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लेखन के प्रति ईमानदारी बनाती है रचनाकार

लिखने के लिए सिर्फ भाषा ज्ञान होना ही जरूरी नहीं है। इस बार हरीश बता रहे हैं कि लिखने के लिए जरूरी है 

भाव-जगत स्पष्ट होना।


लिखने के लिए क्या सीखें? इस सवाल का सामान्य-सा जवाब तो यही है कि लिखने के लिए लिखना सीखें। यह सामान्य-सा जवाब ही दरअसल, परेशानियों का सबब है। हम देखते हैं कि बहुत सारे लोग यह कहते हुए देखे जा सकते हैं कि ये।।।? ये तो हमें आता है। यह तो हम भी कर सकते हैं। साहित्य में भी ऐसी त्रासद घटनाएं होती रहती है। बड़े-बड़े साहित्यकारों के रचे हुए को देखते हुए यह कहना कि ऐसा लिखना तो बहुत आसान है, भले ही कहने के स्तर पर आसान हो, लेकिन चुनौती के स्तर पर सात जन्म में नहीं हो पाने जैसा मामला है। लिखने की तकनीक सीखाने वाले सामान्यतौर पर कहते देखे जा सकते हैं कि वर्तनी शुद्ध होनी चाहिए। विराम चिह्नों का प्रयोग सलीके से किया जाना चाहिए और सबसे खास बात कि वाक्य की संरचना नौ शब्दों से अधिक नहीं होनी चाहिए। यहां तक तो ठीक है, लेकिन लिखें क्याï? यह किसी भी तकनीक से पता नहीं चल सकता। हां, सर्वे यह बता सकता है कि इन दिनों लोगों को क्या पढऩे में रुचि है, लेकिन जरूरी नहीं कि जो पढऩे में रुचि हो, उसे लिखा भी जा सके और फिर रुचि के पैदा होने का एक बड़ा कारण अभाव ही तो है। बारीकी से देखें तो पाएंगे कि हमारी रुचियां वस्तुत: हमारे मांग और आपूर्ति के साधन की प्रतिनिधि है। रुचियों का संबंध रचनात्मकता से जुड़ा है। किसी भी व्यक्ति के रचनात्मक होने के बहुत सारे कारण हो सकते हैं, लेकिन सबसे पहली शर्त उसका सुरुचिपूर्ण होना है। अगर रचनात्मक जगत से जुड़े हुआ व्यक्ति सुरुचिपूर्ण नहीं है तो उसकी रुढ़ताएं बगैर कहे ही बाहर आने लगेगी। वह पुराने पड़ चुके विषयों पर बात करेगा। बार-बार विषयांतर होगा, कुछ नया देने की कोशिश में गफलत का शिकार होगा और इस तरह के लोगों की सबसे बड़ी पहचान होगी कि शब्दों के चयन के मामले में बहुत अधिक लापरवाह होगा। वजह, सुरुचिपूर्ण नहीं होगा। सुरुचि सम्पन्न व्यक्ति सदैव कुछ नया करने की कोशिश करेगा। अगर वह लेखन के क्षेत्र से जुड़ा है तो किसी भी विषय को उठाने की बजाय, इस विषय पर ध्यान देगा कि उसे खत्म कैसे करना है। लिखने की यही सबसे बड़ी शर्त है। जब आप कलम उठाते हैं। कागज पर रखते हैं तो भले ही आप पहला शब्द लिख रहे हों, आपको पता होना चाहिए कि यह वाक्य खत्म कहां होगा। अगर यह पता चल गया कि पहले वाक्य को कहां खत्म करना है तो दूसरे वाक्य को शुरू करने के लिए किसी भी तरह की समस्या नहीं होगी। दूसरे से तीसरे में और इस तरह अंतिम पंक्ति के अंतिम विराम चिह्न तक सबकुछ व्यवस्थित हो जाएगा। ऐसा नहीं होने की स्थिति में बहुत सारी रचनाएं भ्रूण हत्या की शिकार भी हुई है। इस तरह की भ्रूण-हत्याएं उन्हीं रचनाओं की होती हैं, जिनके रचनाकार यह कहते हुए सुने जाते हैं कि ऐसा तो हम भी लिख सकते थे। दरअसल, समझ की पहली-दूसरी सीढ़ी पर खड़े ये लोग गलत कह भी नहीं रहे होते, क्योंकि जिस तरह से किसी भी बड़े साहित्यकार की रचना का मर्म सामने आता है, सभी को लगता है जैसे यह तो उसे भी पता है। एक ऐसी कहानी तो उसके भी पास है, लेकिन बात सिर्फ कहानी भर नहीं होती। कहानी को कहने का सलीका होता है। जब सलीका नहीं होता है तो समस्या खड़ी होती है। समस्या इसलिए खड़ी होती है कि भाव-जगत में कुछ भी स्पष्ट नहीं होता। जब तक भाव-जगत अपने विषय को लेकर सजग नहीं होगा। विषय को संवेदनाओं की प्राण-वायु नहीं मिलेगी। कहने का सलीका तो दूर की बात है, कैसे एक शब्द भी फूट सकता है? और हम बात कर रहे हैं कि एक कहानी, उपन्यास या कि एक कविता लिखने की। इसलिए कहते हैं कि लिखना आना चाहिए। लेखन के प्रति यह ईमानदारी ही व्यक्ति की रचनाकार बनाती है। एक रचनाकार न जाने कितनी-कितनी बार अपने लिखे हुए को खारिज करता है। बार-बार कागज फाड़ता है और अंतत: एक रचना को समाज के सामने बहुत ही संकोच से रखने का साहस रखता है। दरअसल, जब वह ऐसा कर रहा होता तो वह एक सलीके की खोज कर रहा होता है। वह बार-बार खारिज इसलिए नहीं करता, क्योंकि उसे लिखना नहीं आ रहा है। वह खारिज इसलिए कर रहा होता है कि वह सलीका नहीं आ रहा है कि एक पूरी परंपरा से निकलकर उस तक आने वाला पाठक, उसे भी सराहे। संकोच सिर्फ इस बात का है कि रचनाकार को पता है कि इस समाज में उससे अधिक ज्ञानी और समझदार लोग बैठे हैं, उनकी कसौटी पर क्या यह खरा उतर पाएगा। यही संकोच लिखना सिखाता है। वरना जिसे सामान्य शब्दों में लिखना कहते हैं, वह तो सभी साक्षरों को आता है। हम यह भी कहते हुए सुनते हैं कि छोटी मात्रा लगाएं या बड़ी, समझने वाला तो समझ ही गया। साहित्य में ऐसा नहीं है। साहित्य में सबसे पहले रचनाकार को अपनी तरफ से साफ कर देना पड़ता है कि वह क्या समझाना चाहता है। पाठक तो बाद में उसके कहन में से अलग-अलग ध्वनियां और अर्थ निकालना शुरू करते हैं। यही लिखना है, यही लेखन है। यही सृजन है, सृजन का इससे बड़ा सरोकार कोई भी नहीं है कि लिखने का सलीका आए।

