बीकानेर थियेटर फेस्टिवल में मंच पर उतरी संवेदनाएं

डीएनआर रिपोर्टर.बीकानेर
बीकानेर थिएटर फेस्टिवल के दूसरे दिन आज सुबह संजना कपूर और मराठी रंग निर्देशक संगीतकार संभाजी भगत के साथ शहर के संगीतकार संगीतकार अमित एवं असित गोस्वामी का संवाद हुआ।
संवाद के दौरान संजना कपूर ने कहा कि रंगकर्म कलाकार और समाज के सहयोग से ही आगे बढ़ सकेगा लेकिन रंगकर्मी को पहले अपने काम के प्रति स्वयं गम्भीर और आस्थावान होना होगा। तभी वह समाज से सहयोग का अधिकारी होगा। तभी वह समाज को समझा पायेगा कि हमारा काम महत्वपूर्ण है और समाज का दायित्व है कि वह हमारा सहयोग करे।अन्यथा रंगकर्मी हमेशा एक याचक ही बना रहेगा।
मराठी रंग निर्देशक संभाजी भगत ने कहा की रंगकर्मी की सभी आवश्यकताएं उसके आसपास ही पूरी हो सकती है साथ ही रंगकर्मी की समाज के प्रति कुछ जिम्मेदारी भी है अगर समाज में कुछ गलत हो रहा है तो सच्चा रंगकर्मी चुपचाप उसे देख नहीं सकता उसके रंगकर्म में उस अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने का साहस होना चाहिए। संभाजी ने सत्र के अन्त में अपना लिखा एक गीत भी प्रस्तुत किया।
संवाद सत्र के दौरान प्रख्यात साहित्यकार डॉ नंदकिशोर आचार्य रंगकर्मी राजेंद्र गुप्ता साहित्यकार मालचंद तिवाड़ी आदि मौजूद थे

दूसरे दिन फेस्टिवल में पांच नाटको का मंचन
सभी के सुख व तकलीफ में सभी भागीदार
दिन की पहली प्रस्तुति के रूप में चंडीगढ़ से आये नाट्य दल ने नम्रता शर्मा के निर्देशन में नाटक ‘हो रहेगा कुछ न कुछÓ का मंचन किया। नाटक ने सोचने के लिए मजबूर किया कि इस संसार में सभी जीवों का परस्पर सम्बन्ध है और हम सभी एक दूसरे की तकलीफ और सुख में भागीदार हैं और उसके लिए जि़म्मेदार भी हैं। एक मां और उसकी बेटी के बीच कसा हुआ ये नाटक एक खेल की तरह चलता है और अस्तित्ववाद के प्रति दो अलग नज़रियों को दर्शाता है। ये नाटक दर्शकों को झकझोर कर जगाना चाहता है ताकि हम जीवन, प्रेम, जि़म्मेदारी और रिश्तों को नए दृष्टिकोण से देख सकें।

बूढ़ी काकी
दिन की दूसरी प्रस्तुति आभाशंकर के निर्देशन में ‘बूढ़ी काकीÓ नाटक का रेलवे ऑडिटोरियम में हुआ। प्रेमचन्द की कहानी पर आधारित इस नाटक में भतीजा बुद्धिराम काकी से परेशान होता है। उसे खाना नही देता। घर में बेटे का तिलक फिर भी काकी को खाना नहीं। रात को भूखी काकी पतल में जूठा खाना खाती है तो बुद्धिराम को पश्चाताप होता हैं। बुजुर्गों प्रति संवेदनशीलता जगाता यह नाटक वर्तमान रिश्तों को झकझौर देता है। कलाकार- के. के. रंगा, राजशेखर, डॉ आशु मलिक, मीनू गौड़, पूनम चौधरी।

