Menu

'जहां न पहुंचे रवि' उक्ति नहीं, चुनौती है कवि को : हरीश बी. शर्मा Featured

सूर्य की पहुंच से भी अधिक तीव्रता से, गहरे तक और विस्तार से पहुंचने की क्षमता है तो वह कवि है। संकट यह है कि, थी तो यह चुनौती और इसे कीर्ति मान लिया गया। कवि को सूर्य से बड़ा मान लिया गया जबकि सूर्य से तो उसकी दौड़ थी। उसे सूर्य से आगे निकलना था।

सृजनधर्मी होने के नाते एक मानवीय-आग्रह होता है कि हमारी पहचान के आगे भी कवि, कहानीकार, व्यंग्यकार या ऐसा ही कोई संबोधन लगे। इस संबोधन के पीछे मूल-भावना यही होती है कि उस व्यक्ति को उस रूप में पहचाना जाए। जैसे किसी के आगे डॉक्टर, इंजीनियर या मेजर लग जाता है तो उसके क्षेत्र का मोटा-मोटा अंदाजा हो जाता है। उसी तरह एक सृजनधर्मी भी अपने होने का अंदाजा इस रूप में देता है कि वह लिखता तो है, लेकिन दक्षता उसकी फलां-फलां विधा में है। यह दक्षता ही कालांतर में विशेषज्ञता बन जाती है। इतना ही नहीं, बहुत सारे लोग तो अपने आगे उपाधियां और विशेषण तक जोड़ लेते हैं। हां, कुछ मामलों में उनके अनुयायियों द्वारा भी यह कृत्य किया जाता है, जिसे बड़ी सहजता से ग्रहण भी कर लिया जाता है। अगर एक रचनाकार का मन है। सृजन का संकल्प है तो इस तरह के आग्रहों से जो जितना बच पाएगा, श्रेष्ठ रच पाएगा। कविता या कहानी करना एक बात है, अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर इतना करना सभी का हक है, लेकिन इस हक में अपने आपको कवि या कहानीकार के रूप में स्थापित करने का हठ कहीं भी शामिल नहीं है। इतिहास में देखें, किसी भी सृजनधर्मी ने खुद को कवि या कहानीकार नहीं कहा। मिलता है तो सिर्फ यह कि जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि और इस कथन के साथ कवि के सामने एक बड़ी चुनौती मिलती है। दरअसल, यह उक्ति है ही नहीं। यह आह्वान है कि जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि यानी कवि वहां पहुंचे, जहां तक रवि भी नहीं पहुंच पाए।
इस रूप में एक सूत्र-वाक्य मिलता है कि अगर किसी में सूर्य की पहुंच से भी अधिक तीव्रता से, गहरे तक और विस्तार से पहुंचने की क्षमता है तो वह कवि है। संकट यह है कि, थी तो यह चुनौती और इसे कीर्ति मान लिया गया। कवि को सूर्य से बड़ा मान लिया गया जबकि सूर्य से तो उसकी दौड़ थी। उसे सूर्य से आगे निकलना था।
          जैसे ही इस सत्य का पता चलता है, स्वयं को कवि कहने वाले अंदर तक कांप जाते हैं। इतना बड़ा लक्ष्य! सूर्य के तो स्थूल प्रभावों को भी पार करना संभव नहीं है, ऐसे में अगर सूर्य के सूक्ष्म और सिर्फ वैज्ञानिक प्रभावों की ही बात करें तो क्या किसी कवि की क्षमता है, उससे आगे निकलने की? वहां जाने की जहां अब तक सूर्य नहीं पहुंचा हो? अगर नहीं है तो कैसे हम इन संबोधनों में स्वयं को सहज रख सकते हैं?
तो, तय यह हुआ कि अगर हमें कवि कहलाना है तो पहले सूरज को हराना होगा। सूरज से आगे निकलना होगा। कुछ ऐसी अभिव्यक्ति देनी होगी, जहां तक अभी तक कोई इंसान तो क्या सूरज भी नहीं पहुंचा हो। फिर, समाज खुद ही कह देगा कि आप कवि हैं। कहानीकार या व्यंग्यकार है। अगर ऐसा नहीं कर पाते हैं तो सृजन की उत्कट आकांक्षा लिए लेखन को धर्म मानकर कर्मरत रहना अच्छी बात है, लेकिन फल मिलने से पहले ही खुद को महिमामंडित कर देना प्राणघातक ही नहीं, आत्मघाती भी है। सनद रहे! यहां प्राण और आत्मा का अभिप्राय किसी व्यक्ति के सृजनधर्मी होने से है, सामान्य-व्यक्ति के रूप में इस बात को फिलहाल लागू करने का फिलहाल मंतव्य नहीं है।
इसलिए कर्म करते रहें। सृजनरत रहें। अभिव्यक्ति होते रहें। एक फिल्मी गीत है ना 'गाना आए या ना आए गाना चाहिए...Ó कि तर्ज पर जरूरी नहीं कि कविता, कहानी आए ही आए। करते रहें, क्योंकि यह संवेदनशील मन की निशानी है, लेकिन खुद ही खुद पर कवि होने का ठप्पा लगाने से बचें। यह काम समाज के लिए छोड़ दें। समाज में जब मानवीयता खत्म हो रही है। अपराध बढ़ रहे हैं तो कविता ही है तो करुणा को स्वर देगी। कोई बात नहीं। आज नहीं बनी है तो कल बन जाएगी कविता। परेशान मत होइये। समय से बड़ा न्यायाधिकारी कोई नहीं है। समय स्वयं तय करेगा कि उसे किसने सही-सही अभिव्यक्त किया। क्योंकि उसे भी अपने समय में एक कवि चाहिए। इसलिए इस आग्रह से मुक्ति पा लीजिये कि आप अपने समय के सबसे बड़े कवि हैं। टॉप-टेन हैं या हंडे्रेड-वन हैं। किसी युग में हैं या युग्म में।
         बहुत जल्द ही पता चल जाने वाला है कि यह सब ढकोसले थे। असली सृजन तो कुछ और ही था। जो मौन भाव से हो रहा था। भवभूति का धैर्य देखिये ना, उन्होंने कहा था-होगा कोई जो सदियों बाद आएगा और मेरी कविता को समझेगा। समझा गया ना भवभूति को। आज भी उन्हें याद किया जाता है। जरूरत है भवभूति के उस विश्वास की, जिस के चलते उन्हें पता था कि वे जो रच रहे हैं कालजयी है, लेकिन हड़बड़ाहट नहीं थी।
अब यह जरूरी नहीं कि जो लिखा जाए वह तात्कालिक रूप से सभी को समझ आ ही जाए। फिर इस बात को भी ध्यान में रखें कि समझ में नहीं आने का कारण सिर्फ ना-समझी ही नहीं होती। अधिक समझदारी भी इसके बड़े कारणों में से एक है। ऐसे हालात में विचलन, हताशा या कुंठा की जरूरत नहीं। ना ही ढिंढोरा पीट-पीटकर यह जताने की कोशिश की जाए कि उसका रचा हुआ इस-इस तरीके से श्रेष्ठ है। यह जिम्मेदारी समाज की है, क्योंकि यह सब खुद के लिए नहीं रचा। समाज के लिए रचा गया है। सदियों के लिए रचा है। जैसे ही कवि को लगता है, वह खुद के लिए रच रहा है। दंद-फंद में लग जाता है या लगा दिया जाता है। लिखते ही छपना, छपते ही चर्चा में आना, चर्चा में आते ही कवि बन जाना, कुछ इनाम-इकराम का बंदोबस्त जुटाना।
अगर किसी को समाज कवि के रूप में प्रतिष्ठा नहीं देता तो इन सब का कोई मोल नहीं है। मोल समाज की मान्यता का है। बेहतर रचा जाएगा तो देर-सवेर ही सही, मान्यता भी मिलेगी और प्रतिष्ठा भी। आज नहीं तो कल समाज कहेगा। अगर नहीं कहेगा तो मान लीजिये, अभी बहुत कुछ करना बाकी है। समाज सूरज को भी जानता है और कवि को भी, उसे यह समझाने की कोशिश बेमानी है कि कविता क्या होती है।