मंच पर ही नकद राशि, सराहनीय पहल

पंाच दिवसीय रंग-महोत्सव में पांच नाटकों के बाद एक-दो जून को अर्पण आर्ट सोसायटी द्वारा बहुचर्चित नाटक 'प्यादाÓ का मंचन हुआ। रंग-निर्देशक दलीपसिंह भाटी के निर्देशन में मंचित इस नाटक में स्त्री-पुरुष संबंधों की पड़ताल करते हुए अंतद्र्वंद्व को दर्शाया गया। पूरे नाटक में तनाव एक अदृश्य किरदार था, जो दर्शकों के मन में चलता रहा। नवोदित रंगकर्मियों ने नाटक में जान डाल दी। प्रत्येक रंगकर्मी को बतौर मेहनताने 3000 रुपए की राशि सार्वजनिक रूप से मंच से ही दिया जाना, एक अच्छी शुरुआत है। बीकानेर में अगर प्रोफेशनल थिएटर की स्थापना करनी है तो खुले मन से रंगकर्मियों को उनके हक का पैसा देना होगा। इससे पहले पांच दिवसीय रंग आयोजन में में गवाड़, फंदी, काया में काया, अम्मा और श्यामकली का जादू नाटक मंचित हुए।

पांच दिन लगातार कार्यक्रम

आठ जून से 12 जून तक साहित्य के नाम रहेगा। नियमित चलने वाले कार्यक्रमों के अलावा पांच कार्यक्रम लगातार होने हैं। आठ जून को डॉ.राजेंद्र जोशी, नौ जून को डॉ.मंजू कच्छावा, दस जून को कवि-कथाकार राजेंद्र जोशी, 11 जून को जनकवि हरीश भादाणी की जयंती पर अवरेख और 12 जून को राजस्थानी कहानी पर केंद्रित कार्यक्रम होगा। वर्ष-2017 में 85 किताबों का प्रकाशन हुआ है। वर्ष-2018 के प्रारंभिक महीनों की सुस्ती के बाद जिस तरह से कृतियां सामने आ रही हैं, संभव है कि पिछले साल का रिकार्ड टूट जाए।

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