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नहरी-लेखन करना है या नदी-सी अभिव्यक्ति?

सहने को कलात्मक तरीके से कहने की कला ही सृजन है- कहानी है, कविता है या अभिव्यक्ति की अनेकानेक विधाएं हैं। कहन, जो उस प्रथम पुरुष की त्रासदी को दुनिया का दर्द बनाकर प्रस्तुत करे और हर व्यक्ति को वह अपना-सा लगा, उसमें भले ही किरदार न हो, लेकिन बातें हमारी-आपकी लगे। उसमें भले ही किरदार हों, लेकिन वे देश-काल और परिस्थितियों से मुक्त समय को प्रतिनिधित्व करे, सृजन है। दिक्कत तब आती है जब कलात्मकता के नाम पर सनसनी फैलाने की कोशिश की जाती है। चौंकाए जाने के यत्न होते हैं। अतिरंजनाएं फैलाई जाती है, न तो सृजन रहता है और न कला का कोई अभिप्राय। मतलब सिर्फ यही होता है कि एक रोमांच जगाते हुए पाठक को उल्लू बनाना और यही वजह है कि अभिव्यक्ति में जैसे ही कृत्रिम कौतुहल जगाने का कीड़ा लगता है, जन से सृजन दूर होने लगता है। 

हालांकि, इस बात में दो राय नहीं है कि पाठक रंजन के लिए पढ़ता है या सुनता है, लेकिन वह प्रवाह में बहना पसंद करता है। एक नदी की तरह। नहर की तरह नहीं जो कृत्रिम किनारों की बीच चलती रहे। कभी उठाई-गिराई जाती लहरों के साथ चलती रही। नहरी-लेखन किसी वाद, विचार और विमर्श की जमीन पर लिखने को कहा जा सकता है, जहां बहुत कुछ बातें पहले से तय होती है। नदी-अभिव्यक्ति सरल, स्वाभाविक और राग-द्वेष से मुक्त होती है। इसका कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं होता जैसे नहर उसी क्षेत्रों से निकलेगी जहां ज्यादा वोट होंगे। नदी अपने रास्ते खुद बनाती है। नदी के मुंह को कोई भी राजनीतिक-आग्रह मोड़ नहीं सकता।
और इस प्रक्रिया में अगर कौतुहल भी आए तो स्वागत है। कुछ रहस्य-रोमांच पैदा हो तो हो, लेकिन उठा-पटक नहीं चाहिए। पाठक अनुभूतियों से निकलते हुए स्वयं के पूरे जीवन का आंकलन करता रहता है। वह बार-बार किताब को पढ़ते-पढ़ते बंद करता है और खुद को जोड़ता है। कई बार तो ऐसा भी होता है कि एक ही पन्ने पर घंटों पड़ा रहता है, उसकी नजरें या तो पन्ने पर गड़ी रहती है या वह चेतन-अचेतन की एक अलौकिक-सी अवस्था में चला जाता है, जहां शब्दों के बीच के स्पेस में गूंजते कथानक को अपनी जिंदगी से जोड़ते हुए स्मृतियों के कई कपाटों को खोलता-बंद करता है। इसीलिए तो पढ़ता है कोई किसी को। इसी में तो किसी के रचनाकार होने की सार्थकता है। यहीं तो आनंद है। इस आनंद का अनुभव ही किसी भी सृजनात्मकता की एकमात्र और अनिवार्य कसौटी है।
जिस रचनाकार को यह समझ आ गया। समझो वह जनप्रिय हो गया। इसे समझे बगैर कुछ नया और अनूठा कहने के चक्कर में बहुत सारे रचनाकार के प्रारंभिक वर्ष खत्म हो जाते हैं, जैसे-जैसे उसे पता चलता है प्रौढ़ता सिर चढ़ी होती है। बहुत सारे ऐसे उदाहरण हैं, जब बहुत सारे लेखकों ने अपने जवानी में पाए हुए सच को बुढ़ापे तक आते-आते नकारा और सदियों पुराने चले आ रहे सत्य को स्वीकार करते हुए उसी में स्वयं को अभिव्यक्त किया। सराहे भी गए। यह गलत भी नहीं है। व्यक्ति जब मुकम्मल नहीं है तो हासिल कैसे अंतिम हो सकता है।
कुछ लोग इसे खुद में लगातार परिवर्तन के अर्थ में स्वीकारते हुए बढ़ते हैं तो कुछ अपने कहे-किए में इतने जड़ हो चुके होते हैं तो वापसी संभव नहीं होती और मनोमस्तिष्क का यह द्वंद्व उन्हें रचनाकार नहीं रहने देता, क्योंकि रचनाकार का मन और मस्तिष्क तो कल-कल पानी की तरह बहता है। ठहरा हुआ पानी तो पानी भी कितने दिन रह पाता है भला। लेखन की सजगता और सावधानी का अपना महत्व है, लेकिन क्योंकि इसमें अनुभूतियों का प्रकटीकरण है, इसमें चालाकियों का क्या काम। अगर कोई अपने कहन मे फ्लैशबैक, प्रतीक या बिंबों को अय्यार के रमल की तरह प्रयोग भी करता है तो मानो वह सृजन नहीं कर रहा है, जुआ खेल रहा है। इस जुए की बाजी उसके खिलाफ भी हो सकती है। क्या जरूरी है अभिव्यक्ति को चौपड़-पासा बनाने की?
यह हर रचनाकार के लिए सोचने की बात है कि एक पाठक के साथ उसका रिश्ता बहुत ही समीप का होता है। हर पाठक चाहता है कि उसे एक किताब में ऐसे चार-पांच अवकाश मिले जब वह अपने जीवन में झांक आए। पन्ना किताब का खुला हो और वह अपने जीवन के अध्यायों का पुनर्पाठ कर ले। इस रूप में हर पाठक की अपने रचनाकार से यह अपेक्षा होती है, लेकिन जैसे ही उसका रचनाकार अपनी किताब के माध्यम से कुछ मायावी बनाने की कोशिश करता है, पकड़ा जाता है, क्योंकि रहस्य खड़ा करना बहुत मुश्किल है, उसे निभाना और फिर उसकी परतों को खोलना बहुत मुश्किल। जब वह इस स्तर पर नहीं कर पाता तो पकड़ा जाता है। इसलिए हर रचनाकार से उम्मीद की जाती है कि वह अपनी अभिव्यक्ति के
मामले में मौलिक और स्वाभाविक रहे, यही
पाठक चाहता है और यही बात उसे इतिहास में स्थान दिलाती है।