'कहानी की तलाश में कहानी'
बीकानेर आकाशवाणी ने श्रोताओं को जोडऩे के लिए एक बार फिर से कहानी विधा को सहारा लिया है। 'कहानी की तलाश में कहानी' कार्यक्रम का प्रसारण शुक्रवार को किया जाएगा, जिसमें कहानी को गीत-संगीत के प्रभाव के साथ प्रस्तुत किए जाने की योजना है।

निर्मल और रईस का सम्मान

उत्तर पश्चिम रेलवे के मुख्य अभियंता निर्मल कुमार शर्मा का पिछले दिनों जयपुर में तबादला हो गया। अपने नाम के अनुरूप व्यवहार वाले निर्मल कुमार शर्मा मधुर कंठ के कवि हैं और काफी सराहे जाते हैं। उनके सम्मान में एक काव्य-गोष्ठी का आयोजन नालंदा पब्लिक स्कूल के सृजन सदन में प्रज्ञालय संस्थान व बीकानेर साहित्य-संस्कृति कला संगम की ओर से किया गया। इन्हीं दोनों संस्थानों की ओर से 30 जून को 'मै शबाना' नाम से चर्चित उपन्यास के रचयिता यूसुफ रईस का बीकानेर आगमन पर अभिनंदन किया गया।

DNR Reporter

DNR desk

Leave a comment

Make sure you enter the (*) required information where indicated. HTML code is not allowed.

back to top

Bikaner Trusted News Portal

  • Bikaner Local News
  • National News
  • Sports News
  • Bikaner Events
  • Rajasthan News