्रतिक्रिया में एक कवि का हमें मिलना, इसका एक बड़ा उदाहरण है। फिर वाल्मीकी ही क्यों, कलिंग का एक युद्ध सम्राट अशोक की सारी प्राथमिकताएं बदलने वाला साबित हुआ। स्त्री और दलितों ने जिस पशुवत-जीवन को अपनी नियति समझकर स्वीकार कर लिया, उसी को लेखकों ने मानवीयता और समानता के दृष्टिकोण से देखा। भुगता किसी ने,अभिव्यक्ति किसी और ने किया। सहा किसी ने, कहा किसी और ने। यहां इसे यूं समझ सकते हैं कि ठोकर खाने के बाद सीखना ही जरूरी नहीं। ठोकर खाने वाले को देखकर भी सीखा जा सकता है। पीडि़त व्यक्ति ही अपना दर्द लिखे, जरूरी नहीं। किसी की पीड़ा को देखकर भी अभिव्यक्त किया जा सकता है। बशर्ते की संवेदनाएं हों। संवेदनाएं ही व्यक्ति के जिंदा होने का सबूत है। रोजाना होने वाले घटनाक्रमों में जो व्यक्ति संवेदनशील नहीं है, वह तो मृतक के समान ही हुआ। यही पीड़ा और अभिव्यक्ति का अंतर्सबंध है, जो संवेदना के रसायन के बगैर नहीं मिलता। यहीं से सवाल खड़ा होता है कि दर्द एक जैसा होने के बाद भी अभिव्यक्ति का स्तर अलग-अलग कैसे होता है? इसी सवाल के जवाब में सृजक होने की चाबी छिपी है। एक ही घटना, समय या संदर्भ से प्रभावित लोगों की अभिव्यक्ति का स्तर ही उनके अनुभवी होने का प्रमाण देता है। बहुत सारे लोग सामने आने वाली चीजों को 'तत्काल, समकाल और चिरकालÓ की डिवाइस से देखते हैं। पता करते हैं कि इस तरह की घटनाओं के सूत्र भूतकाल में कैसे और कहां
मिलते हैं।
उन प्रवृत्तियों पर जाते हैं, जिससे घटना का जन्म हुआ और फिर इन सारी स्थितियों को भविष्य में देखते हैं और इस पूरे अध्ययन से जो हासिल होता है, उसे अपनी रचना में शामिल करते हुए पहला ड्राफ्ट तैयार करते हैं और उसे बार-बार अपनी ही कसौटी पर कसते हैं। हर बार यह सवाल करते हैं कि क्या उसे जो कहना था, वह सौ फीसदी आ चुका है और जो रचना इस तसल्ली तक पहुंचे बगैर सार्वजनिक हो जाती है, स्तरीय नहीं हो पाती। यहां स्तरीय होना महत्वपूर्ण है और यह कहना जरूरी नहीं कि स्तरीय होने का फैसला करने के लिए न्याय या शासन व्यवस्था निर्णायक नहीं होती। यह तो मन तक पहुंचने की कला है। मन ही निर्णय करता है और मन को संवेदन ही झंकृत कर सकता है। सबसे पहली जरूरत संवेदनाओं के तार कसने की है। अगर संवेदना है तो प्रसव-वेदना क्या, किसी बच्चे को मारे जाने वाले एक थप्पड़ से भी कालजयी कृति का प्रणयन हो सकता है। अगर संवेदना नहीं है तो भले ही दस-दस प्रसवों का साक्षी बन जाए कोई, अभिव्यक्ति का आधा-क भी कहां लगाना है, पता नहीं चलेगा। इसलिए पीड़ नहीं, सृजन की अनिवार्यता अनुभूति है, संवेदना है। संवेदनशील मन ही कर सकता है सृजन।


इतिहास रच रहा
है 'अवरेखÓ

प्रज्ञालय संस्थान की ओर से शुरू किए गए 'अवरेखÓ कार्यक्रम में इस बार साहित्यकार शंभूदयाल सक्सेना की रचनाओं का
अनुवाद हुआ।
यह एक ऐसा नवाचार है, जिसमें अनुवाद-कला को प्रोत्साहन मिलेगा। यह सच है कि अनुवाद से ही हम दूसरी भाषाओं में रचे जाने वाले साहित्य को समझ सकते हैं। हर व्यक्ति चाहता है कि वह अपने जीवनकाल में अपनी किसी एक प्रिय कृति का अपनी भाषा में अनुवाद करे। बहुत सारे लोग अनुवाद को एक नई कृति के लिए की जाने वाली मेहनत से भी दुष्कर विधा मानते हैं, क्योंकि यहां लेखक को प्रयोग की तो छूट होती है लेकिन कथ्य बदलने की नहीं।


रंगकर्मियों का सम्मान

विश्व रंगमंच दिवस पर रमक-झमक संस्थान ने शहर के रंगकर्मियों का सम्मान किया। अशोक जोशी के निर्देशन में 'शहर हमारा सोता हैÓ का मंचन हुआ। इसके बाद धरणीधर रंगमंच पर आनंद वि. आचार्य के लिखे नाटक 'सूरज रो पूतÓ का मंचन हुआ।

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