गठित हुआ राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल

साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली का राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल गठित हो चुका है। परामर्श मंडल के संयोजक वरिष्ठ रंगकर्मी, पत्रकार, साहित्यकार मधु आचार्य 'आशावादीÓ ने पिछले दिनों इसे अंतिम रूप दिया, जिसका अकादमी की जनरल काउंसिल की बैठक में अनुमोदन भी हो चुका है। मंडल में वरिष्ठ साहित्यकार भंवरसिंह सामौर, सोहनदान चारण, महिपालसिंह राव, मुकुट मणिराज, डॉ.शारदाकृष्णा, डॉ. मंगत बादल, कमल रंगा, राजेंद्र जोशी और डॉ.राजेश कुमार व्यास को शामिल किया गया है। आचार्य ने बताया कि मंडल को बनाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि राजस्थान के सभी अंचलों से प्रतिनिधित्व हो। राजस्थानी के प्राचीन और आधुनिक स्वरूप के जानकार इसमें रहें तो दूसरी और इतिहास, भाषा और व्याकरण के विशेषज्ञों को भी शामिल किया गया है ताकि आने वाले पांच सालों में कुछ ठोस कार्यों को पूरा किया जा सके, जिन्हें पिछले पांच साल में शुरू किया गया।

दो दिवसीय कला-महोत्सव

बीते सप्ताह कला, साहित्य, संगीत के कार्यक्रमों की धूम रही। चार अप्रैल को सखा संगम ने वरिष्ठ संगीतज्ञ डॉ.मुरारी शर्मा का जन्मदिन मनाते हुए उन्हें और उद्योगपति कन्हैयालाल बोथरा को सम्मानित किया। बीकानेर साहित्य कला संगम और थार विरासत की ओर से दो दिवसीय कला-महोत्सव में कविता और गजल पर केंद्रित दो दिवसीय कार्यक्रम हुआ। सरोद-सितार वादक अमित-असित गोस्वामी ने जयपुर में जलवा बिखेरा। खासतौर से कविता के लिए बीकानेर हमेशा से ही उर्वर रहा है। इन दिनों जिस तरह से कवियों की एक नई पौध खड़ी हो रही है, उत्साहजनक है। एक ऐसा समय जब समाज की संवेदना पर सवाल हो, बीकानेर में कवियों की बेतहाशा वृद्धि एक खबर है।

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