आत्महत्या नहीं संघर्ष करना चाहिए
रेलवे ऑडिटोरियम में चंड़ीगढ़ के अनूप शर्मा के निर्देशन में मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘पूस की रातÓ पर आधारित ‘कम्बलÓ नाटक का मंचन किया गया। नाटक में किसान के संघर्ष की कहानी बताई गई है। किस प्रकार दिन रात एक करके भी वो दुनिया को अन्न खिलाता है लेकिन अपनी मूलभूत जरूरतें पूरी नहीं कर पाता है। पूंजीपतियों से परेशान होकर आत्महत्या करने का विचार करता है, हालांकि बाद में वो अपने संघर्ष को जारी रखने का निर्णय करता है। जीवन से निराश और हताश लोगों को यह नाटक देखना ही चाहिए।

दूजा कबीर

पद्मश्री विजयदान देथा की कहानी ‘दूजा कबीरÓ का मंचन जयपुर के जयरूप जीवन के निर्देशन में हुआ। नाटक संत कबीर के दर्शन का प्रतिनिधित्व करता है। अपनी यात्रा के दौरान एक राजा को एक छोटे से गांव में पड़ाव लेना पड़ा, जहां प्रसिद्ध बुनकर-कलाकार कबीर रहते हैं। राजकुमारी, राजा की प्यारी और समझदार बेटी कबीर के कला कार्यों पर एक नजर डालने का आग्रह करती है। प्रभावित राजा कबीर को खुश करके उन्हें खुश करना चाहता है, वह कभी क्या इच्छा करता है लेकिन अस्मानी कबीर राजा को कोई भी वस्तु बेचने या देने से इनकार करते हैं। इसी ताने बाने पर नाटक का मंचन होता है।

महाभारत
पहले दिन की अंतिम प्रस्तुति ने उपस्थित दर्शकों को झकझौर दिया। नाटक खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक दर्शक खड़े होकर ‘उत्साहवद्र्धनÓ करते रहे। दिल्ली की अनुरूपा रॉय के निर्देशन में मंचित इस नाटक ‘महाभारतÓ में जीवन के कई द्वंद्व एक साथ दिखाए गए हैं।

नाटक के बारे में-
इंसान का जन्म शांति के लिए होता है, वे शांति से बड़े होना पसंद करते हैं। वे अपने बच्चों को शांति से पालना पसंद करते हैं, और वे शांति से इस खूबसूरत जीवन को अलविदा कहना पसंद करते हैं। फिर हम हमेशा युद्ध की तैयारी क्यों कर रहे हैं? यह महाभारत की केंद्रीय दुविधा प्रतीत होती है। जब हम खुद को दूसरे दृष्टिकोणों से रोकते हैं, तो अपनी दुनिया को न्याय के अपने संस्करण तक सीमित कर देते हैं, क्या हम युद्ध के लिए नेतृत्व कर रहे हैं? जब प्रत्येक व्यक्ति एक मकसद के भीतर और यथास्थिति के अपने संस्करण में खुद को फँसाता है, तो क्या हम मारने और मरने के लिए अभिशप्त हैं? जब महाभारत के पात्रों ने अपने व्यक्तिगत युद्धों को छेडऩा शुरू कर दिया, तो अपने कार्यों के परिणामों के लिए खुद को बंद कर दिया, चीजों को एक सर्वनाश में स्नोबॉल किया। हमारे महाभारत उनके अतीत और वर्तमान उद्देश्यों की चेतना कथा की एक धारा के माध्यम से नाटक में पंद्रह पात्रों की आंतरिक दुविधाओं की पड़ताल करते हैं। क्या प्रत्येक वर्ण एकल विचार और एक विश्वास प्रणाली के प्रति निर्विवाद निष्ठा अपरिहार्य संघर्ष की ओर ले जाता है? क्या कभी ऐसा क्षण आया था जब इनमें से प्रत्येक पात्र अलग-अलग चुनकर युद्ध को टाल सकता था? क्या हम एक ही विकल्प को शाश्वत बनाने के लिए बर्बाद हैं? नाटक में कलाकारों ने ऐसी जान डाली कि हर कोई निशब्द था। इस नाटक को देखने जिला कलक्टर कुमार पाल गौतम भी पहुंचे।

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